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क्या TV की भी होती है एक्सपायरी डेट? जानिए वह सच, जिसके बारे में कंपनियां खुलकर बात नहीं करतीं

Smart TV: कुछ समय पहले मेरा 32 इंच का LED टीवी अचानक खराब हो गया.

Smart TV: कुछ समय पहले मेरा 32 इंच का LED टीवी अचानक खराब हो गया.

जब भी कोई नया टीवी खरीदने की बात आती है तो लोग स्क्रीन साइज, डिस्प्ले टेक्नोलॉजी, साउंड क्वालिटी और स्मार्ट फीचर्स पर ज्यादा ध्यान देते हैं. लेकिन एक सवाल ऐसा है जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है आखिर एक टीवी कितने साल तक चलता है? क्या उसकी भी कोई एक्सपायरी डेट होती है? कंपनियां इस बारे में बहुत कम जानकारी देती हैं जबकि हकीकत यह है कि हर टीवी की उम्र सीमित होती है और समय के साथ उसकी परफॉर्मेंस धीरे-धीरे कम होने लगती है.

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कुछ समय पहले मेरा 32 इंच का LED टीवी अचानक खराब हो गया. जांच करने पर पता चला कि नमी के कारण डिस्प्ले तक बिजली पहुंचाने वाला एक महत्वपूर्ण पार्ट खराब हो चुका था. उसकी मरम्मत पर इतना खर्च आने वाला था कि थोड़ा और पैसा जोड़कर नया टीवी खरीदना ज्यादा बेहतर विकल्प लगा. इसी घटना के बाद यह जानने की उत्सुकता बढ़ी कि आखिर एक टीवी की वास्तविक उम्र कितनी होती है.
कुछ समय पहले मेरा 32 इंच का LED टीवी अचानक खराब हो गया. जांच करने पर पता चला कि नमी के कारण डिस्प्ले तक बिजली पहुंचाने वाला एक महत्वपूर्ण पार्ट खराब हो चुका था. उसकी मरम्मत पर इतना खर्च आने वाला था कि थोड़ा और पैसा जोड़कर नया टीवी खरीदना ज्यादा बेहतर विकल्प लगा. इसी घटना के बाद यह जानने की उत्सुकता बढ़ी कि आखिर एक टीवी की वास्तविक उम्र कितनी होती है.
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टीवी की लाइफ का सबसे बड़ा आधार उसका डिस्प्ले होता है. LED, OLED और Mini LED जैसी तकनीकों में स्क्रीन की कार्यक्षमता अलग-अलग होती है लेकिन हर डिस्प्ले की एक निश्चित जीवन अवधि होती है. कुछ साल पहले OLED पैनल बनाने वाली प्रमुख कंपनियों ने दावा किया था कि उनकी स्क्रीन लगभग 1 लाख घंटे तक काम कर सकती हैं. यह आंकड़ा सुनने में बहुत बड़ा लगता है.
टीवी की लाइफ का सबसे बड़ा आधार उसका डिस्प्ले होता है. LED, OLED और Mini LED जैसी तकनीकों में स्क्रीन की कार्यक्षमता अलग-अलग होती है लेकिन हर डिस्प्ले की एक निश्चित जीवन अवधि होती है. कुछ साल पहले OLED पैनल बनाने वाली प्रमुख कंपनियों ने दावा किया था कि उनकी स्क्रीन लगभग 1 लाख घंटे तक काम कर सकती हैं. यह आंकड़ा सुनने में बहुत बड़ा लगता है.
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अगर कोई व्यक्ति औसतन प्रतिदिन 6 घंटे टीवी देखता है तो सैद्धांतिक रूप से यह अवधि कई दशकों तक पहुंच सकती है. लेकिन वास्तविक जीवन में टीवी की उम्र केवल डिस्प्ले के घंटों से तय नहीं होती. बिजली की अनियमित आपूर्ति, धूल, गर्मी, नमी और अंदर लगे इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के घिसने जैसी समस्याएं इसकी लाइफ को काफी कम कर देती हैं.
अगर कोई व्यक्ति औसतन प्रतिदिन 6 घंटे टीवी देखता है तो सैद्धांतिक रूप से यह अवधि कई दशकों तक पहुंच सकती है. लेकिन वास्तविक जीवन में टीवी की उम्र केवल डिस्प्ले के घंटों से तय नहीं होती. बिजली की अनियमित आपूर्ति, धूल, गर्मी, नमी और अंदर लगे इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के घिसने जैसी समस्याएं इसकी लाइफ को काफी कम कर देती हैं.
