Bengal Rajya Sabha Bypolls 2026: TMC के बागी लोकसभा सांसदों ने बदली पार्टी, लेकिन राज्यसभा सांसदों ने पहले दिया इस्तीफा; क्या है कानूनी पेंच?
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी इस वक्त दो गुटों में बंट गई है और उनकी पार्टी के तीन राज्यसभा सांसदों ने सदस्यता से इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली है. चलिए जानें कि इसमें पेंच कहां है.

- पश्चिम बंगाल में तीन राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव घोषित हुए।
- तीन पूर्व टीएमसी सांसदों ने इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन की।
- दलबदल विरोधी कानून से बचने हेतु पहले इस्तीफा दिया।
- भाजपा बहुमत से तीनों सीटें आसानी से जीतेगी।
Bengal Rajya Sabha Bypolls 2026: पश्चिम बंगाल की सियासत में दल-बदल और इस्तीफों के खेल के बीच राज्यसभा उपचुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है. चुनाव आयोग ने राज्य की खाली हुईं तीन राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव का एलान कर दिया है. दरअसल टीएमसी को बड़ा झटका देते हुए उसके तीन पूर्व राज्यसभा सांसद राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर अब बीजेपी ज्वाइन कर चुके हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस चुनावी प्रक्रिया के बाद भी देश के उच्च सदन में जाने वाले चेहरे यही रहने की उम्मीद है, बस इनकी पार्टी बदल चुकी है. ऐसे में राज्यसभा में टीएमसी की ताकत घटना तय है. चलिए इसे विस्तार से समझें.
टीएमसी के कौन से सांसद बीजेपी में शामिल
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उठापटक का एक नया अध्याय शुरू हो चुका है, जिसने देश के संसदीय इतिहास में दलबदल की एक अनोखी कहानी लिख दी है. दरअसल, टीएमसी के तीन बड़े चेहरे- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने जून में अपनी पार्टी और राज्यसभा सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की कड़ी हार के बाद तीनों नेताओं ने अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाए थे. इस्तीफा देने के तुरंत बाद इन तीनों ही नेताओं ने औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की और बीजेपी ने भी बिना देर किए उपचुनाव में इन्हीं को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया.
दलबदल विरोधी कानून का बड़ा पेंच
संसदीय नियमों और कानूनी बारीकियों को समझें तो लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के इस्तीफे और पाला बदलने की प्रक्रिया में बड़ा अंतर है. टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों ने जहां अपनी पार्टी बदली, वहीं इन्हीं राज्यसभा सांसदों ने पहले अपनी सदस्यता से बाकायदा इस्तीफा दिया. इसके पीछे की असली वजह दलबदल विरोधी कानून यानी एंटी डिफेक्शन लॉ का कानूनी पेंच है. अगर राज्यसभा सांसद बिना इस्तीफा दिए दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते तो, उनकी सदस्यता अयोग्य घोषित कर दी जाती. इसी कानूनी पेंच से बचने के लिए उन्होंने पहले गरिमा के साथ इस्तीफा देकर राज्यसभा की सीटें खाली कीं और फिर बीजेपी ज्वाइन करके दोबारा से चुनाव लड़ने का कानूनी रास्ता चुना.
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पश्चिम बंगाल विधानसभा में सीटों का गणित
पश्चिम बंगाल विधानसभा के मौजूदा संख्या बल को देखा जाए तो यहां का पूरा सियासी गणित पूरी तरह से बीजेपी के पाले में नजर आता है. राज्य की कुल 294 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल बीजेपी के पास अपने मजबूत 208 विधायक मौजद हैं. राज्यसभा चुनाव की खास वोटिंग प्रणाली के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस बेहद महत्वपूर्ण उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को सीधे तौर पर अपनी जीत दर्ज करने के लिए कम से कम 70 प्राथमिक वोटों की आवश्यकता होगी. बीजेपी के पास अपने दम पर इतने विधायक हैं कि वह आसानी से यह संख्या हासिल कर सकती है.
बीजेपी की जीत का पक्का समीकरण
बीजेपी के पास विधायकों का भारी बहुमत होने के कारण वह बिना किसी बाहरी पार्टी के सहयोगके अपने इन तीनों उम्मीदवारों को क्रमश: 70, 69 और 69 वोट दिलाकर आसानी से चुनाव जिताने की स्थिति में है. इस सटीक राजनीतिक समीकरण के कारण राजनीतिक गलियारों में बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों की जीत पूरी तरह से तय और पक्की मानी जा रही है. वहीं दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम के सामने पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रही है, क्योंकि उसके पास फिलहाल तो कोई मजबूत रणनीति नजर नहीं आ रही है.
टीएमसी के सामने बड़ी चुनौती
इस संकट के वक्त टीएमसी के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती उनकी अंदरूनी कलह और आपसी गुटबाजी बनकर उभरी है, जिसने पार्टी को बेहद कमजोर कर दिया है. तकनीकी तौर पर टीएमसी के टिकट पर चुनाव जीते हुए विधायकों की संख्या अभी करीब 80 के आसपास है, जो कि एक सीट जीतने के लिए काफी थी. मगर पेंच यहां पर है कि विधायक अब दो अलग-अलग धड़ों में बंट चुके हैं, जिसमें से एक खेमा सीधे तौर पर ममता बनर्जी के साथ वफादार है, तो वहीं दूसरा गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में खुलकर अपनी ही पुरानी सरकार का विरोध कर रहा है.
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