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'जनता करे कटौती, सत्ता...' PM मोदी की अपील पर राज ठाकरे का तीखा हमला,CM फडणवीस पर भी निशाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज ठाकरे ने तीखा जुबानी हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि इस परिस्थिति में नेताओं को भी काफिले कम करने चाहिए.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई अपील पर तीखी टिप्पणी की है. सोशल मीडिया साइट एक्स पर ठाकरे ने पूछा कि आखिर पीएम समेत कई नेता खर्चीले सफर क्यों कर रहे हैं? ठाकरे ने अपने बयान में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की स्विटजरलैंड यात्रा पर भी निशाना साधा है. 

उन्होंन लिखा कि दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से मितव्ययिता अपनाने की अपील की. सोने की खरीद कम करें, गैरजरूरी विदेश यात्राओं से बचें, पेट्रोल-डीज़ल की खपत घटाएं, इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ें और वर्क-फ्रॉम-होम संस्कृति अपनाएं. वजह बताई गई कि सोना और कच्चा तेल आयातित हैं और ये देश के बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालते हैं. ऊपर से ईरान संघर्ष के बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है.

ठाकरे ने लिखा- ठीक है. लेकिन प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेता आज भी पूरे देश में विशाल काफिलों, रोड शो, हेलीकॉप्टरों, फूलों की बारिश और बेहद खर्चीले राजनीतिक अभियानों के साथ यात्रा कर रहे हैं. क्या प्रधानमंत्री यह स्वीकार करेंगे कि 'ऐसी राजनीतिक फिजूलखर्ची हमारी गलती थी और अब हम सब, मैं खुद भी, इसे दोहराएंगे नहीं'? आम आदमी ही हमेशा त्याग क्यों करे? क्या मितव्ययिता सिर्फ नागरिकों के लिए है और राजनीतिक वर्ग के लिए नहीं?

'लाखों करोड़ रुपये कमाए. वह पैसा गया कहां?'

मनसे चीफ ने लिखा कि आज कच्चे तेल की कीमतें लगभग 90–100 डॉलर प्रति बैरल के बीच हैं. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब दुनिया ने ऐसे दाम देखे हों. 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी, 2011–12 के अरब स्प्रिंग, 2013–14 के दौर (जब बीजेपी खुद यूपीए सरकार पर ईंधन कीमतों को लेकर तीखे हमले कर रही थी) और फिर 2022–23 में ओपेक उत्पादन कटौती के समय भी तेल की कीमतें इसी स्तर तक पहुंची थीं. इन 3-4 अवधियों में डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और एक बार नरेंद्र मोदी स्वयं इस पद पर थे. डॉ. मनमोहन सिंह ने कभी नागरिकों से विदेश यात्रा रोकने की अपील नहीं की. नरेंद्र मोदी ने भी पहले ऐसा नहीं कहा. तो अब क्यों?

उन्होंने लिखा कि जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल घटकर 60–65 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, तब भी भारतीय नागरिक पेट्रोल-डीज़ल के लिए बहुत ऊंची कीमत चुका रहे थे क्योंकि सरकार ने भारी टैक्स लगाए हुए थे. ईंधन करों से सरकार ने लाखों करोड़ रुपये कमाए. वह पैसा गया कहां?

उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री ने कभी 'रेवड़ी संस्कृति' का मज़ाक उड़ाया था. लेकिन महाराष्ट्र से लेकर बिहार और पश्चिम बंगाल तक चुनाव अब इसी तरह की लोकलुभावन योजनाओं के जरिए लड़े और जीते जा रहे हैं. महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहिन’ योजना ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव डाला है. महिलाओं को नौकरी, शिक्षा और सुरक्षा के जरिए वास्तविक सशक्तिकरण देने के बजाय सरकारें अस्थायी नकद लाभ बांटती हैं, जिसे महंगाई धीरे-धीरे वापस निगल जाती है. अगर आर्थिक स्थिति सचमुच गंभीर है, तो क्या प्रधानमंत्री खुलकर सभी राजनीतिक दलों से प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन योजनाएं बंद करने की अपील करेंगे?

मनसे नेता ने लिखा कि प्रधानमंत्री अब नागरिकों से ईंधन की खपत कम करने को कह रहे हैं. ठीक है. लेकिन यह समझ तब क्यों नहीं आई जब हजारों गाड़ियों वाले चुनावी अभियान, अंतहीन रोड शो और लाखों समर्थकों को पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा रहा था? उसमें करोड़ों लीटर पेट्रोल-डीज़ल जला होगा. तब यह चिंता क्यों नहीं हुई? तब वोट हासिल करने के लिए बेहिसाब धनबल का इस्तेमाल क्यों किया गया?

'आपकी दिलचस्पी तो बस...'

उन्होंने लिखा कि लोगों को विदेश यात्राएं कम करने की सलाह भी दी जा रही है. लेकिन आज कितने भारतीय वास्तव में विदेश यात्रा कर पाते हैं? जो मध्यम वर्ग किसी तरह यह खर्च उठा भी सकता है, वह लगातार नौकरी की असुरक्षा में जी रहा है. छात्र विदेश इसलिए जाना चाहते हैं क्योंकि पिछले एक दशक में भारत ने उच्च शिक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं किया और घरेलू संस्थानों पर पर्याप्त भरोसा पैदा नहीं किया. आपकी दिलचस्पी तो बस हिंदी थोपने में दिखाई देती है.

ठाकरे ने लिखा कि इसी बीच विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं. अनुमान है कि पिछले कुछ महीनों में लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये बाहर जा चुके हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री (देवेंद्र फडणवीस) निवेश समझौते करने जाते हैं. लेकिन यदि वे समझौते भारतीय कंपनियों के साथ ही करने हैं, तो उसके लिए स्विट्जरलैंड जाने की क्या जरूरत है? प्रधानमंत्री स्वयं 15 मई से एक और बहु-देशीय विदेश यात्रा पर निकल रहे हैं. पहले इन यात्राओं को रद्द कीजिए, फिर देश को मितव्ययिता का पाठ पढ़ाइए.

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