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Space से कैसे ली जाती है फोटो? जानें किस टेक्नोलॉजी का होता है इस्तेमाल

Space Technology: धरती की तस्वीरें लेने का सबसे मेन जरिया पृथ्वी चारों ओर घूमने वाले सैटेलाइट होते हैं.

Space Technology: धरती की तस्वीरें लेने का सबसे मेन जरिया पृथ्वी चारों ओर घूमने वाले सैटेलाइट होते हैं.

जब हम अंतरिक्ष से धरती की फोटो देखते हैं तो नीले समुद्र, हरे-भरे जंगल, सफेद बादल और महाद्वीप बेहद साफ दिखाई देते हैं. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर इतनी ऊंचाई से धरती की फोटो कैसे खींची जाती है? क्या अंतरिक्ष में मौजूद कैमरे बिल्कुल हमारे स्मार्टफोन के कैमरे की तरह काम करते हैं? आइए जानते हैं क्या है इसकी पीछे की टेक्नोलॉजी.

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि धरती की तस्वीरें लेने का सबसे मेन जरिया पृथ्वी चारों ओर घूमने वाले सैटेलाइट होते हैं. इन सैटेलाइट में स्पेशल टाइप के कैमरे और सेंसर लगाए जाते हैं जो धरती के सर्फेस से आने वाली लाइट और दूसरी तरह की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी को रिकॉर्ड करते हैं. कुछ सैटेलाइट बेहद ऊंचे ऑर्बिट में रहते हैं जबकि कुछ पृथ्वी के काफी करीब यानी लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में घूमते हैं. सैटेलाइट जितना धरती के करीब होगा, उसके सेंसर को सर्फेस की ज्यादा बारीक जानकारी कैप्चर करने में मदद मिलती है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि धरती की तस्वीरें लेने का सबसे मेन जरिया पृथ्वी चारों ओर घूमने वाले सैटेलाइट होते हैं. इन सैटेलाइट में स्पेशल टाइप के कैमरे और सेंसर लगाए जाते हैं जो धरती के सर्फेस से आने वाली लाइट और दूसरी तरह की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी को रिकॉर्ड करते हैं. कुछ सैटेलाइट बेहद ऊंचे ऑर्बिट में रहते हैं जबकि कुछ पृथ्वी के काफी करीब यानी लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में घूमते हैं. सैटेलाइट जितना धरती के करीब होगा, उसके सेंसर को सर्फेस की ज्यादा बारीक जानकारी कैप्चर करने में मदद मिलती है.
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इसके अलावा स्पेस से फोटो लेने वाली टेक्नोलॉजी में सिर्फ नॉर्मल कैमरा ही जरूरी नहीं होता है. यहां इमेज सेंसर सबसे अहम रोल निभाते हैं. ये सेंसर अलग-अलग टाइप की लाइट को रिकॉर्ड कर सकते हैं. उदाहरण के लिए बता दें कि कुछ सेंसर ऐसी रोशनी पकड़ते हैं जिसे हमारी आंखें देख सकती हैं. वहीं कुछ सेंसर इन्फ्रारेड जैसी ऐसी रेज को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं जिन्हें इंसान अपनी आंखों से नहीं देख सकते हैं.
इसके अलावा स्पेस से फोटो लेने वाली टेक्नोलॉजी में सिर्फ नॉर्मल कैमरा ही जरूरी नहीं होता है. यहां इमेज सेंसर सबसे अहम रोल निभाते हैं. ये सेंसर अलग-अलग टाइप की लाइट को रिकॉर्ड कर सकते हैं. उदाहरण के लिए बता दें कि कुछ सेंसर ऐसी रोशनी पकड़ते हैं जिसे हमारी आंखें देख सकती हैं. वहीं कुछ सेंसर इन्फ्रारेड जैसी ऐसी रेज को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं जिन्हें इंसान अपनी आंखों से नहीं देख सकते हैं.
