Ram Mandir Donation Theft Case: कितनी तरह के होते हैं ट्रस्ट, कैसे काम करता है इनका सिस्टम; क्या है रजिस्ट्रेशन प्रोसेस?
Ram Mandir Donation Theft Case: राम मंदिर में दान चोरी के मामले में तेजी से कार्रवाई हो रही है. चलिए इसी बीच आपको बता देते हैं कि आखिर कोई ट्रस्ट कैसे काम करता है और इसकी प्रक्रिया क्या है.

Ram Mandir Donation Theft Case: राम मंदिर दान चोरी मामले में पिछले कुछ दिनों लगातार बड़ी कार्रवाइयां चल रही हैं. दो दिन पहले राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने इस्तीफा दे दिया और कई धाराओं में एफआईआर का होना दर्शाता है कि श्रद्धालुओं की आस्था पर जो गहरी चोट पहुंचाई गई है, उसके आरोपी बख्शे नहीं जाएंगे. ऐसे में लोगों के मन में यह भी सवाल उठ रहा है कि आखिर समाज और भगवान के नाम पर बनने वाले इन ट्रस्टों का सच आखिर क्या है? ये कितनी तरह के होते हैं और कैसे काम करते हैं? आइए इस व्यवस्था को समझाते हैं.
भारत में कितनी तरह के होते हैं ट्रस्ट?
कानून की नजर में ट्रस्ट एक ऐसी मजबूत संस्था होती है, जिसमें कोई व्यक्ति संस्था या समाज अपने कल्याण या फिर अपने परिवार के हित के लिए धन-संपत्ति को किसी दूसरे जिम्मेदार शख्स को सौंपी जाती है. भारत में मुख्य रूप से दो तरह के ट्रस्ट बनाए जाते हैं, जिसको हम पब्लिक ट्रस्ट और प्राइवेट ट्रस्ट के नाम से जानते हैं. पब्लिक ट्रस्ट को आम बोलचान की भाषा में चैरिटेबल ट्रस्ट भी कहा जाता है, जिसका पूरा मकसद समाज सेवा, गरीब बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल चलाना या किसी धार्मिक स्थल की देखरेख करना होता है. दूसरी तरफ, प्राइवेट ट्रस्ट किसी खास परिवार या फिर कुछ गिने-चुने लोगों के निजी फायदे और उनकी पारिवारिक संपत्ति के सही प्रबंधन के लिए बनाया जाता है, जिससे आम जनता को कोई मतलब नहीं होता है.
कैसे काम करता है कोई ट्रस्ट?
किसी भी ट्रस्ट को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदारी मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण किरदारों के कंधों पर टिकी होती है, जिनके बिना यह सिस्टम आगे नहीं बढ़ सकता है. इसमें सबसे बड़ा नाम सेटलर का होता है, जिसे हम ट्रस्ट का निर्माता या मुख्य दानदाता भी कहते हैं, जो अपनी मर्जी से अपनी संपत्ति या फिर फंड ट्रस्ट को शुरू करने के लिए दान करता है. इसमें दूसरा सबसे जरूरी किरदार ट्रस्टी होता है, यह वह जिम्मेदार शख्स या ग्रुप होता है, जिसे ट्रस्ट के पैसों और संपत्ति की देखरेख और उसके सही इस्तेमाल का पूरा जिम्मा सौंपा जाता है. इस पूरी व्यवस्था का तीसरा सिरा लाभार्थी होता है, ये वे समाज के लोग होते हैं, जिनके कल्याण के लिए वह ट्रस्ट बनाया गया है और जिसे इनका सीधा लाभ मिलता है.
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कैसे होता है रजिस्ट्रेशन?
अगर कोई व्यक्ति समाज सेवा या फिर किसी नेक काम के लिए नया ट्रस्ट बनाना चाहता है, तो उसको एक तय कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है. सबसे पहले तो ट्रस्ट का कोई एकदम नया और अनोखा नाम सोचना होता है, जो कि पहले से किसी संस्था ने न रखा हो, साथ ही उसका उद्देश्य भी लिखना होता है. इसके बाद सबसे जरूरी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं, जिसे ट्रस्ट डीड कहते हैं. इस डीड में ट्रस्ट को चलाने के लिए सारे कड़े नियम, ट्रस्टियों के अधिकार और पैसे के खर्च से जुड़ी हर एक छोटी-बड़ी बात साफ तौर पर लिखी जाती है. इस पूरे मसौदे को राज्य सरकार के नियमों के अनुसार तय कीमत वाले नॉन-जुडिशियल स्टैंप पेपर पर अच्छे से प्रिंट कराया जाता है.
किन कागजात की होती है जरूरत?
ट्रस्ट को सरकारी तौर पर रजिस्टर कराने के लिए कुछ जरूरी दस्तावेजों की जरूरत होती है. इसके लिए मुख्य दानदाता और सभी ट्रस्टियों के सरकारी पहचान पत्र जैसे पैन कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो की फाइल तैयार करनी होती है. इसके साथ ही पूरी प्रक्रिया की गवाही देने के लिए दो भरोसेमंद गवाहों की जरूरत होती, जो मौके पर मौजूद रहें. जब ये सारे कागजात पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो इसे आपके इलाके के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में जमा कराने पड़ते हैं. वहां पर सरकारी निर्धारित फीस और स्टैंप ड्यूटी चुकाने के बाद अधिकारी इस ट्रस्टी को कानूनी मान्यता दे देते हैं.
बैंक अकाउंट की प्रक्रिया
जैसे ही सब रजिस्ट्रार ऑफिस से ट्रस्ट को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट मिल जाता है, उसके तुरंत बाद इसके वित्तीय कामकाज को कानूनी जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. सबसे पहले आयकर विभाग में आवेदन करके ट्रस्ट के नाम पर बिल्कुल नया पैन कार्ड बनावाया जाता है, क्योंकि ट्रस्ट अपने आप में एक अलग कानूनी पहचान रखता है. इसके बाद किसी मान्यता प्राप्त बैंक से इसके नाम से एक चालू खाता खोला जाता है, जिससे कि भविष्य में मिलने वाले चंदे, दान, समाज सेवा के लिए खर्च होने वाले पैसे का इसी बैंक के खाते से हिसाब-किताब हो और पारदर्शिता बनी रहे.
आयकर में छूट के लिए क्या करना होता है?
अगर कोई सार्वजनिक या चैरिटेबल ट्रस्ट बड़े पैमाने पर समाज कल्याण के लिए काम करना चाहता है तो, इसके लिए आयकर विभाग के कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है. इसके तहत ट्रस्ट को इनकम टैक्स विभाग से 12A और 80G का विशेष सर्टिफिकेट हासिल करना होत है. इस सर्टिफिकेट का फायदा यह होता है कि ट्रस्ट को मिलने वाले चंदे पर टैक्स नहीं लगता है और जो दानी लोग इसमें अपनी मेहनत की कमाई का दान करते हैं, उनको भी इनकम टैक्स रिटर्न में बड़ी छूट मिलती है.

























