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दिल्ली के लाल किले को बनवाने में कितना खर्च आया था, आज के हिसाब से यह रकम कितनी?

मुगल बादशाह शाहजहां जब आगरा की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाना चाहते थे, तब उन्होंने लाल किले का निर्माण करवाया था. चलिए जानें कि उस वक्त यह कितने करोड़ में बना था और उसका दाम कितना है.

भारत की आन-बान और शान का प्रतीक दिल्ली का लाल किला सदियों से इतिहास को अने सीने में समेटे खड़ा है. पांचवें मुगल शहंशाह शाहजहां ने जब साल 1638 में अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली ले जाने का फैसला किया, तब इस भव्य एतिहासिक इमारत की नींव रखी गई थी. यह आलीशान किला शाहजहां के दादा अकबर द्वारा बनवाए गए आगरा के लाल किले से प्रेरित है, जिसे साल 2007 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया था. लेकिन क्या आप जानते हैं उस दौर में इस किले को बनाने में जितनी लागत आई थी, आज के वक्त में वो कितनी होगी, चलिए समझें.

सफेद पत्थरों से लाल रंग का सफर

यह बात शायद कम लोग ही जानते होंगे कि जिसे आज हम लाल किले के नाम से जानते हैं, उसका असली नाम किला-ए-मुबारक था. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दस्तावेजों के मुताबिक, शुरुआत में यह लाल नहीं था. इसके निर्माण के लिए चूना पत्थर का इस्तेमाल किया गया था, जिसकी वजह से इसके कई हिस्से सफेद दिखाई देते थे. वक्त के साथ जब चूने की परतें उखड़ने लगीं तो अंग्रेजों ने इसे सुरक्षित रखने के लिए इस पर लाल रंग करवा दिया था. इसके बाद ही यह दुनियाभर में लाल किले के नाम से जाना गया.

कब रखी गई थी इस एतिहासिक धरोहर की नींव?

शाहजहां कला और वास्तुकला के बेहद शौकीन थे. उन्होंने धरती पर जन्नत की कल्पना करते हुए किले के अंदरूनी हिस्सों को बहुत खूबसूरती से तराशा था. इस एतिहासिक धरोहर की नींव 16 अप्रैल 1638 को रखी गई थी. इसे पूरी तरह से तैयार होने में करीब एक दशक यानी 10 साल लंबा वक्त लगा था. लाल किला सा 1648 में बनकर तैयार हुआ था. लगभग 254.67 एकड़ के विशाल क्षेत्रफल में फैले इस आलीशान किले के चारों ओर सुरक्षा के लिए करीब 2.4 किलोमीटर लंबी मजबूत दीवार बनाई गई है.

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उस वक्त कितने में बना था लाल किला और आज की कीमत कितनी?

उस जमाने में इस भव्य इमारत को तैयार करने के लिए करीब 1 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत आई थी. सत्रहवीं शताब्दी में 1 करोड़ रुपये की कीमत इतनी ज्यादा थी कि आज के दौर में उस रकम से तुलना करना मुश्किल है. आज के वक्त में 1 करोड़ रुपये में किसी बड़े शहर के इलाके में एक फ्लैट खरीदा जा सकता है. लेकिन आर्थिक जानकारों की मानें तो आज के वक्त में यह राशि 1800 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो सकती है.

मुख्य द्वार और भौगोलिक किले की बनावट

भौगोलिक दृष्टि से यह किला दिल्ली के केंद्र में स्थित है, जिसके मुख्य द्वारों को लोग लाहौरी दरवाजा और दिल्ली दरवाजा के नाम से जानते हैं. लाहौरी दरवाजा इस किले का मुख्य प्रवेश द्वार है, जहां से सैलानी अंदर जाते हैं और हर साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पीएम इसी की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं. यह किला सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यब मुगलों के वैभव, अंग्रेजों के शासन और आजाद भारत के गौरवशाली इतिहास की जिंदा कहानी बयां करता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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