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विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश टीवी सामान्य परिस्थितियों में करीब 7 से 10 साल तक अच्छी तरह काम करते हैं. इसके बाद उनमें किसी न किसी तरह की समस्या दिखने लगती है. कई बार डिस्प्ले ठीक रहता है लेकिन पावर सप्लाई, मदरबोर्ड या बैकलाइट जैसे हिस्से जवाब देने लगते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश टीवी सामान्य परिस्थितियों में करीब 7 से 10 साल तक अच्छी तरह काम करते हैं. इसके बाद उनमें किसी न किसी तरह की समस्या दिखने लगती है. कई बार डिस्प्ले ठीक रहता है लेकिन पावर सप्लाई, मदरबोर्ड या बैकलाइट जैसे हिस्से जवाब देने लगते हैं.
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यही कारण है कि कागजों पर दिखाई देने वाली लाइफ और वास्तविक उपयोग के दौरान मिलने वाली लाइफ में काफी अंतर होता है. टीवी की गुणवत्ता की जांच करने वाली कई प्रयोगशालाओं ने अलग-अलग ब्रांड्स के टीवी को लंबे समय तक लगातार चलाकर उनकी क्षमता को परखा. इन परीक्षणों में स्क्रीन पर ऐसे वीडियो दिखाए गए जिनमें न्यूज चैनलों के लोगो, टिकर या अन्य स्थिर तत्व हमेशा एक ही स्थान पर बने रहते थे.
यही कारण है कि कागजों पर दिखाई देने वाली लाइफ और वास्तविक उपयोग के दौरान मिलने वाली लाइफ में काफी अंतर होता है. टीवी की गुणवत्ता की जांच करने वाली कई प्रयोगशालाओं ने अलग-अलग ब्रांड्स के टीवी को लंबे समय तक लगातार चलाकर उनकी क्षमता को परखा. इन परीक्षणों में स्क्रीन पर ऐसे वीडियो दिखाए गए जिनमें न्यूज चैनलों के लोगो, टिकर या अन्य स्थिर तत्व हमेशा एक ही स्थान पर बने रहते थे.
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परीक्षण के दौरान यह सामने आया कि OLED टीवी में बर्न-इन नाम की समस्या वास्तव में मौजूद है. इसका मतलब है कि अगर लंबे समय तक स्क्रीन पर कोई एक ही इमेज या लोगो दिखाई देता रहे तो उसकी हल्की छाप स्थायी रूप से स्क्रीन पर रह सकती है. जो लोग लगातार एक ही चैनल देखते हैं या घंटों तक एक ही गेम खेलते हैं उनमें यह समस्या देखने को मिल सकती है.
परीक्षण के दौरान यह सामने आया कि OLED टीवी में बर्न-इन नाम की समस्या वास्तव में मौजूद है. इसका मतलब है कि अगर लंबे समय तक स्क्रीन पर कोई एक ही इमेज या लोगो दिखाई देता रहे तो उसकी हल्की छाप स्थायी रूप से स्क्रीन पर रह सकती है. जो लोग लगातार एक ही चैनल देखते हैं या घंटों तक एक ही गेम खेलते हैं उनमें यह समस्या देखने को मिल सकती है.
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अक्सर माना जाता है कि LED या LCD टीवी OLED की तुलना में ज्यादा टिकाऊ होते हैं. हालांकि परीक्षणों में यह भी सामने आया कि LED टीवी की अपनी अलग कमजोरियां हैं. इनमें स्क्रीन के पीछे लगी बैकलाइट समय के साथ खराब होने लगती है. जब बैकलाइट कमजोर पड़ती है तो स्क्रीन पर काले धब्बे, असमान रोशनी या ब्राइटनेस की कमी जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं. कुछ मामलों में बैकलाइट पूरी तरह खराब हो जाने से टीवी देखने का अनुभव काफी प्रभावित हो जाता है.
