Explained: कल सिद्धारमैया का इस्तीफा और शिवकुमार को कमान! कर्नाटक का नाटक कांग्रेस को कैसे और कमजोर करेगा?
Karnataka Power Deal: कांग्रेस को राजस्थान में गहलोत-पायलट की लड़ाई ने बड़ा नुकसान पहुंचाया. वही अब कर्नाटक में हो रहा है. अगर सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच संतुलन नहीं बना, तो क्या कांग्रेस खत्म?

दिल्ली के इंदिरा भवन में मंगलवार (26 मई) की शाम. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार करीब छह घंटे तक एक बंद कमरे में कांग्रेस हाईकमान के सामने बैठे रहे. बाहर निकले तो सिद्धारमैया का चेहरा उतरा हुआ था, लेकिन शिवकुमार के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी. पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने प्रेस के सामने आकर साफ कर दिया, 'जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वो सिर्फ अटकलें हैं. बैठक में सिर्फ राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों पर चर्चा हुई.' लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो हकीकत कुछ और ही थी. इसी के साथ कांग्रेस का वो नाटक शुरू हो गया जो पार्टी को अंदर से खोखला कर सकता है. आइए आपको बताते हैं कि ये नाटक शुरू क्यों हुआ, अब तक क्या हुआ और ये कांग्रेस को कितना कमजोर करेगा...
'ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला'- जहां से हुई झगड़े की शुरुआत
ये कहानी शुरू होती है मई 2023 से. कांग्रेस ने कर्नाटक में 224 में से 135 सीटें पर जोरदार जीत हासिल की. लेकिन जीत के साथ ही एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? एक तरफ थे सिद्धारमैया- 75 साल के अनुभवी OBC नेता, जिनका 'अहिंदा' (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) वोट बैंक पर गहरा कब्जा है और जो 2013-18 तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं. दूसरी तरफ थे डीके शिवकुमार- 64 साल के वोक्कालिगा नेता, जिन्होंने कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए पार्टी को 2019 के लोकसभा में मिली करारी हार से उबारा और 2023 की जीत के असली आर्किटेक्ट माने जाते हैं.
शिवकुमार खेमे का कहना था कि सरकार बनने से पहले हाईकमान ने 'ढाई-ढाई साल' का फॉर्मूला तय किया था. पहले ढाई साल सिद्धारमैया CM रहेंगे, फिर शिवकुमार को कमान सौंपी जाएगी. हालांकि कांग्रेस हाईकमान ने कभी खुलकर इस बात को स्वीकार नहीं किया, लेकिन पार्टी के अंदर ये बात एक 'ओपन सीक्रेट' रही है. अब सरकार को तीन साल पूरे हो चुके हैं, तो शिवकुमार खेमे का दबाव अपने चरम पर है. हाईकमान आखिरकार एक्शन लेता दिख रहा है.
26 मई की वो मैराथन मीटिंग- जिसने सब कुछ बदल दिया
26 मई को दिल्ली के इंदिरा भवन में जो बैठक हुई, वो कांग्रेस के लिए किसी महाभारत से कम नहीं थी. इसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला, खुद सिद्धारमैया और शिवकुमार मौजूद थे.
बैठक करीब 6 घंटे चली. पहले सबने साथ बैठक की, फिर राहुल गांधी ने सिद्धारमैया को अलग बुलाकर एक-पर-एक बात की. सूत्रों के मुताबिक, राहुल ने सिद्धारमैया को साफ बता दिया कि अब शिवकुमार को मौका देने का वक्त आ गया है. उन्हें राज्यसभा भेजने का ऑफर दिया गया, साथ ही ये भरोसा दिलाया गया कि आने वाले 2029 लोकसभा चुनाव में वो पार्टी का बड़ा OBC चेहरा होंगे.
सिद्धारमैया शुरुआत में तैयार नहीं थे. सूत्रों का कहना है कि वो अपने करीबी विधायकों से सलाह के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि हाईकमान के खिलाफ जाने का कोई फायदा नहीं. उनके पास विधायकों की संख्या ज्यादा हो सकती है, लेकिन दिल्ली में फैसले उनकी ताकत से नहीं, राहुल गांधी की मर्जी से होते हैं.
BJP की चौखट: 'एक नहीं, चार-चार खेमों में बंटी कांग्रेस'
विपक्ष इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा, 'कर्नाटक की जनता ने सरकार चलाने के लिए वोट दिया था, लेकिन ये लोग तो बस दिल्ली दरबार की राजनीति में उलझे हुए हैं. विकास ठप है, सरकार कोमा में है.' विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने तो यहां तक कह दिया कि 'ये कांग्रेस की सरकार नहीं, कुर्सी की लड़ाई है. प्रशासन ठप पड़ा है और ये लोग आपस में ही उलझे हुए हैं.'
बीजेपी के एक और नेता ने इसे 'चार-तरफा लड़ाई' करार दिया. उनका दावा है कि कांग्रेस के अंदर अब चार खेमे बन गए हैं. सिद्धारमैया के वफादार, शिवकुमार के समर्थक, खड़गे का गुट और जी. परमेश्वर को आगे करने वाले नेता. ये बिखराव कांग्रेस के लिए बुरी खबर है क्योंकि जब भीतर ही इतनी लड़ाई हो, तो बाहर की लड़ाई कैसे जीती जाएगी?
