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जब गांधी जी ने तिरंगे को सलामी देने से कर दिया था इनकार, जानें क्यों कही थी यह बात?

Independence Day 2025: भारत का राष्ट्रीय ध्वज जब 1947 में कुछ बदलाव के बाद तैयार हुआ तो गांधी जी को इस तिरंगे से ऐतराज था. गाधी जी ने इस तिरंगे को सलामी देने से इंकार कर दिया था.

भारत में हर साल 15 अगस्त के दिन आजादी का जश्न मनाया जाता है. इस बार देश अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के बाद से ये दिन पूरे देशवासियों के लिए बेहद खास है. भारत के इतिहास में आजादी को लेकर कई घटनाएं हैं. एक घटना ये भी है कि एक बार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को सलामी देने से इंकार कर दिया था. गांधी जी ने ऐसा क्यों किया, क्या था इसके पीछे का कारण? चलिए जानते हैं. 

तिरंगे को लेकर हुआ था विवाद

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा आज हमारी शान और गर्व का प्रतीक है. इसमें तीन रंग केसरिया, सफेद और हरा है. बीच में अशोक चक्र देश की एकता, शांति और प्रगति का संदेश देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के समय तिरंगे को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ था, जिसमें खुद महात्मा गांधी शामिल थे? गांधी जी ने 1931 में तिरंगे के डिजाइन को अपनी मंजूरी दी थी और इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में फहराया जाता था.

तिरंगे में बदलाव से गांधी जी की नाराजगी

लेकिन 1947 में संविधान सभा ने तिरंगे के डिजाइन में बदलाव का फैसला किया. पिंगली वेंकैया द्वारा डिजाइन किए गए नए तिरंगे में चरखे की जगह सम्राट अशोक के धर्म चक्र को शामिल किया गया. इस बदलाव से गांधी जी बहुत दुखी हुए. उस वक्त गांधी जी लाहौर में थे. संविधान सभा में कुछ गैर-कांग्रेसी सदस्यों ने तर्क दिया कि चरखा कांग्रेस पार्टी का प्रतीक है और राष्ट्रीय ध्वज में इसे शामिल करना उचित नहीं होगा. गांधी जी ने इस बदलाव पर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की.

गांधी जी के मुताबिक चरखे का मतलब

 उन्होंने कहा, 'मैं इस झंडे को सलामी नहीं दूंगा, जिसमें चरखा नहीं है.' उनका मानना था कि चरखा केवल सूत कातने का उपकरण नहीं. ये ना केवल गरीबों को रोजगार और आमदनी मुहैया करा रहा था बल्कि ये मानवीयता, सादगी और किसी को कष्ट ना देने के अलावा गरीबों और अमीरों के बीच अटूट बंधन का प्रतीक भी था. हालांकि, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने गांधी जी को समझाया कि अशोक चक्र भी अहिंसा और धर्म का प्रतीक है, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को दर्शाता है. आखिरकार, गांधी जी ने इस नए डिजाइन को स्वीकार किया. 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया और 15 अगस्त 1947 को यह पहली बार स्वतंत्र भारत में लहराया.

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About the author नेहा सिंह

नेहा सिंह बीते 6 साल से डिजिटल मीडिया की दुनिया से जुड़ी हैं. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद से ताल्लुक रखती हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद हैदराबाद स्थित ईटीवी भारत से साल 2019 में अपने करियर की शुरुआत की. यहां पर दो साल तक बतौर कंटेट एडिटर के पद पर काम किया इस दौरान उन्हें एंकरिंग का भी मौका मिला जिसमें उन्होंने बेहतरीन काम किया.

फिर देश की राजधानी दिल्ली का रुख किया, यहां प्रतिष्ठित चैनलों में काम कर कलम को धार दी. पहले इंडिया अहेड के साथ जुड़ीं और कंटेंट के साथ-साथ वीडियो सेक्शन में काम किया. 

इसके बाद नेहा ने मेनस्ट्रीम चैनल जी न्यूज में मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के पद पर अपनी सेवाएं दीं. जी न्यूज में रहते हुए नेशनल और इंटरनेशनल मुद्दों पर एक्सप्लेनर वीडियो क्रिएट किए.

इसी बीच प्रयागराज महाकुंभ के दौरान कुलवृक्ष संस्थान से जुड़कर महाकुंभ भी कवर किया, साधु-संतों का इंटरव्यू किया. लोगों से बातचीत करके उनके कुंभ के अनुभव और समस्याओं को जाना.

वर्तमान में नेहा एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां पर नॉलेज सेक्शन में ऐसी खबरों को एक्सप्लेन करती हैं, जिनके बारे में आम पाठक को रुचि होती है.

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