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हर साल नए स्मार्टफोन, लेकिन बैटरी वही पुरानी! जानें क्या है असली वजह

Battery: आज इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियां एनर्जी स्टोर करने में काफी सक्षम हैं लेकिन इनमें कुछ कमियां भी हैं.

Battery: आज इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियां एनर्जी स्टोर करने में काफी सक्षम हैं लेकिन इनमें कुछ कमियां भी हैं.

स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की दुनिया में पिछले तीन दशकों से लिथियम-आयन बैटरियों का दबदबा है. इन बैटरियों ने हमारी जिंदगी को काफी आसान बनाया है लेकिन इनके बावजूद आज भी कई कमियां मौजूद हैं. यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसी नई बैटरियों पर काम कर रहे हैं जो ज्यादा सेफ, सस्ती और पर्यावरण के लिए भी बेहतर हों. हालांकि सवाल ये है कि जब टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है तो नई बैटरी तैयार होने में इतना लंबा समय क्यों लगता है?

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आज इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियां एनर्जी स्टोर करने में काफी सक्षम हैं लेकिन इनमें कुछ कमियां भी हैं. ये बैटरी कुछ भारी होती हैं और कई बार खराब होने पर आग भी पकड़ने का खतरा बना रहता है. इसके अलावा इन्हें बनाने में लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसी कैमिकल की जरूरत पड़ती है जिनका खनन प्रोसेस महंगी होने के साथ-साथ पर्यावरण और सोशल लेवल पर भी कई चुनौतियां पैदा करती है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आज इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियां एनर्जी स्टोर करने में काफी सक्षम हैं लेकिन इनमें कुछ कमियां भी हैं. ये बैटरी कुछ भारी होती हैं और कई बार खराब होने पर आग भी पकड़ने का खतरा बना रहता है. इसके अलावा इन्हें बनाने में लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसी कैमिकल की जरूरत पड़ती है जिनका खनन प्रोसेस महंगी होने के साथ-साथ पर्यावरण और सोशल लेवल पर भी कई चुनौतियां पैदा करती है.
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नॉर्वे के वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी एक मटेरियल को दूसरे मटेरियल से बदल देना ही नई बैटरी बनाना नहीं होता है. दरअसल, बैटरी के हर हिस्से को एक-दूसरे के साथ पूरी तरह तालमेल में काम करना होता है.
नॉर्वे के वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी एक मटेरियल को दूसरे मटेरियल से बदल देना ही नई बैटरी बनाना नहीं होता है. दरअसल, बैटरी के हर हिस्से को एक-दूसरे के साथ पूरी तरह तालमेल में काम करना होता है.
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अगर किसी एक हिस्से में बदलाव किया जाए तो पूरी बैटरी के काम करने का तरीका पूरी तरह से बदल सकता है. इसलिए नई टेक्नोलॉजी तैयार करने में सालों तक लगातार टेस्टिंग और सुधार करने पड़ते हैं.
अगर किसी एक हिस्से में बदलाव किया जाए तो पूरी बैटरी के काम करने का तरीका पूरी तरह से बदल सकता है. इसलिए नई टेक्नोलॉजी तैयार करने में सालों तक लगातार टेस्टिंग और सुधार करने पड़ते हैं.
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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में सिक्के के आकार की छोटी बैटरियां तैयार करते हैं. इन मिनी बैटरियों के जरिए अलग-अलग मटेरियल का टेस्ट किया जाता है. इससे बिना बड़े पैमाने पर प्रोडक्टिविटी किए ये समझा जा सकता है कि नया मटेरियल कितना असरदार और सुरक्षित है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में सिक्के के आकार की छोटी बैटरियां तैयार करते हैं. इन मिनी बैटरियों के जरिए अलग-अलग मटेरियल का टेस्ट किया जाता है. इससे बिना बड़े पैमाने पर प्रोडक्टिविटी किए ये समझा जा सकता है कि नया मटेरियल कितना असरदार और सुरक्षित है.
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इसी तरह कुछ शोधकर्ता लिथियम की जगह एल्यूमिनियम और ग्रेफाइट बेस्ड बैटरियों पर भी काम कर रहे हैं. एल्यूमिनियम आसानी से उपलब्ध और सस्ता धातु है इसलिए आगे आने वाले समय में इससे बैटरी की लागत कम हो सकती है.
इसी तरह कुछ शोधकर्ता लिथियम की जगह एल्यूमिनियम और ग्रेफाइट बेस्ड बैटरियों पर भी काम कर रहे हैं. एल्यूमिनियम आसानी से उपलब्ध और सस्ता धातु है इसलिए आगे आने वाले समय में इससे बैटरी की लागत कम हो सकती है.
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आपको बता दें कि किसी भी नई बैटरी को बाजार में लाने से पहले उसे सैकड़ों या हजारों बार चार्ज और डिस्चार्ज किया जाता है. इसके बाद वैज्ञानिक एडवांस माइक्रोस्कोप और कैमिकल जांच की मदद से ये चेक करते हैं कि बैटरी के अंदर समय के साथ क्या बदलाव हुए और उसकी ताकत क्यों कम हुई. इसी प्रोसेस से कमजोरियों की पहचान होती है और डिजाइन में सुधार किया जाता है.
आपको बता दें कि किसी भी नई बैटरी को बाजार में लाने से पहले उसे सैकड़ों या हजारों बार चार्ज और डिस्चार्ज किया जाता है. इसके बाद वैज्ञानिक एडवांस माइक्रोस्कोप और कैमिकल जांच की मदद से ये चेक करते हैं कि बैटरी के अंदर समय के साथ क्या बदलाव हुए और उसकी ताकत क्यों कम हुई. इसी प्रोसेस से कमजोरियों की पहचान होती है और डिजाइन में सुधार किया जाता है.
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बैटरी के अंदर मौजूद इलेक्ट्रोलाइट वो जरिया होता है जो चार्ज पार्टिकल्स को एक इलेक्ट्रोड से दूसरे तक पहुंचाता है. अगर इलेक्ट्रोलाइट और इलेक्ट्रोड आपस में सही तरीके से काम नहीं करते हैं तो पूरी बैटरी बेकार साबित हो सकती है. इसलिए सही इलेक्ट्रोलाइट को चुनना बैटरी डेवलपमेंट की सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक माना जाता है.
बैटरी के अंदर मौजूद इलेक्ट्रोलाइट वो जरिया होता है जो चार्ज पार्टिकल्स को एक इलेक्ट्रोड से दूसरे तक पहुंचाता है. अगर इलेक्ट्रोलाइट और इलेक्ट्रोड आपस में सही तरीके से काम नहीं करते हैं तो पूरी बैटरी बेकार साबित हो सकती है. इसलिए सही इलेक्ट्रोलाइट को चुनना बैटरी डेवलपमेंट की सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक माना जाता है.

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