अक्सर माना जाता है कि LED या LCD टीवी OLED की तुलना में ज्यादा टिकाऊ होते हैं. हालांकि परीक्षणों में यह भी सामने आया कि LED टीवी की अपनी अलग कमजोरियां हैं. इनमें स्क्रीन के पीछे लगी बैकलाइट समय के साथ खराब होने लगती है. जब बैकलाइट कमजोर पड़ती है तो स्क्रीन पर काले धब्बे, असमान रोशनी या ब्राइटनेस की कमी जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं. कुछ मामलों में बैकलाइट पूरी तरह खराब हो जाने से टीवी देखने का अनुभव काफी प्रभावित हो जाता है.
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टीवी की उम्र बढ़ने के साथ कुछ बदलाव साफ दिखाई देने लगते हैं. यदि स्क्रीन की चमक पहले जैसी नहीं रही, रंग फीके या असामान्य दिखने लगे या सफेद रंग में पीले और नीलेपन की झलक आने लगे तो यह डिस्प्ले के कमजोर होने का संकेत हो सकता है.
टीवी की उम्र बढ़ने के साथ कुछ बदलाव साफ दिखाई देने लगते हैं. यदि स्क्रीन की चमक पहले जैसी नहीं रही, रंग फीके या असामान्य दिखने लगे या सफेद रंग में पीले और नीलेपन की झलक आने लगे तो यह डिस्प्ले के कमजोर होने का संकेत हो सकता है.
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इसके अलावा कई स्मार्ट टीवी में कुछ वर्षों बाद सॉफ्टवेयर अपडेट मिलना बंद हो जाते हैं. इसके कारण ऐप्स ठीक से काम नहीं करते, टीवी धीमा हो जाता है और हैंग होने जैसी परेशानियां बढ़ जाती हैं. इसे तकनीकी रूप से हार्डवेयर नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर की उम्र खत्म होना माना जाता है.
इसके अलावा कई स्मार्ट टीवी में कुछ वर्षों बाद सॉफ्टवेयर अपडेट मिलना बंद हो जाते हैं. इसके कारण ऐप्स ठीक से काम नहीं करते, टीवी धीमा हो जाता है और हैंग होने जैसी परेशानियां बढ़ जाती हैं. इसे तकनीकी रूप से हार्डवेयर नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर की उम्र खत्म होना माना जाता है.
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सीधे शब्दों में कहें तो टीवी पर किसी दवा या खाद्य पदार्थ की तरह एक्सपायरी डेट नहीं लिखी होती. फिर भी हर टीवी की एक सीमित उम्र होती है. डिस्प्ले, बैकलाइट, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और सॉफ्टवेयर सपोर्ट मिलकर तय करते हैं कि आपका टीवी कितने समय तक बेहतर प्रदर्शन करेगा. सामान्य तौर पर यदि टीवी की देखभाल सही तरीके से की जाए और बिजली की समस्या से बचाया जाए तो वह कई वर्षों तक आराम से चल सकता है. लेकिन समय के साथ उसकी गुणवत्ता में गिरावट आना एक स्वाभाविक प्रोसेस है जिसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता.
सीधे शब्दों में कहें तो टीवी पर किसी दवा या खाद्य पदार्थ की तरह एक्सपायरी डेट नहीं लिखी होती. फिर भी हर टीवी की एक सीमित उम्र होती है. डिस्प्ले, बैकलाइट, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और सॉफ्टवेयर सपोर्ट मिलकर तय करते हैं कि आपका टीवी कितने समय तक बेहतर प्रदर्शन करेगा. सामान्य तौर पर यदि टीवी की देखभाल सही तरीके से की जाए और बिजली की समस्या से बचाया जाए तो वह कई वर्षों तक आराम से चल सकता है. लेकिन समय के साथ उसकी गुणवत्ता में गिरावट आना एक स्वाभाविक प्रोसेस है जिसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता.

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