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इसी वजह से सैटेलाइट इमेजिंग का इस्तेमाल केवल खूबसूरत तस्वीरें लेने के लिए नहीं बल्कि खेती, जंगल, मौसम, बाढ़, सूखा और शहरी डेवलपमेंट जैसी चीजों की निगरानी में भी किया जाता है.
इसी वजह से सैटेलाइट इमेजिंग का इस्तेमाल केवल खूबसूरत तस्वीरें लेने के लिए नहीं बल्कि खेती, जंगल, मौसम, बाढ़, सूखा और शहरी डेवलपमेंट जैसी चीजों की निगरानी में भी किया जाता है.
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आपको बता दें कि जब सैटेलाइट पृथ्वी के ऊपर से गुजरता है तो उसके सेंसर धरती के सर्फेस से वापस आने वाली लाइट या एनर्जी को रिकॉर्ड करते हैं. सेंसर में मौजूद डिटेक्टर इस एनर्जी को डिजिटल डेटा में बदल देते हैं. इसके बाद सैटेलाइट के कंप्यूटर सिस्टम इस डेटा को प्रोसेस करते हैं और रेडियो कम्युनिकेशन के जरिए पृथ्वी पर मौजूद ग्राउंड स्टेशन तक भेजा जाता है.
आपको बता दें कि जब सैटेलाइट पृथ्वी के ऊपर से गुजरता है तो उसके सेंसर धरती के सर्फेस से वापस आने वाली लाइट या एनर्जी को रिकॉर्ड करते हैं. सेंसर में मौजूद डिटेक्टर इस एनर्जी को डिजिटल डेटा में बदल देते हैं. इसके बाद सैटेलाइट के कंप्यूटर सिस्टम इस डेटा को प्रोसेस करते हैं और रेडियो कम्युनिकेशन के जरिए पृथ्वी पर मौजूद ग्राउंड स्टेशन तक भेजा जाता है.
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ग्राउंड स्टेशन पर वैज्ञानिक और कंप्यूटर सिस्टम इस कच्चे डेटा को प्रोसेस करके फोटो तैयार करते हैं. इस दौरान फोटो की ब्राइटनेस, कॉन्ट्रास्ट, रंग और दूसरी टेक्निकल चीजों को ठीक किया जा सकता है. सैटेलाइट इमेजिंग की एक खासियत ये है कि इसमें धरती को अलग-अलग स्पेक्ट्रल बैंड में देखा जा सकता है. हर सर्फेस लाइट की अलग-अलग रेज को अलग तरीके से रिफ्लेक्ट करती है.
ग्राउंड स्टेशन पर वैज्ञानिक और कंप्यूटर सिस्टम इस कच्चे डेटा को प्रोसेस करके फोटो तैयार करते हैं. इस दौरान फोटो की ब्राइटनेस, कॉन्ट्रास्ट, रंग और दूसरी टेक्निकल चीजों को ठीक किया जा सकता है. सैटेलाइट इमेजिंग की एक खासियत ये है कि इसमें धरती को अलग-अलग स्पेक्ट्रल बैंड में देखा जा सकता है. हर सर्फेस लाइट की अलग-अलग रेज को अलग तरीके से रिफ्लेक्ट करती है.
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बताते चलें कि हर समय धरती की साफ फोटो लेना संभव नहीं होता है. बादल, धुंध और रात जैसी कंडिशन नॉर्मल ऑप्टिकल कैमरों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं. ऐसे में Synthetic Aperture Radar यानी SAR जैसी टेक्नोलॉजी बेहद कारगर होती हैं. SAR सैटेलाइट खुद माइक्रोवेव सिग्नल भेजता है और धरती से वापस आने वाले सिग्नल को रिकॉर्ड करता है. इसकी मदद से बादलों के बावजूद कई कंडिशन में पृथ्वी की सर्फेस की जानकारी हासिल की जा सकती है. यही कारण है कि रडार इमेजिंग का इस्तेमाल बाढ़, भूस्खलन, बर्फ और जमीन में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए किया जाता है.
