Navgrah Katha 4: नवग्रहों में पढ़ें बुध देव की कथा
Navgrah Budh Dev Katha: नवग्रहों में बुध देव ने अपने स्वरूप, शक्ति व प्रभाव का वर्णन किया है. बुध बुद्धि, संचार, कौशल, व्यापार और कृषि के कारक हैं. बुधवार को व्रत और गणेश पूजा से लाभ होता है.

Navgrah Budh Dev Katha: एक समय स्वर्गलोक के सत्ता सिंहासन पर आसीन इन्द्रदेव ने सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु से अनुरोध किया कि आप लोग क्रमशः अपने मुख से अपना-अपना शुभ, अशुभ, आकृति-प्रकृति, व्यक्तित्व, प्रभाव, शक्ति, पराक्रम और गरिमा का वर्णन करें. तब नव ग्रहों में सबसे सूर्य, फिर चंद्रमा और फिर मंगल ने अपने गुणों का गुणगान किया, जिसकी कथा हमने आपको बताई थी. यहां पढ़ें- Navgrah Katha 3: नवग्रहों में पढ़ें मंगल देव की कथा
बुध ग्रह की कथा (Budh Dev Kahani)
देवों के देव, समस्त देवताओं और देवराज इंद्रजी! मैं श्री गणेश स्वरूप हूं. शांति प्रियता और बुद्धि मेरा प्रधान गुण है. व्यापार कराने वाला, वेदशास्त्र, गणित, वैद्य और ज्योतिष शास्त्रों का जानकार तथा इन विषयों में निपुण बनाने वाला मैं बुध ग्रह, हरित क्रांति वाला सौम्य ग्रह हूं. तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, हस्तरेखा, वाणिज्य और कानून के ज्ञान से मैं… अपना शुभत्व प्रकट करता हूं. मैं शीघ्र नाराज या कुपित नहीं होता, यदि कुपित हो भी गया तो शीघ्र प्रसन्न भी हो जाता हूं.
हे मंगल! तुम्हें याद होगा कि मेरे आकाशमंडल में प्रकट होने पर एक बार चंद्रमा ने मेरे अपमान में कहा था कि “वह गणेशजी फुदक-फुदक कर आ गए.” तब मुझे क्रोध आया था और मैंने चंद्रमा को शाप दे दिया कि उसे क्षय रोग हो जाए. परंतु ब्रह्माजी के निवेदन करने पर मैंने अपना वह शाप वापस लेकर उसे नित्य घटता और बढ़ता रहने पर छोड़ दिया. फिर भी उस पर क्षय रोग का आंशिक प्रभाव काले धब्बों के रूप में अभी भी मौजूद है.
इस धरती पर हरित क्रांति मैं ही लाता हूं. हरियाली और कृषि कार्य मेरी प्रसन्नता के कारण ही सफल होते हैं. जो स्त्री-पुरुष संयम से न रहकर मन की मस्ती से काम करते हैं, वे बुद्धिहीन तथा क्षय रोग से ग्रसित होते हैं. ऐसे लोगों के घरों में अत्यधिक संतानें होकर उनकी आर्थिक एवं शारीरिक क्षमता नष्ट कर देती हैं. कुछ संतानें नपुंसक या शक्तिहीन हो जाती हैं.
व्यक्ति के अंदर बुद्धि में मैं ही हूं. यकृत की बीमारी या अच्छाई मुझसे ही है. शरीर में रक्त शोधन मैं ही करता हूं. मेरे अशुभ प्रभाव से यकृत रोग से पीड़ित व्यक्ति तथा रक्त दोष के कारण स्वास्थ्य का नाश होता है. मेरे दिन जो जन्म लेते हैं, वे शांत, चतुर, विद्वान, लेखक, ज्योतिषी, चिकित्सक, मुंशी और अध्यापक बनते हैं. 8वें तथा 18वें वर्ष शुभाशुभ परिणाम देते हैं. प्राणी की आयु 64 वर्ष होती है. मेरी प्रसन्नता और आराधना के द्वारा होने वाले पुण्य से 105 वर्ष की आयु प्रदान होती है.
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