पूरा पर्वत उठाने वाले बजरंगबली जब जल का घड़ा भी नहीं संभाल पा रहे थे, उज्जैन से जुड़ा है ये रोचक किस्सा
पवन पुत्र हनुमान को कुछ समझ नहीं आ रहा था. इसके बाद उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन पुकारा. महाकाल ने दर्शन देकर कहा कि सभी तीर्थ नदियों का जल मंदिर परिसर के कुंड में डाल दें.

भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन से पवन पुत्र हनुमान का एक ऐसा रोचक किस्सा जुड़ा है जब संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत लाने वाले हनुमान कुछ पल के लिए जल का घड़ा भी नहीं संभाल पा रहे थे. इसके बाद भगवान महाकाल ने हनुमान को रास्ता बताया और उनका मार्ग प्रशस्त करवाया. प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद शंकर व्यास के मुताबिक जब रावण वध के बाद भगवान रामचंद्र ने अयोध्या में राजसूय यज्ञ किया था, उस समय हनुमान को बुलाकर उन्होंने आदेश दिया कि सभी पवित्र नदियों का जल यज्ञ के लिए लाया जाए.
इस कार्य के लिए पवन पुत्र तैयार हो गए. जब हनुमान सभी पवित्र नदियों का जल लेकर उज्जैन पहुंचे और यहां शिप्रा नदी से पानी भरकर घड़ा ले जा रहे थे, उसी समय महाकालेश्वर मंदिर के ठीक ऊपर उनका घड़ा इतना भारी हो गया कि संभालना मुश्किल हो गया.
महाकाल की नगरी उज्जैन से जुड़ा है पवन पुत्र हनुमान का नाता
पवन पुत्र हनुमान को कुछ समझ नहीं आ रहा था. इसके बाद उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन पुकारा. भगवान महाकाल ने दर्शन देकर कहा कि सभी तीर्थ नदियों का जल मंदिर परिसर के कुंड में डाल दें और यहां से फिर जल लेकर चले जाएं. भगवान महाकाल का आदेश मिलते ही पवन पुत्र महाकाल मंदिर परिसर में उतरे और यहां पर घड़े का जल कुंड में प्रवाहित कर दिया.
इसके बाद कुंड से जल का घड़ा भरकर अयोध्या के लिए रवाना हुए. महाकाल मंदिर के पुजारी दिनेश शर्मा ने बताया कि राम भक्त हनुमान ने इस कुंड में सभी पवित्र नदियों का जल डाला था, उसे आज भी कोटि तीर्थ के नाम से जाना जाता है. भगवान महाकाल के दरबार में हनुमान जी के आने का प्रमाण सुरक्षित रखने के लिए कोटि तीर्थ पर हनुमान जी की प्रतिमा लगाई गई है.
इस प्रतिमा की खासियत है कि हमेशा हाथ में सौठा रखने वाले पवन पुत्र के हाथ में यहां एक घड़ा है और कोटि तीर्थ में घड़े का जल प्रवाहित करते हुए नजर आ रहे हैं. जिस कुंड में पवन पुत्र ने सभी नदियों का जल प्रवाहित किया था, उसी कोटि तीर्थ के जल से रोज भगवान महाकाल का जलाभिषेक होता है. भगवान महाकाल की आरती से पहले उनका जलाभिषेक होता है, इसके बाद उन्हें भाग और सूखे मेवे से सजाया जाता है.
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Source: IOCL






















