FIR दर्ज होने के बाद क्या गिरफ्तारी जरूरी हो जाती है, कब होता है एक्शन?
FIR दर्ज होने के बाद भी हर मामले में तुरंत गिरफ्तारी जरूरी नहीं, जानें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस, BNSS के तहत पुलिस एक्शन के नए कड़े नियम और आरोपी के पास उपलब्ध कानूनी बचाव के रास्ते.

आमतौर पर लोगों के मन में यह धारणा होती है कि पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज होते ही आरोपी की गिरफ्तारी तय है. लेकिन कानून के मुताबिक ऐसा नहीं है. एफआईआर सिर्फ किसी घटना की पहली सूचना होती है, जिसके आधार पर पुलिस मामले की जांच शुरू करती है. जांच में सबूत जुटाना, गवाहों के बयान लेना, घटनास्थल का मुआयना और जरूरत पड़ने पर फॉरेंसिक जांच शामिल होती है. गिरफ्तारी इस जांच का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं, बल्कि पुलिस के पास मौजूद एक विकल्प है, जिसका इस्तेमाल हालात के हिसाब से किया जाता है.
अपराध की गंभीरता तय करती है गिरफ्तारी
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 35 में बिना वारंट गिरफ्तारी से जुड़े नियम बताए गए हैं. इसके मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी के सामने ही कोई संज्ञेय अपराध करता है, या किसी विश्वसनीय शिकायत या सूचना के आधार पर यह संदेह होता है कि उसने ऐसा अपराध किया है जिसमें सात साल तक की सजा हो सकती है, तो पुलिस उसे बिना मजिस्ट्रेट की इजाजत के भी गिरफ्तार कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्थिति और साफ की है. जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि जिन मामलों में अधिकतम सजा सात साल तक है, वहां पुलिस के लिए सीधे गिरफ्तारी करना नियम नहीं, बल्कि अपवाद है. ऐसे मामलों में बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत पहले आरोपी को नोटिस भेजना जरूरी होता है, ताकि वह जांच अधिकारी के सामने पेश हो सके और अपना पक्ष रख सके. कोर्ट ने साफ कहा कि गिरफ्तारी जांच अधिकारी का विवेकाधीन अधिकार है, यह कोई अनिवार्यता नहीं है.
पुलिस कब कर सकती है गिरफ्तार?
अगर आरोपी को नोटिस मिलने के बाद भी वह पुलिस के सामने पेश नहीं होता, तभी धारा 35(6) और 35(1)(बी) के तहत गिरफ्तारी की जा सकती है. इसके अलावा अगर पुलिस को यह आशंका हो कि आरोपी सबूत मिटा सकता है, गवाहों को धमका सकता है या फरार हो सकता है, तो भी गिरफ्तारी की जा सकती है. अगर आरोपी जांच में सहयोग नहीं करता, नोटिस मिलने पर भी हाजिर नहीं होता, तो पुलिस मजिस्ट्रेट से गिरफ्तारी वारंट भी हासिल कर सकती है. इसके बाद पुलिस उस वारंट के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है, भले ही वह पहले से जांच में शामिल न हुआ हो.
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वरिष्ठ नागरिकों के लिए हैं अलग नियम
कानून बुजुर्ग और कमजोर लोगों के लिए भी अलग सुरक्षा देता है. धारा 35(7) के मुताबिक अगर किसी अपराध में सजा तीन साल से कम है और आरोपी की उम्र साठ साल या उससे ज्यादा है, या वह किसी तरह से अशक्त है, तो पुलिस उसे तुरंत गिरफ्तार नहीं कर सकती. ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले वरिष्ठ अधिकारी से मंजूरी लेनी पड़ती है.
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