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International Nurses Day: देश के अस्पतालों में नर्सेज की कितनी कमी, जानें WHO के मानकों से हम कितने पीछे?

International Nurses Day पर भारत में नर्सों की भारी कमी चिंता बढ़ा रही है. WHO मानकों से देश अभी काफी पीछे है. यहां जानें पूरी जानकारी.

Healthcare System: जब कोई मरीज अस्पताल पहुंचता है, तो सबसे पहले उसकी देखभाल करने वाली नर्स ही होती है. मरीज को इंजेक्शन देना हो, दवा का समय देखना हो या रातभर उसके पास जागकर उसकी हालत पर नजर रखनी हो, हर जिम्मेदारी नर्सें संभालती है. यही वजह है कि 12 मई को पूरी दुनिया में International Nurses Day मनाया जाता है. लेकिन इस खास दिन पर भारत की तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली नजर आती है. यहां डॉक्टरों की तरह नर्सों की भी भारी कमी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मानकों के मुकाबले भारत अभी इस आंकड़े में काफी पीछे है.  WHO के अनुसार हर 1000 लोगों पर कम से कम 3 नर्स होनी चाहिए, लेकिन भारत में अभी सिर्फ 1.9 से 1.96 नर्स ही उपलब्ध हैं. यानी देश अभी करीब 1.04 से 1.1 नर्स प्रति हजार आबादी पीछे चल रहा है.

गांवों में सबसे ज्यादा खराब है स्थिति

भारत में नर्सों की कमी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, इसका असर सीधे मरीजों की जिंदगी पर भी पड़ रहा है. वही FICCI और KPMG की रिपोर्ट के मुताबिक WHO के मानकों तक पहुंचने के लिए भारत को 43 लाख से ज्यादा अतिरिक्त नर्सों की जरूरत पड़ेगी. साथ ही भारतीय नर्सिंग परिषद यानी INC में बड़ी संख्या में नर्सें पंजीकृत हैं, लेकिन अनुमान है कि सिर्फ 80 प्रतिशत नर्सें ही सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. सबसे ज्यादा परेशानी ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रही है.  अनुमान है कि देश के 20 प्रतिशत से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी PHC बिना स्थायी स्टाफ नर्स के चल रहे हैं.  ऐसे में गांवों में मरीजों को समय पर इलाज और देखभाल मिलना मुश्किल हो जाता है. 

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आखिर क्यों बढ़ रही नर्सों की कमी?

नर्सों की कमी के पीछे कई गंभीर कारण छिपे हुए हैं.  सबसे बड़ी वजह विदेश पलायन यानी Brain Drain को माना जा रहा है. भारत की हजारों नर्सें बेहतर सैलरी, सुरक्षित काम का माहौल और अच्छी सुविधाओं की तलाश में विदेशों में जा रही हैं. खासतौर पर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भारतीय नर्सों की काफी मांग है. वही रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 56 हजार से 69 हजार भारतीय नर्सें OECD देशों में काम कर रही हैं.  वहां उन्हें भारत के मुकाबले ज्यादा वेतन, तय समय पर छुट्टियां और बेहतर सम्मान मिलता है.  यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में प्रशिक्षित नर्सें देश छोड़ रही हैं. 

वहीं दूसरी तरफ भारत में सरकारी अस्पतालों में नर्सों के हजारों पद लंबे समय से खाली पड़े हैं. भर्ती प्रक्रिया धीमी होने के कारण अस्पतालों में जरूरत के हिसाब से स्टाफ नहीं पहुंच पा रहा है. इसके अलावा कम वेतन भी एक बड़ी समस्या बन चुका है. कई निजी अस्पतालों में नर्सों को उनकी मेहनत के मुकाबले बहुत कम सैलरी दी जाती है. लगातार तनाव और दबाव में काम करने के बावजूद उन्हें वह सम्मान और सुविधाएं नहीं मिल पातीं, जिसकी वे हकदार हैं. यही वजह है कि कई लोग नर्सिंग पेशे से दूरी बनाने लगे हैं. इसका सीधा असर अस्पतालों की व्यवस्था और मरीजों की देखभाल पर पड़ रहा है.

सुधार की कोशिशें जारी, लेकिन लंबा है रास्ता

सरकार अब इस समस्या को कम करने के लिए कई कदम उठा रही है. देश में 157 नए नर्सिंग कॉलेज खोलने की योजना बनाई गई है, जिससे नर्सिंग सीटों की संख्या बढ़ेगी.  वहीं 2026 में केंद्र और राज्य स्तर पर बड़े पैमाने पर भर्ती अभियान भी चलाए जा रहे हैं. साथ ही इस साल International Nurses Day की थीम “Empowered Nurses Save Lives” रखी गई है, जिसका मतलब है कि सशक्त नर्सें ही लोगों की जिंदगी बचा सकती हैं. इसके तहत नर्सिंग स्टाफ को बेहतर और सुरक्षित काम का माहौल देने पर जोर दिया जा रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ भर्ती बढ़ाने से काम नहीं चलेगा. नर्सों को सम्मान, अच्छा वेतन और सुरक्षित कार्य वातावरण देना भी उतना ही जरूरी है. तभी भारत WHO के मानकों तक पहुंच पाएगा और मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा. 

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