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Mount Everest Night Risk: रात के अंधेरे में माउंट एवरेस्ट पर रुकना कितना खतरनाक? अगर कोई रुक गया तो ऐसे होते हैं यम दर्शन

Mount Everest Night Risk: माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में पहचानी जाती है. यहां पर पर्वतारोही चढ़ने की कोशिश करते हैं. आइए जानते हैं की रात के समय यहां पर रुकना खतरनाक क्यों है.

Mount Everest Night Risk: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर्वतारोहियों को आकर्षित तो करती है लेकिन यह काफी खतरनाक जगह भी है. यहां रात बिताना खासकर 8000 मीटर से ऊपर के डेथ जोन में काफी खतरनाक अनुभवों में से एक माना जाता है. कम ऑक्सीजन, बर्फीला तापमान और थकान की वजह से यह जगह और भी ज्यादा खतरनाक हो जाती है. आज हम जानेंगे कि रात के समय यहां पर रुकना इतना खतरनाक क्यों है.

डेथ जोन में कम ऑक्सीजन का स्तर

8000 मीटर की ऊंचाई पर ऑक्सीजन काफी ज्यादा कम हो जाती है. इस वजह से पर्वतारोहियों को आराम करते समय भी सांस लेने में काफी ज्यादा तकलीफ होती है. इस डेथ जॉन में रात बिताना हाइपोक्सिया को बढ़ा देता है.  यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें शरीर के टिशूज को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती. पर्याप्त ऑक्सीजन के बिना शरीर के जरूरी अंग काम करना बंद कर देते हैं और मौत का खतरा बढ़ जाता है. ऊंचाइयों पर अंधेरे में फंसे पर्वतारोहियों को काफी ज्यादा खतरा हो जाता है क्योंकि बचाव अभियान लगभग असंभव हो जाता है. 

काफी ज्यादा ठंड और खराब मौसम 

एवरेस्ट पर रात में तापमान काफी ज्यादा कम हो जाता है जो जानलेवा बन जाता है. फोंसटबाइट और हाइपोथर्मिया एक बड़े खतरे के रूप में सामने आते हैं क्योंकि खुली त्वचा कुछ ही मिनट में जम सकती है. तेज हवा और खराब मौसम के साथ रात का माहौल यहां पर रहने लायक नहीं होता. रात के अंधेरे में और ऐसे खतरनाक हालातों में टेंट लगाने या फिर उपकरणों का इस्तेमाल करने मैं हुई छोटी सी चौक भी जानलेवा हो सकती है. 

नेविगेशन के खतरे 

एवरेस्ट पर रात का अंधेरा पर्वतारोहियों को रास्ता भटका सकता है. इतना ही नहीं बल्कि दरारों में गिरने का खतरा भी बन जाता है. खम्बु आइसफॉल जैसे खतरनाक हिस्से जहां पर सीढ़ियां काफी ज्यादा अस्थिर और बर्फ की परतें होती हैं इस जगह को और भी खतरनाक बना देती हैं. एक गलत कदम जानलेवा साबित हो सकता है.

रात में क्यों नहीं की जाती चढ़ाई?

अनुभवी पर्वतारोही भी रात में पहाड़ पर ना रहने के लिए अपनी चढ़ाई और उतरने की योजना को काफी ज्यादा सावधानी से बनाते हैं. वे सुबह जल्दी शुरू करते हैं ताकि उन्हें नेविगेशन के लिए दिन की रोशनी का फायदा मिले. रोशनी में भी सुरक्षित रास्ते को तय कर सकते हैं और साथ ही दुर्घटना के संभावना भी कम हो जाती है. इतना ही नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर बचाव दल भी समय पर पहुंच सकता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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