क्यों कांग्रेस के लिए ये नाटक आत्मघाती साबित हो सकता है?
ये सब सिर्फ दो नेताओं की अदावत की कहानी नहीं है. ये कांग्रेस की जमीन कमजोर करने वाला धीमा जहर है. असली नुकसान पांच मोर्चों पर होगा:
1. वोक्कालिगा वोट बैंक में सेंध का खतरा
डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर वोक्कालिगाओं को संतुष्ट करने की कोशिश की जाती है, तो लिंगायत समुदाय (जो कर्नाटक का सबसे बड़ा वोट बैंक है) नाराज हो सकता है. अभी कांग्रेस ने दोनों समुदायों के बीच तालमेल बिठा रखा था, लेकिन इस बदलाव से मामला बिगड़ सकता है और लिंगायत फिर से बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो सकते हैं.
2. 'अहिंदा' वोट बैंक का बिखराव
सिद्धारमैया की पहचान कर्नाटक में 'अहिंदा' की राजनीति से रही है. इन समुदायों के बीच उनकी पकड़ बहुत मजबूत है. अगर सिद्धारमैया को हटाकर उन्हें दिल्ली भेज दिया जाता है, तो ये पूरा वोट बैंक छिटक सकता है. कर्नाटक में मुस्लिम आबादी करीब 13% है और सिद्धारमैया के जाने से ये वोट बैंक कमजोर पड़ सकता है.
3. BJP को मुफ्त में हथियार
कर्नाटक बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'ये लोग कर्नाटक को राजस्थान मत बनाओ. वहां भी इसी अंदरूनी कलह ने पार्टी को बर्बाद किया था.' अब बीजेपी के पास कांग्रेस पर हमला करने का सबसे बड़ा हथियार है. हर चुनावी रैली में यही मुद्दा गूंजेगा और कांग्रेस के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा.
4. प्रशासनिक पैरालिसिस
तीन साल से कैबिनेट का विस्तार और फेरबदल अटका हुआ है. अकेले मार्च में ही करीब 45 विधायकों ने बेंगलुरु के एक होटल में बैठक करके सरकार पर दबाव बनाया था. इस पूरे खींचतान में न तो बड़े फैसले हो पा रहे हैं, न ही जनता के काम. नौकरशाही असमंजस में है कि किसकी सुने- सिद्धारमैया की या शिवकुमार की?
5. 2028 विधानसभा चुनाव पर संकट
2028 के चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है. कांग्रेस के पास जनता को दिखाने के लिए कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है, लेकिन ये जरूर दिख रहा है कि पार्टी के नेता एक-दूसरे को गिराने में लगे हैं. कांग्रेस ने 2023 में बीजेपी को सत्ता से बाहर करके जो जनादेश हासिल किया था, वो इस आपसी लड़ाई की भेंट चढ़ता दिख रहा है.
क्या ये चार सीन देखने को मिल सकते हैं?
पॉलिटिकिल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, राजनीतिक गलियारों में अगले कुछ दिनों के लिए चार बड़े अनुमान लगाए जा रहे हैं:
- 28 मई यानी इस्तीफे की तारीख: सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया गुरुवार 28 मई को राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मिलने का समय मांग चुके हैं और उसी दिन अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं.
- वीकेंड पर CLP की बैठक: इस्तीफे के तुरंत बाद कांग्रेस विधायक दल (CLP) की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें शिवकुमार को औपचारिक रूप से नेता चुन लिया जाएगा.
- कैबिनेट में बड़ा फेरबदल: शिवकुमार के शपथ लेते ही लंबे समय से अटका कैबिनेट विस्तार होगा. दोनों खेमों के बीच मंत्रालयों के बंटवारे पर जोरदार खींचतान होगी, जिसमें शिवकुमार अपने करीबियों को 'होम' जैसे भारी-भरकम विभाग दिलाने की कोशिश करेंगे.
- सिद्धारमैया का राज्यसभा जाना: जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव में सिद्धारमैया को कर्नाटक से उम्मीदवार बनाकर दिल्ली भेजा जा सकता है, ताकि 2029 लोकसभा चुनाव में उनका राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके.
सबसे बड़ा सवाल: क्या कांग्रेस इस नाटक से उबर पाएगी?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये सवाल अभी बहुत बड़ा है. सरकार तो शायद बच जाए, क्योंकि कांग्रेस के पास 135 विधायक हैं, जो बहुमत से काफी ऊपर हैं. लेकिन असली चुनौती 2028 के विधानसभा चुनाव की है. अंदरूनी कलह, जातिगत समीकरणों की उलझन, BJP का आक्रामक विपक्ष और अब इस नेतृत्व परिवर्तन से उपजी नाराजगी. ये सब कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं.
कांग्रेस ने जो राजस्थान में देखा था, जहां गहलोत-पायलट की लड़ाई ने पार्टी को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. वही नुस्खा अब कर्नाटक में दोहराया जा रहा है. अगर कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच संतुलन नहीं साधा, तो ये नाटक कांग्रेस के लिए त्रासदी में बदल सकता है. बीजेपी को 2028 में कर्नाटक वापसी का सुनहरा मौका मिल सकता है.

























