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भारत, जी-20 की अध्यक्षता और वैश्विक रंगमंच पर शक्तिशाली भारत का उदय, काम आ रही है चतुराई भरी डिप्लोमैसी और कूटनीति

आज जब दुनिया ने अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका के निशान और चीन की विस्तारवादी नीति के नतीजे बेहद करीब से देख लिए हैं, तो भारत की साख दिनोंदिन बढ़ती जा रही है.

भारत ने पिछले साल यानी 2022 के दिसंबर महीने में इंडोनेशिया से जी20 की अध्यक्षता हासिल की थी. अब 9 से 10 सितंबर तक दिल्ली में जी20 नेताओं की शिखर बैठक प्रगति मैदान में नए बने सम्मेलन भवन में होगी. प्रगति मैदान के नवीनीकरण की चर्चा हरेक तरफ हो रही है और सम्मेलन भवन की तुलना तो सिडनी के ओपेरा हाउस और हैम्बर्ग के भवन से हो रही है. भारत ने जी20 की अध्यक्षता मिलने का भरपूर फायदा उठाया और 'हार्ड पावर' के साथ अपनी 'सॉफ्ट पावर' को भी बेचा. अभी तक 32 अलग-अलग क्षेत्रों को लेकर करीबन 100 से अधिक बैठकें भारत के विभिन्न शहरों में हो चुकी है. इसमें अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर भी शामिल है. अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद भारत का श्रीनगर में इतने बड़े स्तर का कोई पहला कार्यक्रम था और शांतिपूर्ण ढंग से इसका आयोजन कर भारत ने दुनिया के सामने मिसाल कायम की है. भारतीय पर्यटन को इससे छप्परफाड़ फायदा होने की उम्मीद है. भारत ठीक उसी दिशा में बढ़ रहा है, जो भारत के प्रधानमंत्री ने समूह की अध्यक्षता संभालते हुए कहा था, "भारत दुनिया में एकता की सार्वभौमिक भावना को बढ़ावा देने के लिए काम करेगा. भारत 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' के मंत्र के साथ आगे बढ़ेगा."

दिल्ली दिखा रही है दम

जी20 से जुड़े अब तक जितने भी कांफ्रेंस या बैठकें हुई हैं, उनमें भारत ने बड़े स्मार्ट तरीके से पिछले 75 सालों में भारत की विकास यात्रा को रेखांकित किया है. भारत अब वैश्विक मंच पर एक “अगुआ” की भूमिका निभाने को तैयार है. वह एक ऐसी ताकत बनानेवाले गिने-चुने समूह का हिस्सा बनना चाहता है, जो नियम-कानून तय करता है, भारत को जी20 की अध्यक्षता बड़े ही माकूल वक़्त पर मिली. दुनिया की चुनौतियां बहुत अधिक हैं और हर पल दुनिया बदल भी रही है. रूस-यूक्रेन संघर्ष को डेढ़ साल हो गए और कोविड के जख्म अभी भरे और भूले नहीं गए हैं. चीन और अमेरिका में टकराव है, तो पड़ोस के अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हालात बदलतर. दुनिया बहुत तेजी से खेमों में बंट रही है और एक बार फिर शीतयुद्ध के बाद की सी स्थिति बन रही है. हालांकि, यह बहुत मजेदार बात है कि दुनिया खुद ही शीतयुद्ध के बाद की दुनिया को बीते दिनों की बात कह कर भुलाना चाह रही है, लेकिन उसी की तरह की परिस्थितियां भी निर्मित कर रही है. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से खुद दुनिया के वजूद पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है. 

