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टचस्क्रीन कंप्यूटर सबसे पहले किसने बनाया था? जानिए क्या थे फीचर्स

टचस्क्रीन कंप्यूटर का इतिहास काफी पुराना है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि सबसे पहला टचस्क्रीन कंप्यूटर किसने बनाया था और ये कब पेश हुआ और उसमें कौन-कौन से खास फीचर्स दिए गए थे.

आज स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप और यहां तक कि कारों में भी टचस्क्रीन आम हो चुकी है. स्क्रीन पर उंगली रखते ही ऐप खुल जाता है, फोटो बदल जाती है और कमांड भी दी जा सकती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि टचस्क्रीन का आईडिया आज से कई दशक पुराना है? जिस टेक्नोलॉजी को हम एडवांस गैजेट्स की पहचान मानते हैं, उसकी शुरुआत कंप्यूटर की दुनिया में काफी पहले हो गई थी. आइए जानते हैं विस्तार से.

टचस्क्रीन कंप्यूटर का आइडिया कहां से आया?

जानकारी के अनुसार, टचस्क्रीन कंप्यूटर के शुरुआती स्टेज का श्रेय ब्रिटिश इंजीनियर ई. ए. जॉनसन (E. A. Johnson) को दिया जाता है. उन्होंने 1960 के दशक में टच-सेंसिटिव स्क्रीन पर काम किया था. जॉनसन ने 1965 में पब्लिश एक पेपर में बताया था कि उंगली के टच से कंप्यूटर सिस्टम को कंट्रोल किया जाता है.

इसके अलावा उनका काम एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी को ध्यान में रखकर किया गया था. उस दौर में टचस्क्रीन का मकसद मनोरंजन या मोबाइल इस्तेमाल नहीं बल्कि कंप्यूटर से बातचीत को आसान और तेज बनाना था.

पहला टचस्क्रीन कंप्यूटर कैसा था?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शुरुआती टचस्क्रीन सिस्टम आज के स्मार्टफोन की तरह बेहद तेज या मल्टीटच नहीं थे. इनमें फिंगर टच के जरिए स्क्रीन पर मौजूद ऑप्शन को चुनने की सुविधा थी.

यानी यूजर को हर काम के लिए कीबोर्ड या माउस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती थी. स्क्रीन पर किसी ऑप्शन को छूकर सीधे कमांड दी जा सकती थी. ये उस समय के हिसाब से काफी बड़ी टेक्निकल उपलब्धि मानी जा रही थी.

कैसे काम करती थी ये टेक्नोलॉजी?

बताते चलें कि शुरुआती टचस्क्रीन में कैपेसिटिव टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया था. इसमें स्क्रीन के ऊपर एक ऐसी सतह होती थी जो उंगली के टच से इलेक्ट्रिक ताकत में होने वाले बदलाव को पहचान सकती थी.

जब यूजर स्क्रीन को छूता था तो सिस्टम उस प्लेस को पहचानकर संबंधित कमांड को एक्टिव कर देता था. हालांकि इसकी ताकत आज की टचस्क्रीन के मुकाबले काफी सीमित थीं.

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क्या थे शुरुआती टचस्क्रीन के फीचर्स?

उस दौर की टचस्क्रीन टेक्नोलॉजी में आज के मुकाबले कम सुविधाएं थीं लेकिन इसके कुछ फीचर्स काफी खास थे.

  • उंगली से कमांड देने की सुविधा
  • माउस या कीबोर्ड पर कम निर्भरता
  • स्क्रीन पर किसी खास ऑप्शन को सीधे चुनने की ताकत
  • तेज इंटरैक्शन के लिए डिजाइन
  • एयर ट्रैफिक कंट्रोल जैसे जरूरी सिस्टम में इस्तेमाल की संभावना
  • हालांकि इसमें आज की तरह स्वाइप, पिंच-टू-जूम और मल्टीटच जेस्चर मौजूद नहीं थे.

टचस्क्रीन से स्मार्टफोन तक का सफर

टचस्क्रीन टेक्नोलॉजी को फेमश होने में कई साल लगे. शुरुआत में इसका इस्तेमाल खास औद्योगिक और स्पेशल कंप्यूटिंग सिस्टम में हुआ था. बाद में ATM, POS मशीन, कार सिस्टम, मेडिकल डिवाइस और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में टच इंटरफेस दिखाई देने लगा.

इसके बाद टचस्क्रीन तकनीक ने मोबाइल फोन की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया. आज स्मार्टफोन में मिलने वाली मल्टीटच स्क्रीन उसी लंबे टेक्निकल सफर का नतीजा है.

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स्मार्टफोन, गैजेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटरनेट टेक्नोलॉजी की दुनिया में मेरा इंटरेस्ट काफी ज्यादा है. मैं यानी हिमांशु तिवारी, ABP LIVE में टेक और डिजिटल सेक्शन का हिस्सा हूं. मैं नई टेक्नोलॉजी को आसान और दिलचस्प अंदाज में पाठकों तक पहुंचाने का काम करता हूं. स्मार्टफोन लॉन्च, वायरल टेक ट्रेंड्स, AI अपडेट्स, सोशल मीडिया फीचर्स और साइबर फ्रॉड जैसे विषयों पर मेरी पकड़ मजबूत है.

टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों को सिर्फ जानकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें आम लोगों की जरूरत और रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश करता हूं. खासतौर पर ऐसी खबरों पर काम करना पसंद करता हूं, जो लोगों के डिजिटल एक्सपीरियंस को सीधे प्रभावित करती हैं.

इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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