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जयपुर में क्रिकेट की तरह होती है पतंगबाजी की प्रतियोगिता, पिच पर खड़े होकर लड़ाए जाते हैं पेच

Jaipur Kite Festival: जयपुर में पतंगबाजी के जुनून का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई पतंगबाजों ने बरसों से पतंगों को संभाल कर रखा है. उनके लिए ये पतंग किसी अनमोल संपत्ति से कम नहीं हैं.

जयपुर में क्रिकेट की तर्ज पर पतंग प्रतियोगिता आयोजित होती है, जिसमें टॉस करके यह तय किया जाता है कि खिलाड़ी अपनी पतंग से पेच ऊपर से लड़ाएगा या नीचे से. इस बार यह प्रतियोगिता फरवरी और मार्च के बीच आयोजित की जाएगी. हालांकि तिथि अभी तय नहीं हुई है.

गुलाबी नगर काइट क्लब फ्लाइंग एसोसिएशन के अशोक वैष्णव ने बताया कि पतंग प्रतियोगता में चार खिलाड़ी होते हैं, जिनमें से तीन खिलाड़ी पेच लड़ाते हैं और एक अतिरिक्त होता है. उन्होंने कहा कि इसमें भी क्रिकेट की तरह तीन अंपायर होते हैं, जिनमें से दो पिच पर होते हैं जबकि एक मैदान में बीच में होता है जो पतंगबाजों के पेच पर ध्यान रखकर निर्णय लेता है.

पेच लड़ाने के लिए होता है टॉस

उन्होंने कहा कि पतंगबाजों के लिए क्रिकेट की तरह 15 फुट लंबी और 10 फुट चौड़ी पिच भी होती है, जिस पर रहकर पतंगबाजों को पेच लड़ाने होते हैं. उन्होंने कहा कि टॉस जीतने के बाद खिलाड़ी तय करता है कि उसे पेच ऊपर से लड़ाना है या नीचे से.

वैष्णव ने कहा कि खास बात यह होती है कि अंपायर पतंग के आकार की जांच करता है, एक टीम को नौ पेच लड़ाने होते हैं जबकि एक पेच लड़ाने का समय 15 मिनट तय होता है. उन्होंने कहा कि इस दौरान अगर किसी खिलाड़ी की पतंग कट जाती है तो वह हारा हुआ माना जाता है और अगर दोनों की ही पतंग नहीं कटती तो वे खेल से बाहर हो जाते हैं.

वहीं पतंगबाज गोविंद जांगिड़ ने बताया कि शहर में ही 70-80 काइट क्लब है और सैकड़ों पतंगबाज. उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर की प्रतियोगिता में तीन से चार लाख और अखिल भारतीय प्रतियोगिता में करीब दस लाख रुपये तक का खर्च आता है.

'सरकार से जगह तक नहीं मिल पा रही'

हालांकि, शहर में पतंगबाजी को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले आज मायूस महसूस कर रहे हैं. क्रिकेट की तरह उन्हें और उनके खेल को तवज्जो नहीं दी जा रही. पतंगबाजी प्रतियोगिता करवाने के लिए कोई जगह निर्धारित नहीं है. शहर के काइट क्लब के सदस्यों के अनुसार, पहले जलमहल की पाल पर प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी, इसके बाद आगरा रोड पर माली की कोठी पर इसका आयोजन हुआ. अब प्रतियोगिता करवाने के लिए राज्य सरकार से पिछले कई साल से जगह की मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा.

'प्रतियोगिता के लिए पैसों का भी अकाल'

पतंगबाजों का कहना है कि क्रिकेट से मिलते-जुलते इस खेल में प्रायोजन और पैसे दोनों का ही अकाल है और स्थिति यह है कि पतंगों से जुड़े संघ अपने-अपने स्तर पर पैसा जुटाकर प्रतियोगिता करवाते हैं. शहर में पतंगबाजी के जुनून का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई पतंगबाजों ने बरसों से पतंगों को संभाल कर रखा है. उनके लिए ये पतंग किसी अनमोल संपत्ति से कम नहीं हैं.

'बच्चों की तरह करते हैं पतंग की देखभाल'

गोल्डन काइट क्लब के संचालक 64 वर्षीय राजू सरदार ने कहा, "मैं 40 साल से पतंग उड़ा रहा हूं. मैंने करीब साठ साल पुरानी पतंग अभी भी सहेज के रखी हैं. ये पतंग मेरी संपत्ति हैं. बच्चों की तरह इन्हें संभालकर रखता हूं. साल में दो बार इन्हें बक्से में से निकालकर धूप लगाता हूं ताकि ये खराब न हों."

'40 साल पुरानी पतंग आज भी संजोकर रखी'

वहीं, पुलिस विभाग से रिटायर हुए 70 वर्षीय कमलसिंह चौहान ने कहा, "मैं चालीस साल से पतंगबाजी कर रहा हूं. चालीस साल पुरानी पतंग आज तक मेरे पास मौजूद हैं. ये पतंग इसलिए संभालकर रखी हैं क्योंकि ये उस समय के पतंगसाजों की बनाई हुई हैं. ऐसे पतंग बनाने वाले अब नहीं मिलते हैं. उनकी याद में ये सभी पतंग रख रखी हैं."

बांस बदनपुरा के निवासी अब्दुल्ला काइट क्लब के अजहर हुसैन ने बताया कि वह 1998 से पंतगबाजी कर रहे हैं और पूरे साल पतंगबाजी करते हैं. उन्होंने कहा कि वह राज्य से बाहर आयोजित पतंगबाजी प्रतियोगिता में भी भाग लेते हैं और उनके पास 45 साल पुरानी पतंग भी हैं.

93 साल के अहसान हाजी का कम नहीं हुआ पतंग का शौक

वहीं पंजाबी कॉलोनी में रहने वाले स्टील गाइड क्लब के संचालक 93 वर्षीय अहसान हाजी का पंतगबाजी का जुनून देखते ही बनता है. उनका कहना है कि जहां भी पतंगबाजी की प्रतियोगिता होती है वह वहां चले जाते हैं. इस उम्र में भी पतंगबाजी का उनका शौक कम नहीं हुआ है और वह 1961 से पतंगबाजी कर रहे हैं.

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