US Attack Chabahar Port: ईरान के चाबहार पोर्ट पर भारत ने लगाए थे 1 हजार करोड़ रुपये, जानें उनका अब क्या होगा?
US Attack Chabahar Port: अमेरिका ने बुधवार को अपनी मिसाइलों के जरिए ईरान के लिए बेहद अहम चाबहार पोर्ट को निशाना बनाया है. चलिए जानें कि भारत ने इस प्रोजेक्ट में जो पैसे लगाए थे अब उसका क्या होगा.

US Attack Chabahar Port: ईरान के चाबहार पोर्ट पर ताजा अमेरिकी हमलों से भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को बड़ा रणनीतिक झटका लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड के सीजफायर का एलान खत्म करने के बाद ईरान में लगातार बमबारी हो रही है, जिसकी जद में अब चाबहार पोर्ट आ गया है. भारत ने ईरान में स्थित इस महत्वपूर्ण पोर्ट को विकसित करने में करीब 1000 करोड़ रुपये (120 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम निवेश किया है. हालांकि मौजूदा पाबंदियों की वजह से भारत वहां पर सीधे तौर पर सक्रिय नहीं है, फिर भी इस भू-राजनीतिक टकराव ने भारत की भविष्य की रणनीतिक उम्मीदों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं.
चाबहार पोर्ट का रणनीतिक महत्व
चाबहार पोर्ट भौगोलिक रूप से ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मकरान तट पर स्थित है. भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से पश्चिम में महज 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान से गुजरे बिना सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक व्यापार करने का एक वैकल्पिक और सुरक्षित समुद्री रास्ता देता है. पिछले दिनों अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौतों से भारत को चाबहार में दोबारा पूरी सक्रियता से काम शुरू होने की बड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन फिर से हुए इन हमलों ने बनी-बनाई बात को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है.
1000 करोड़ का निवेश बचाने की भारतीय रणनीति
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिकी प्रतिबंधों की सख्ती को देखते हुए भारत ने एक सोची-समझी रणनीति अपनाई थी. भारत ने चाबहार फ्री जोन में अपनी हिस्सेदारी को कानूनी पेचीदगियों से बचाने के लिए अस्थाई रूप से एक स्थानीय ईरानी कंपनी को सौंप रखा है. यही वजह है कि वर्तमान में भारत वहां सीधे तौर पर पोर्ट के कामकाज नहीं संभाल रहा है. इस कदम का मुख्य उद्देश्य अपने 1000 करोड़ रुपये के निवेश को अमेरिकी प्रतिबंधों की मार से सुरक्षित रखना और भविष्य में हालात सामान्य होने पर वहां दोबारा से धमाकेदार वापसी की संभावना को जिंदा रखना था.
अमेरिकी हमले का जमीनी असर
अमेरिकी सेना के द्वारा चाबहार पोर्ट पर किए गए ताजा हवाई हमलों के बाद फिलहाल को भआरत द्वारा संचालित किसी सक्रिय व्यवस्था या कामकाज में तुरंत कोई रुकावट नहीं आई है, क्योंकि भारत वहां सीधे तौर पर ग्राउंड पर मौजूद नहीं है. इसके बावजूद कूटनीतिक स्तर पर भारत इस बड़े संकट से पूरी तरह से अछूता नहीं रह सकता है. यह अमेरिकी हमला सीधे तौर पर भारत के उस प्रोजेक्ट की बुनियाद पर चोट करता है, जिसे उसने दशकों से पश्चिम और मध्य एशिया में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने और व्यापारिक दबदबा बढ़ाने के लिए अपनी रणनीतिक सोच का मुख्य केंद्र बनाया था.
दो दशक की मेहनत पर पानी
भारतीय विदेश नीति में चाबहार पोर्ट पिछले करीब दो दशकों से एक बेहद खास और प्राथमिकता वाला स्थान बनाए हुए है. पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म करके अफगानिस्तान तक समान पहुंचाने के अलावा, भारत इस पोर्ट को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के सबसे मजबूत और मुख्य हिस्से के रूप में देख रहा था. चाबहार को लेकर भारत की प्रतिबद्धता हमेशा अटूट रखी है, जिसका सबूत साल 2024 में देखने को मिला था जब भारत ने चाबहार के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल को अगले 10 साल तक चलाने के लिए ईरानी सरकार के साथ एक दीर्घकालिक समझौता किया था.
अब चाबहार पोर्ट का क्या होगा?
ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाई गई नई और कड़ी आर्थिक पाबंदियों ने भारत के लिए चाबहार पोर्ट को स्वतंत्र रूप से चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण कर दिया था, जिसके बाद भारत सीधे संचालन से पीछे हटकर बीच का रास्ता तलाशने लगा. मौजूदा हमलों से भारत को तो कोई तत्कालिक ऑपरेशनल नुकसान भले न हो, लेकिन कूटनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर बहुत बड़ी चोट लगी है. चाबहार के पास गहराता यह हिंसक तनाव पूरे प्रोजेक्ट के भविष्य को अंधकार में धकेल सकता है, जिससे भारत की अरबों रुपये की परियोजनाएं अधर में लटक सकती हैं.
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