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500 शब्द लिखने में कितना पानी पी लेता है ChatGPT? हकीकत जानकर उड़ जाएंगे होश

Water Consumption by ChatGPT: जब भी आप ChatGPT से कोई सवाल पूछते हैं उसका जवाब देने के लिए विशाल डेटा सेंटर काम करते हैं.

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  • ChatGPT जैसे AI को चलाने में बड़ी मात्रा में पानी लगता है।
  • यह पानी सर्वर ठंडा रखने वाले कूलिंग सिस्टम में उपयोग होता है।
  • अनुमान है 500 शब्द बनाने में करीब आधा लीटर पानी खर्च होता है।
  • बढ़ती AI मांग पर्यावरणीय चुनौती; टिकाऊ समाधान खोजना आवश्यक है।

Water Consumption by ChatGPT: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. पढ़ाई, नौकरी, कंटेंट राइटिंग और रिसर्च जैसे कई काम अब AI टूल्स की मदद से कुछ ही मिनटों में पूरे हो जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ChatGPT जैसे AI मॉडल को एक साधारण जवाब तैयार करने में कितने संसाधनों की जरूरत पड़ती है? हाल ही में सामने आई कुछ रिपोर्ट्स ने इस विषय पर नई बहस छेड़ दी है क्योंकि इनमें बताया गया है कि AI के इस्तेमाल का असर सिर्फ बिजली की खपत तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें बड़ी मात्रा में पानी भी खर्च होता है.

आखिर AI को पानी की जरूरत क्यों पड़ती है?

जब भी आप ChatGPT से कोई सवाल पूछते हैं उसका जवाब देने के लिए विशाल डेटा सेंटर काम करते हैं. इन डेटा सेंटरों में हजारों ताकतवर सर्वर और प्रोसेसर लगातार चलते रहते हैं. भारी कंप्यूटिंग के कारण ये मशीनें बहुत ज्यादा गर्म हो जाती हैं. इन्हें सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए विशेष कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें बड़ी मात्रा में पानी खर्च होता है.

यानी ChatGPT सीधे तौर पर पानी नहीं पीता लेकिन उसे चलाने वाले सर्वरों को ठंडा रखने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है.

500 शब्द लिखने में कितना पानी खर्च होता है?

विभिन्न शोधों और विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार, ChatGPT द्वारा लगभग 500 शब्दों का टेक्स्ट तैयार करने में करीब आधा लीटर पानी की खपत हो सकती है. यह मात्रा उस पानी को दर्शाती है जो डेटा सेंटर के कूलिंग सिस्टम में अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल होता है.

हालांकि यह आंकड़ा हर स्थिति में समान नहीं होता. पानी की वास्तविक खपत डेटा सेंटर की लोकेशन, कूलिंग तकनीक, मौसम और इस्तेमाल किए जा रहे हार्डवेयर पर निर्भर करती है. इसलिए अलग-अलग कंपनियों और क्षेत्रों में यह संख्या बदल सकती है.

AI की बढ़ती लोकप्रियता और संसाधनों पर दबाव

दुनियाभर में करोड़ों लोग हर दिन AI चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे-जैसे AI सेवाओं की मांग बढ़ रही है वैसे-वैसे डेटा सेंटरों की संख्या और उनका आकार भी बढ़ रहा है. इसके साथ बिजली और पानी दोनों की जरूरत में इजाफा हो रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में AI उद्योग को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए कम पॉवर खपत वाले प्रोसेसर, बेहतर कूलिंग तकनीक और नए पॉवर स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देना होगा.

क्या AI पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकता है?

AI तकनीक कई क्षेत्रों में क्रांति ला रही है लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. बढ़ती बिजली खपत, पानी का इस्तेमाल और बड़े डेटा सेंटरों का विस्तार पर्यावरण के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है. यही वजह है कि दुनिया की कई टेक कंपनियां ऐसे समाधान विकसित कर रही हैं जो कम संसाधनों में अधिक क्षमता प्रदान कर सकें.

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स्मार्टफोन, गैजेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटरनेट टेक्नोलॉजी की दुनिया में मेरा इंटरेस्ट काफी ज्यादा है. मैं यानी हिमांशु तिवारी, ABP LIVE में टेक और डिजिटल सेक्शन का हिस्सा हूं. मैं नई टेक्नोलॉजी को आसान और दिलचस्प अंदाज में पाठकों तक पहुंचाने का काम करता हूं. स्मार्टफोन लॉन्च, वायरल टेक ट्रेंड्स, AI अपडेट्स, सोशल मीडिया फीचर्स और साइबर फ्रॉड जैसे विषयों पर मेरी पकड़ मजबूत है.

टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों को सिर्फ जानकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें आम लोगों की जरूरत और रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश करता हूं. खासतौर पर ऐसी खबरों पर काम करना पसंद करता हूं, जो लोगों के डिजिटल एक्सपीरियंस को सीधे प्रभावित करती हैं.

इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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