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सद्दाम से शुरू हुई कहानी का THE END! 23 साल बाद इराक से लौटेंगे अमेरिकी सैनिक

करीब 23 साल बाद इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी खत्म होने जा रही है। इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के कार्यालय ने इस बात की जानकारी दी है.

करीब 23 वर्षों से इराक में तैनात अमेरिकी सेना अब अपनी सैन्य मौजूदगी पूरी तरह समाप्त करने जा रही है. इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने घोषणा की है कि 30 सितंबर 2026 तक सभी अमेरिकी सैनिक इराक छोड़ देंगे. प्रधानमंत्री ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर के साथ बैठक के बाद इसकी पुष्टि की. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब मध्य-पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है और क्षेत्र में युद्धविराम की स्थिति अभी तक स्पष्ट नहीं है.

23 साल पुराने सैन्य अध्याय का होगा अंत

इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी, जब अमेरिका और नाटो देशों ने तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के शासन को हटाने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया था. सद्दाम हुसैन की गिरफ्तारी, जेल और फांसी के बाद भी अमेरिकी सेना इराक में बनी रही.

हालांकि, वर्ष 2011 में अमेरिका ने अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा की थी, लेकिन 2014 में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के बढ़ते खतरे के बाद अमेरिकी सैनिकों की दोबारा तैनाती कर दी गई थी. अब 30 सितंबर के साथ इराक में अमेरिकी सेना की 23 साल लंबी मौजूदगी का औपचारिक अंत हो जाएगा.

30 सितंबर वापसी की अंतिम तारीख

प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इराक में ISIS के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन के सैन्य मिशन को समाप्त करने और सैनिकों की वापसी पूरी करने के लिए 30 सितंबर को अंतिम तारीख तय की गई है. बयान में कहा गया, “1 अक्टूबर इराक के लिए एक नए दौर की शुरुआत होगी, क्योंकि देश किसी भी विदेशी सैन्य मौजूदगी से मुक्त हो जाएगा.”

ईरान तनाव के बीच बदला रणनीतिक समीकरण

अमेरिकी सेना की वापसी ऐसे समय में हो रही है, जब ईरान के साथ अमेरिका का तनाव लगातार बना हुआ है. माना जा रहा था कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है तो अमेरिका इराक की सीमा से ईरान के खिलाफ संभावित जमीनी अभियान शुरू कर सकता है. हालांकि, सैनिकों की वापसी के फैसले के बाद ऐसी संभावना अब काफी कमजोर मानी जा रही है. मध्य-पूर्व में हालिया संघर्ष के दौरान ईरान समर्थित हमलों में इराक स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों, विशेषकर ग्रीन ज़ोन और इरबिल मिलिट्री बेस, को भी नुकसान पहुंचा था.

इरबिल से सैनिकों की वापसी पहले ही शुरू

इराकी कुर्द अधिकारियों के अनुसार, उत्तरी कुर्द क्षेत्र इरबिल से अमेरिकी सैनिकों और सैन्य उपकरणों को हटाने की प्रक्रिया लगभग तीन सप्ताह पहले ही शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेना पिछले वर्ष इराक के अधिकांश सैन्य अड्डों को खाली कर चुकी थी, जबकि उसकी सीमित मौजूदगी केवल उत्तरी कुर्द क्षेत्र में बची हुई थी.

2024 के समझौते के तहत हो रही वापसी

अमेरिका और इराक के बीच वर्ष 2024 में इस बात पर सहमति बनी थी कि ISIS के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य अभियानों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा. इसी समझौते के तहत अब अमेरिकी सैनिकों की अंतिम वापसी की प्रक्रिया पूरी की जा रही है.

अमेरिकी अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि सेना की वापसी 30 सितंबर तक पूरी होने की उम्मीद है, हालांकि उन्होंने इराक में बचे सैनिकों की संख्या या उनकी भविष्य की तैनाती को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है.

नीरज राजपूत देश के जाने-माने डिफेंस-जर्नलिस्ट और वॉर-लेखक हैं. पत्रकारिता में करीब ढाई दशक का अनुभव रखते हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया तीनों में गहरी पकड़ है.

वर्तमान में वे ABP नेटवर्क से जुड़े हैं, जहाँ युद्ध, रक्षा, नेशनल सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिक्स से संबंधित विषयों को कवर करते हैं. ABP लाइव पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘गेम-चेंजर’ के प्रस्तुतकर्ता भी हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर उन्होंने पहली हिंदी पुस्तक "ऑपरेशन Z लाइव" लिखी, जो बेस्टसेलर सूची में भी शामिल हुई और पाठकों द्वारा खूब सराही गई.

रिपोर्टिंग का दायरा
- दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन से लेकर आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर और चीन सीमा पर तिब्बत के पठार तक
- पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर-स्ट्राइक से लेकर पनडुब्बी के जरिए समुद्र के भीतर तक
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके एक्सक्लूसिव खुलासे और सटीक विश्लेषणों की व्यापक सराहना हुई
- यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में मारियुपोल, डोनेत्स्क और लुहांस्क जैसे एक्टिव वॉर-जोन से रिपोर्टिंग. इसी अनुभव पर आधारित उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई
- दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक उत्तर-दक्षिण कोरिया की DMZ
- ⁠अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डों में से एक JBLM, और शीत युद्ध के दौरान "गैर-मौजूद" माने जाने वाले रूसी सैन्य अड्डों से भी ग्राउंड रिपोर्टिंग. 
- ⁠वे उन चुनिंदा रक्षा जुड़े पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के पहले स्वदेशी अटैक हेलिकॉप्टर LCH-प्रचंड के कॉकपिट में उड़ान भरी है. इसके अलावा फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान निर्माण सुविधा से भी उन्होंने विशेष रिपोर्टिंग की.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'Defence Correspondent Course' के Alumni हैं.

पूर्व कार्य अनुभव
- STAR NEWS में लगभग 6 वर्षों तक चीफ रिपोर्टर (क्राइम) के तौर पर कार्य किया और लोकप्रिय क्राइम शो 'सनसनी' से जुड़े रहे
- पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक नेशनल हेराल्ड से की
- इसके बाद B.A.G. Films के साथ जुड़कर STAR NEWS के लिए क्राइम शो बनाए
- SAHARA TV में भी लगभग 2 वर्षों तक कार्यरत रहे

रक्षा और सुरक्षा के मामलों पर उनकी पकड़, ग्राउंड-जीरो रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद डिफेंस जर्नलिस्ट्स में स्थापित करती है.

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