जी20 का महत्व इसलिए भी काफी बढ़ जाता है कि इस समूह के सदस्य देशों में दुनिया की कुल जनसंख्या का 67 फीसदी रहता है. 67 फीसदी. यह कुछ अधिक ही बड़ा हिस्सा है. वैश्विक जीडीपी में इस समूह का योगदान 85 फीसदी है और वैश्विक व्यापार में 75 फीसदी. इस संस्थान को अगर हमने ठीक से चला लिया और दुनिया को अपना कायल बना लिया तो भारत की धमक पूरी दुनिया में होगी. जी 20 में बहुपक्षीय डायलॉग करवाने की असीम संभावना है. वैश्विक बिखराव के इस दौर में ऐसे 'हरकुलियन टास्क' को निभाने के लिए दुनिया को जिस तरह के जिम्मेदार और भरोसेमंद ताकत की जरूरत है, केवल भारत ही उसे मुहैया करा सकता है. बदलते शक्ति संतुलन और सामरिक-आर्थिक मोर्चे पर पूरी दुनिया ही जूझ रही है. नाकामियों और संस्थागत सड़न के चलते पैदा परिवर्तनों से पूरी दुनिया जूझ रही है. महंगाई से जुड़े दबाव, खाद्य और ऊर्जा संकट, आर्थिक मोर्चे पर मंदी और ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं. 

वैश्विक मुद्दों पर नजर, लोकल संबंधों पर कारगर

भारत लगातार ही पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल पैदा करता है. आज जब दुनिया ने अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका के निशान और चीन की विस्तारवादी नीति के नतीजे बेहद करीब से देख लिए हैं, तो भारत की साख दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. कोविड के संकटकाल में भारत ने पूरी दुनिया को एक बार फिर से मानवता का संदेश दिया. जब कई विकसित देश अपने सभी वयस्कों को पांच बार तक टीका देने लायक स्टॉक जमा कर रहे थे, भारत ने अपना दिल और दरवाजा दोनों खोल दिया था. यह पूरी दुनिया ने देखा है. अमेरिका अपनी घरेलू उलझनों में उलझा है, रूस तो यूक्रेन में ही फंस गया है और जर्मनी-जापान-ब्रिटेन के पास अपनी समस्याएं हैं. भारत ग्लोबल साउथ यानी पूरी दुनिया के विकासशील देशों की आवाज बन कर उभरा है. भारत ने डब्ल्यूएचओ से लेकर यूएन तक इनकी जरूरतें जोरदार ढंग से उठाई हैं. अब तक भारत ने “महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन, जलवायु वित्त, सर्कुलर इकॉनमी, वैश्विक खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, हरित हाइड्रोजन, आर्थिक अपराधों, ग्लोबल वार्मिंग और बहुपक्षीय सुधारों” पर बात कर चुका है.

भारत अपने हितों की परवाह करने के साथ वैश्विक हित को मजबूती से देख रहा है. तभी तो ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने को लेकर पहल करता है, तो स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में वैश्विक स्वास्थ्य और स्थायी विकास के क्षेत्र में रचनात्मक बदलाव के लिए पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा की भूमिका पर चर्चा करता है. इसी तरह महत्वपूर्ण सभी 32 क्षेत्रों में विशेषज्ञों के साथ भारत काम कर रहा है, चर्चा कर रहा है, प्रपत्र तैयार कर रहा है. फिलहाल, दुनिया में भू-राजनीति और भू-अर्थनीति का जैसा घालमेल है, भारत की भूमिका और बढ़ गयी है.

भारत लंबे समय से इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि वैश्विक बिरादरी को वैश्वीकरण से जुड़े अपने संवादों को “नए सिरे से परिभाषित” करने की ज़रूरत है. एस जयशंकर ने बिल्कुल ही ठीक कहा था कि यूरोप को यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है. जी20 के मौजूदा मुद्दों के साथ इसके विस्तार, अफ्रीका से जुड़े मसलों और आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन इत्यादि के मसलों पर भी भारत दुनिया को एक सही राह की ओर ले जाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. नयी दिल्ली में जी20 के 18वें शिखर सम्मेलन के साथ ही पूरे साल भर चले सम्मेलनों और बैठकों का अंत हो जाएगा. इसके बाद ही जी20 के नेताओं का एक "डेक्लेरेशन" जारी होगा, और उसी में भारत की भूमिका और नेतृत्व कौशल के जलवे देखने को मिलेंगे कि भारत कितने देशों को अपनी राह चलने पर सहमत कर पाया है. 

व्यालोक जेएनयू और आइआइएमसी से पढ़े हैं. विभिन्न मीडिया संस्थानों जैसे ईटीवी, दैनिक भास्कर, बीबीसी आदि में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव. फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और अनुवाद करते हैं.
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