Border 2: किसने बनाया था वह मंदिर, जो बॉर्डर फिल्म में आया नजर, जानें कब बनवाया गया था यह मंदिर?
Border 2: बॉर्डर 2 फिल्म के रिलीज होने के साथ ही लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर से तनोट माता मंदिर में बन चुकी है. आइए जानते हैं कि इस मंदिर को किसने बनवाया था.

Border 2: बॉर्डर 2 की सिनेमाघरों में भारी भीड़ खींचने के साथ ही फिल्म के पीछे की असली जगहों और कहानियों में लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर से बढ़ चुकी है. एक जगह जो वापस से सुर्खियों में आ चुकी है वह तनोट माता मंदिर. इस मंदिर को बॉर्डर फिल्म में दिखाया गया था. राजस्थान के जैसलमेर जिले में भारत पाकिस्तान सीमा के पास बना यह मंदिर ना सिर्फ धार्मिक रूप से बल्कि भारत के सैन्य इतिहास से भी काफी गहराई से जुड़ा हुआ है.
तनोट माता मंदिर किसने बनवाया
एतिहासिक रिकॉर्ड और स्थानीय परंपराओं के मुताबिक तनोट माता मंदिर भाटी राजपूत राजा तनु राव ने बनवाया था. उन्होंने 828 ईस्वी में मंदिर की स्थापना की और तनोट माता की मूर्ति स्थापित की. इन्हें देवी हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है. यह मूल रूप से आज के बलूचिस्तान में स्थित पूजनीय शक्ति पीठों में से एक है. तनोट सिर्फ एक धार्मिक केंद्र नहीं है बल्कि लंबे समय तक भाटी राजपूतों के लिए एक बड़ा राजधानी क्षेत्र भी है.
मंदिर को चमत्कारी क्यों माना जाता है
यह मंदिर 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देशभर में मशहूर हुआ था. इन संघर्षों के दौरान पाकिस्तानी सेना ने मंदिर परिसर के अंदर और आसपास लगभग 3000 बम गिराए. हैरानी की बात यह है कि परिसर के अंदर एक भी बम नहीं फटा और ढांचा पूरी तरह सुरक्षित रहा. आज भी इस मंदिर परिसर के अंदर एक छोटे से संग्रहालय में लगभग साढे चार सौ बिना फटे बम रखे हुए हैं.
लोंगेवाला की लड़ाई से संबंध
1971 की लोंगेवाला की लड़ाई के दौरान भारतीय सैनिकों के एक छोटे से समूह ने एक बड़ी पाकिस्तानी बख्तरबंद ब्रिगेड का सामना किया था. सैनिकों ने बाद में बताया कि तनोट माता में उनके विश्वास ने इस लड़ाई के दौरान उनका मनोबल बढ़ाया.
सीमा सुरक्षा बल की भूमिका
1971 के युद्ध के बाद से सीमा सुरक्षा बल मंदिर के पूरे प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है. रोज सुबह और शाम की आरती बीएसएफ के जवान वर्दी में करते हैं. इससे तनोट माता मंदिर भारत के उन कुछ मंदिरों में से एक बन गया है जहां पर सैनिक पुजारी का काम करते हैं. 1971 में भारत की जीत की याद में मंदिर परिसर में एक विजय स्तंभ भी बनाया गया. हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाने के लिए यहां पर एक खास समारोह आयोजित किया जाता है.
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Source: IOCL




























