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लॉर्ड्स की बालकनी में टी-शर्ट लहराने वाले ‘दादा’ BCCI में क्या-क्या बदल देंगे?

एक समय जिस बीसीसीआई की तूती आईसीसी और वर्ल्ड क्रिकेट में बोलती थी वो कोर्ट केसों और तमाम तरह के सुधारों में फंसकर अपनी धाक गवाती गई. गांगुली की आदत हैं जहां भी रहते हैं धाक उन्हीं की होती है. तो अगले दो से तीन महीने में आईसीसी में दादा की दहाड़ भी सुनाई देगी और बीसीसीआई की धमक भी.

नई दिल्ली: जरुरी नहीं है कि महान नेता वही हो जो महान काम करे, महान नेता वो होता है जो लोगों से महान काम करवाने में सक्षम हो. ये कहना था अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का. भारतीय टीम के पूर्व कप्तान  सौरभ गांगुली के व्यक्तित्व में कुछ ख़ास है कि उन्हें देखते ही हिंदुस्तान को असंभव के संभव होने का भरोसा होने लगता है. 2000 के दशक में जब उन्होंने मैच फ़िक्सिंग के भंवर में फंसी टीम इंडिया की कमान संभाली, हिंदुस्तान में मन में ये भरोसा तबसे पैदा हो गया. 13 जुलाई 2002 को नेटवेस्ट ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में लॉर्ड्स की बॉलकनी में जीत के बाद शर्ट लहरा कर गांगुली ने इस भरोसे को और पुख़्ता कर दिया. वरना क्या भारतीय क्रिकेट में कोई सोच सकता था कि भद्रजनों के इस खेल की जन्मस्थली पर कोई कप्तान और वो भी हिंदुस्तानी ऐसा आएगा जो एक झटके में खेल का इतिहास, वर्तमान और भविष्य तीनों शर्ट लहराकर बदल देगा. ये गांगुली का वो गर्व है, जिसे अधिकतर लोग अभिमान समझते हैं. जिसने हिंदुस्तानी क्रिकेट की रवायत और ख़यालात दोनों बदल दिए- लड़ो-लड़ो-लड़ो- तब तक लड़ो जब तक जीत नहीं जाते. 2000 के दशक के किसी भी क्रिकेटर से पूछ लिजिए, गांगुली ने ये ‘लड़ना’ उनकी धमनियों में लहू बनाकर दौड़ा दिया था.

14 अक्टूबर 2019

गांगुली जब पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन और पूर्व कोषाध्यक्ष निरंजन शाह के साथ मुंबई के क्रिकेट सेंटर में बीसीसीआई के अध्यक्ष पद का नामांकन भरने गए, तो एक बार फिर हिंदुस्तान अपने दादा से असंभव को संभव बनाने की उम्मीद करने लगा. गांगुली ने जब कप्तानी संभाली तो टीम मुश्किल वक़्त में थी. गांगुली अब अध्यक्ष बनने जा रहे हैं तो बीसीसीआई मुश्किल में है. सवाल ये है कि गांगुली 23 अक्टूबर 2019 से सितंबर 2020 के बीच के 10 महीने में क्या बदल देंगे?

चयन समिति बदलेगी

जब गांगुली कप्तान थे तो चयन समिति का मतलब सिर्फ़ यही था कि वो जो टीम देते, उस पर चयनकर्ताओं को हस्ताक्षर करना था. ऐसा नहीं था कि गांगुली चयनकर्ताओं की सुनते नहीं थे या उन्हें अहमियत नहीं देते थे, लेकिन टीम वही होती थी जो उन्हें चाहिए. तय मानिए कि एमएसके प्रसाद की अगुवाई वाली मौजूदा चयन समिति अगले हफ़्ते आख़िरी बार टीम चुनेगी, बांग्लादेश के ख़िलाफ़.

नई चयन समिति में आएगा कौन?

जो लोग गांगुली को क़रीब से जानते हैं, वो ये समझते हैं कि अब गांगुली चयन समिति में उन महान खिलाड़ियों को चुन सकते हैं जिनकी क्रिकेट की समझ और जीत का जज़्बा बाक़ी सारे पहलुओं से ऊपर रहता है. ये नाम लक्ष्मण से लेकर तेंडुलकर तक कोई भी हो सकता है. युवराज-सहवाग के नाम से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट पर बदलेगा नियम

गांगुली कई बार कह चुके हैं कि बीसीसीआई की एथिक्स कमेटी बड़े खिलाड़ियों को कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट के नाम भारतीय क्रिकेट से जुड़ने की राह में सबसे बड़ी बाधा है. बतौर बीसीसीआई अध्यक्ष गांगुली इस पर जल्द ही कोई बड़ा फ़ैसला लेंगे ही लेंगे.

