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बिना केमिकल लगाए भी पका सकते हैं आम, किसान जान लें देसी तरीका

Mangoes Ripening Methods: गर्मियों में केमिकल और कार्बाइड वाले आमों से सेहत को बचाने के लिए देसी और प्राकृतिक तरीके अपनाना सबसे बेस्ट ऑप्शन है. किसान भाई बिना किसी केमिकल के आसानी से पका सकते हैं आम.

Mangoes Ripening Methods: गर्मियों का मौसम आते ही हर तरफ रसीले और मीठे आमों की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ जाती है. आजकल मार्केट में मिलने वाले ज्यादातर आमों को जल्दी पकाने के चक्कर में खतरनाक केमिकल्स और कार्बाइड का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है. यह केमिकल वाले आम न सिर्फ हमारी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि इनका असली स्वाद और प्राकृतिक खुशबू भी पूरी तरह गायब हो जाती है. 

ऐसे में हमारे किसान भाइयों और आम के शौकीनों के लिए यह जानना बेहद जरूरी हो गया है कि बिना किसी केमिकल के भी आम को एकदम परफेक्ट तरीके से पकाया जा सकता है. हमारे घरों और खेतों में ही कई ऐसे बेहतरीन देसी और पारंपरिक जुगाड़ मौजूद हैं जिनकी मदद से आमों को बेहद सुरक्षित और नेचुरल तरीके से पकाया जा सकता है. इन आसान तरीकों को अपनाकर आप आम की मिठास और क्वालिटी दोनों को बरकरार रख सकते हैं. 

कागज, अखबार और सूती बोरे का इस्तेमाल

कच्चे आमों को जल्दी और पूरी तरह प्राकृतिक रूप से पकाने के लिए अखबार या किसी भी मोटे कागज का इस्तेमाल सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है. आपको बस इतना करना है कि पेड़ों से तोड़े गए कच्चे आमों को एक-एक करके अखबार के कागज में अच्छी तरह से लपेट देना है. इसके बाद इन लिपटे हुए आमों को किसी लकड़ी के बॉक्स, गत्ते के डिब्बे या फिर जूट की खाली बोरी के अंदर अच्छे से व्यवस्थित करके रख देना चाहिए. 

इस तरीके से पक जाते हैं

असल में कागज और जूट के बोरे में लिपटे रहने की वजह से आम के अंदर से निकलने वाली नेचुरल एथिलीन गैस बाहर नहीं जा पाती है और वह डिब्बे के अंदर ही पूरी तरह लॉक हो जाती है. यही प्राकृतिक गैस आमों को तेजी से और अंदर तक समान रूप से पकाने का काम करती है. इस पूरी देसी प्रक्रिया में करीब दो से तीन दिन का समय लगता है जिसके बाद आपको बिना किसी साइड इफेक्ट के एकदम मीठे और रसीले आम मिल जाते हैं. 

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चावल के ड्रम का यूज

भारतीय ग्रामीण इलाकों और घरों में आम को पकाने के लिए अनाज के ड्रम का नुस्खा सदियों से सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहा है. अगर आप आमों को जल्दी और बहुत ही शानदार रंगत के साथ पकाना चाहते हैं तो उन्हें अपने घर में रखे चावल के ड्रम या कंटेनर के अंदर पूरी तरह से दबाकर रख दें. चावल के दानों के बीच बनने वाली प्राकृतिक गर्मी और अंधेरा माहौल आम के पकने की रफ्तार को काफी ज्यादा बढ़ा देता है. 

सूखी घास से भी पका सकते हैं

इसके अलावा किसान भाई कच्चे आमों को किसी बड़े कमरे के फर्श पर सूखी घास या पुआल की एक मोटी परत बिछाकर उसके ऊपर भी आसानी से रख सकते हैं. आमों को सूखी घास से अच्छी तरह ढकने के बाद उस कमरे को बंद कर दिया जाता है जिससे वहां एक गर्म वातावरण तैयार हो जाता है. इन दोनों ही बेहतरीन तरीकों से आम बिना अपनी नेचुरल मिठास खोए बेहद सुरक्षित तरीके से पक जाते हैं और खाने में बिल्कुल असली लगते हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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