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Twisha Sharma Case: पहले पोस्टमॉर्टम के बाद कैसे होता है दूसरा पोस्टमॉर्टम, दोनों प्रोसेस में कितने दिन का अंतर जरूरी?

Twisha Sharma Case: हाल ही में ट्विशा शर्मा के शव का दूसरा पोस्टमार्टम किया गया. आइए जानते हैं कि पहला और दूसरा पोस्टमार्टम कितने समय के बाद किया जाता है.

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  • ट्विशा शर्मा मामले में दो हफ्ते बाद दूसरे पोस्टमार्टम का आदेश।
  • दूसरे पोस्टमार्टम के लिए कोर्ट या मजिस्ट्रेट की इजाजत आवश्यक।
  • कानूनन पहले और दूसरे पोस्टमार्टम में समय सीमा तय नहीं।
  • शव का दूसरा पोस्टमार्टम विवादित या असंतुष्ट रिपोर्ट के कारण।

Twisha Sharma Case: दूसरा पोस्टमार्टम कुछ खास परिस्थितियों में ही किया जाता है. ऐसा तब होता है जब शुरुआती जांच के नतीजे पर कोई शक या फिर संदेह होता है. हाल ही में ऐसे ही प्रकिया चर्चा में आई जब भोपाल में दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की मौत के लगभग 2 हफ्ते बाद उनके शव का दूसरा पोस्टमार्टम किया गया. इसी बीच आइए जानते हैं कि दूसरा पोस्टमार्टम कैसे किया जाता है और पहले और दूसरे पोस्टमार्टम के बीच समय का कितना अंतर होता है. 

कोर्ट या फिर मजिस्ट्रेट की इजाजत जरूरी 

दूसरा पोस्टमार्टम सिर्फ पुलिस के निर्देशों पर नहीं किया जा सकता. दोबारा पोस्टमार्टम करने से पहले किसी कोर्ट या फिर किसी एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट से लिखित मंजूरी लेनी जरूरी है. आमतौर पर जब शुरुआती रिपोर्ट को लेकर गंभीर शक पैदा होता है तो मृतक के परिवार वाले या फिर जांच एजेंसी कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं. 

कोई तय कानूनी समय का अंतर नहीं 

भारतीय कानून में पहली और दूसरी पोस्टमार्टम जांच के बीच दिनों की कोई खास न्यूनतम या फिर अधिकतम संख्या तय नहीं है. इसका मतलब है कि अगर जरूरी हो तो दूसरी ऑटोप्सी कुछ घंटों, कई दिनों या फिर हफ्तों बाद भी की जा सकती है. हालांकि फोरेंसिक विशेषज्ञ आमतौर पर इसे जितनी जल्दी हो सके करने की सलाह देते हैं. 

दूसरा पोस्टमार्टम क्यों करवाया जाता है? 

ज्यादातर मामलों में शव का पोस्टमार्टम सिर्फ एक बार ही किया जाता है. कुछ खास परिस्थितियों में दूसरे पोस्टमार्टम की मांग उठ सकती है. इनमें पहली रिपोर्ट से रिश्तेदारों का असंतुष्ट होना, चोट या फिर सबूत को छुपाए जाने का शक होना, जांच में कोई नई बात सामने आना या फिर पुलिस या जेल अधिकारियों से जुड़ी विवादित हिरासत में मौत शामिल हैं. 

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एक नया मेडिकल बोर्ड जांच करता है 

खास बात यह है कि दूसरा पोस्टमार्टम आमतौर पर फोरेंसिक विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र पैनल या फिर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे बड़े सरकारी संस्थानों के वरिष्ठ डॉक्टरों द्वारा किया जाता है. जिन डॉक्टरों ने पहले पोस्टमार्टम किया था उन्हें आमतौर पर दूसरी जांच से दूर रखा जाता है. 

इसी के साथ विवाद से बचने और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए ज्यादातर संवेदनशील मामलों में दूसरी ऑटोप्सी की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी करना जरूरी है. जांच के दौरान फोरेंसिक विशेषज्ञ पहले लगाए गए चीरों को फिर से खोलते हैं, अंदरूनी अंगों की दोबारा जांच करते हैं, चोट के निशान, फ्रैक्चर, जहर के लक्षण या फिर नजरअंदाज किए गए सबूत को स्टडी करते हैं और अपने निष्कर्ष की तुलना मूल रिपोर्ट से करते हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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