फ़र्स्ट क्लास क्रिकेटरों के ‘अच्छे दिन’ आ गए

नामांकन भरते समय ही गांगुली ने कहा कि उनकी प्राथमिकता प्रथम श्रेणी के क्रिकेटरों की हालत में सुधार करना है. पिछले तीन-चार सालों में जब से बीसीसीआई में CoA या कोर्ट का सीधा दखल हो रहा है, तबसे फर्स्ट क्लास क्रिकेटरों के भुगतान और सुविधाओं में भी फर्क पड़ा है. 23 अक्टूबर को गांगुली फर्स्ट क्लास के ढांचे और स्वरुप को लेकर कोई बड़ा एलान कर सकते हैं.

ICC में लौटेगी भारत की धमक?

एक समय जिस बीसीसीआई की तूती आईसीसी और वर्ल्ड क्रिकेट में बोलती थी वो कोर्ट केसों और तमाम तरह के सुधारों में फंसकर अपनी धाक गवाती गई. गांगुली की आदत हैं जहां भी रहते हैं धाक उन्हीं की होती है. तो अगले दो से तीन महीने में आईसीसी में दादा की दहाड़ भी सुनाई देगी और बीसीसीआई की धमक भी. रेवेन्यू के मसले से लेकर टूर एंड फ़िक्सचर कमेटी के निर्धारण तक आईसीसी के सामने अब बीसीसीआई अपनी आवाज़ बुलंद करेगा. अभी तक अंतरिम अध्यक्षों और सीईओ के दम पर बीसीसीआई ख़ुद अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, अब गांगुली आ गए हैं और कम से कम अगले दस महीनों तक बीसीसीआई ‘अनाथ’ नहीं है.

रवि शास्त्री का क्या होगा?

बतौर कप्तान गांगुली की एक ख़ासियत थी कि वो किसी के साथ अपनी अदावत भूलते नहीं थे और सही समय पर हिसाब भी बराबर करते थे, जैसा लॉर्ड्स की बॉलकनी से उन्होंने फ़्लिंटॉफ़ से हिसाब बराबर किया था. रवि शास्त्री से गांगुली की बनती नहीं है और ये पूरी दुनिया को पता है. रवि शास्त्री का बीसीसीआई के साथ करार दो साल का है. शास्त्री 2020 टी-20 वर्ल्ड कप तक टीम के कोच बने रहेंगे. लेकिन अब गांगुली की नज़र शास्त्री के हर काम, हर जीत, हर हार पर होगी. अभी तक बीसीसीआई की मौजूदा हालत में शास्त्री पर सीधे किसी की निगाह नहीं थी, अब होगी और ये निगाह ऐसी है जिसका ताप शास्त्री पहले भांप चुके हैं.

पहली बार बीसीसीआई को मिला ‘बड़ा ’ अध्यक्ष

बीसीसीआई 1928 में बनी और इसके 91 साल के इतिहास में पहली बार कोई अध्यक्ष ऐसा बना है, जिसे 400 से ज़्यादा इंटरनेशनल मैच खेलने का अनुभव है. वैसे भी बीसीसीआई के अध्यक्ष बनने वाले आखिरी टेस्ट क्रिकेटर महाराजा कुमार विजयनगरम थे, जो 1954 से 1956 तक अध्यक्ष रहे. उसके बाद साल 2014 में जब बोर्ड और कोर्ट के बीच विवाद चल रहा था तो पूर्व टेस्ट क्रिकेटर शिव लाल यादव और सुनील गावस्कर कुछ समय के लिए अंतरिम अध्यक्ष बने थे. लेकिन गांगुली पूर्ण अध्यक्ष बनकर आ रहे हैं. गांगुली की लीडरशिप में वो करिश्मा है कि अनजान से क्रिकेटरों को उन्होंने क्रिकेट का सबसे बड़ा मैच विनर बना दिया था. युवराज सिंह, हरभजन सिंह, ज़हीर खान, वीरेंद्र सहवाग ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें गांगुली की कप्तानी ने महान बनाया. अब वो कप्तान फ़िर लौट आया है, इस बार महानता हासिल करने की बारी भारतीय क्रिकेट की है.

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