बताते चलें कि हर समय धरती की साफ फोटो लेना संभव नहीं होता है. बादल, धुंध और रात जैसी कंडिशन नॉर्मल ऑप्टिकल कैमरों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं. ऐसे में Synthetic Aperture Radar यानी SAR जैसी टेक्नोलॉजी बेहद कारगर होती हैं. SAR सैटेलाइट खुद माइक्रोवेव सिग्नल भेजता है और धरती से वापस आने वाले सिग्नल को रिकॉर्ड करता है. इसकी मदद से बादलों के बावजूद कई कंडिशन में पृथ्वी की सर्फेस की जानकारी हासिल की जा सकती है. यही कारण है कि रडार इमेजिंग का इस्तेमाल बाढ़, भूस्खलन, बर्फ और जमीन में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए किया जाता है.
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जानकारी के लिए बता दें कि अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है कि सैटेलाइट का सेंसर कितनी बारीकी से धरती के सर्फेस को रिकॉर्ड कर सकता है. इसे समझने के लिए Spatial Resolution जरूरी है. हाई spatial resolution का मतलब है कि फोटो में छोटी-छोटी चीजों को भी अलग-अलग पहचाना जा सकता है. वहीं, कम resolution वाली फोटो में ज्यादा बड़ा क्षेत्र दिखाई देता है लेकिन छोटी चीजों की जानकारी साफ तरीके से नहीं मिल पाती है. इसके अलावा सैटेलाइट की स्थिति, सेंसर की ताकत, मौसम और फोटो प्रोसेस करने की टेक्नोलॉजी भी रिजल्ट्स पर असर डालती हैं.
जानकारी के लिए बता दें कि अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है कि सैटेलाइट का सेंसर कितनी बारीकी से धरती के सर्फेस को रिकॉर्ड कर सकता है. इसे समझने के लिए Spatial Resolution जरूरी है. हाई spatial resolution का मतलब है कि फोटो में छोटी-छोटी चीजों को भी अलग-अलग पहचाना जा सकता है. वहीं, कम resolution वाली फोटो में ज्यादा बड़ा क्षेत्र दिखाई देता है लेकिन छोटी चीजों की जानकारी साफ तरीके से नहीं मिल पाती है. इसके अलावा सैटेलाइट की स्थिति, सेंसर की ताकत, मौसम और फोटो प्रोसेस करने की टेक्नोलॉजी भी रिजल्ट्स पर असर डालती हैं.
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बता दें कि स्मार्टफोन कैमरा ऐसी फोटो लेता है जो इंसानी आंखों से आसानी से देखी जा सके. वहीं, सैटेलाइट इमेजिंग सिस्टम को वैज्ञानिक और निगरानी के मकसद के लिए डिजाइन किया जाता है. इसमें ऑप्टिकल कैमरा, मल्टीस्पेक्ट्रल सेंसर, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और रडार जैसी अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है. इसका मतलब साफ है कि स्पेस से धरती की एक फोटो के पीछे सिर्फ कैमरा नहीं बल्कि सैटेलाइट, सेंसर, डेटा ट्रांसमिशन और कंप्यूटर प्रोसेसिंग की पूरी टेक्निकल सिस्टम काम करती है.
बता दें कि स्मार्टफोन कैमरा ऐसी फोटो लेता है जो इंसानी आंखों से आसानी से देखी जा सके. वहीं, सैटेलाइट इमेजिंग सिस्टम को वैज्ञानिक और निगरानी के मकसद के लिए डिजाइन किया जाता है. इसमें ऑप्टिकल कैमरा, मल्टीस्पेक्ट्रल सेंसर, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और रडार जैसी अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है. इसका मतलब साफ है कि स्पेस से धरती की एक फोटो के पीछे सिर्फ कैमरा नहीं बल्कि सैटेलाइट, सेंसर, डेटा ट्रांसमिशन और कंप्यूटर प्रोसेसिंग की पूरी टेक्निकल सिस्टम काम करती है.

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