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कौन हैं मेव समाज को राम-कृष्ण का वंशज बताने वाली कांग्रेस विधायक सफिया जुबैर, जानिए मुस्लिमों के इस समुदाय का इतिहास

सफिया जुबेर ने मेव समाज को राम-कृष्ण का वंशज बताया है. ऐसे में मेव समाज एक बार फिर से चर्चा में आ गया है, ये समाज धर्म से तो मुस्लिम है लेकिन रीति रिवाज पूरी तरह से हिंदू हैं.

राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस विधायक सफिया जुबेर ने खुद को और मेव समाज को राम-कृष्ण का वंशज बताया. उन्होंने कहा कि मेव समाज के लोग अलवर, भरतपुर, नूंह और मथुरा में रहते हैं. मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था. सफिया शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों पर बहस के दौरान बोल रही थीं

अलवर जिले की रामगढ़ सीट से विधायक सफिया जुबेर ने कहा कि उन्होंने जागाओं (वंशावली लिखने वाले) से थोड़ा इतिहास निकलवाया. ये जानना चाहा कि मेव समाज का अतीत क्या है?  इसमें ये पता चला कि मेव तो राम और कृष्ण के वंशज हैं. धर्म का परिवर्तन जरूर हो गया है, लेकिन खून तो आदमी का नहीं बदलता. खून तो हम में राम और कृष्ण का ही है.

विधायक ने कहा कि मेवों को बार-बार पिछड़े कहने की जरूरत नहीं है. आप 10 साल में देखना कि हम कहां पहुंचते हैं. अभी हम तीन विधायक यहां तक पहुंचे हैं, आगे भी लोग तरक्की करेंगे. साफिया के इस दावे के बाद सदन में कई सदस्यों ने मेजें थपथपाई.

रामगढ़ से विधायक सफिया जुबेर मुस्लिम हैं लेकिन वो हिंदू धर्म में भी आस्था रखती हैं. पिछले साल सावन के महीने में भी सफिया चर्चा में आई थी जब उन्होंने देवस्थान मंत्री शकुंतला रावत के साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी. सफिया ने शिव मंदिर में पूजा अर्चना की फोटोज भी सोशल मीडिया पर शेयर की थी. 

साफिया जुबेर ने बीजेपी के सुखवंत सिंह को 12 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. विधायक साफिया जुबेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव जुबेर खान की पत्नी हैं. सफिया के पिता मोहम्मद उसमान इंडियन आर्मी में मेजर रहे है. सफिया का जन्म हैदराबाद के आर्मी हॉस्पिटल में हुआ था.

चर्चा में रह चुकी है सफिया की जीत

राजस्थान में साल 2018 में 199 सीटों पर सात दिसंबर को मतदान हुआ था. एक सीट रामगढ़ पर मतदान बाद में हुआ था क्योंकि बसपा प्रत्याशी लक्ष्मण सिंह का निधन हो गया था. इसलिए रामगढ़ सीट पर मतदान 28 जनवरी को हुआ जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी सफिया जुबेर ने जीत दर्ज की थी. उनकी जीत चर्चा में रही क्योंकि विधानसभा में कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़कर 100 हो गई थी और महिला विधायकों की संख्या 24 हुई थी.

आइये समझते हैं कौन है मेव समाज के लोग जिन्हें सफिया ने कहा राम के वंशज

मेव समुदाय के लोग उत्तर-पश्चिमी भारत में रहते हैं. हरियाणा के मेवात में ये बड़ी संख्या में पाए जाते हैं.  मेवात में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के ये लोग मेवाती बोलते हैं. मेव अपने धर्म इस्लाम को तरजीह देने के साथ-साथ हिंदू धर्म से जुड़ी परंपराओं को भी मानते हैं.

यूपी के भी मथुरा जिले के कुछ हिस्से में भी मेव सदियों से रहते आ रहे हैं. वहीं ये लोग हरियाणा के नूह और राजस्थान में भी पाए जाते हैं. इनको मेव राजपूत भी कहा जाता है. 

ऐसा माना जाता है कि मेव हिंदू राजपूत ,जाट, अहीर और मीणा थे जिन्होंने 12वीं शताब्दी के बीच इस्लाम में कबूल कर लिया था. मेव इतिहास मे एक बहादुर समुदाय रही है. तारीख ए फिरोजशाही इस बात का जिक्र है कि मेवों के डर से दिल्ली के शासक ने दिल्ली के चारो तरफ के मार्ग बंद कर दिए थे.

मेव ओबीसी मुस्लिम माने जाते हैं, अनुमान है कि मेव समुदाय के लोगों की संख्या 30 लाख है.  जिनमें से 20 लाख हरियाणा राज्य में रहते हैं. पाकिस्तान में भी एक बड़ी आबादी मेव समुदाय की है.

1857 मेवों के लिए एतिहासिक रहा जब देश की पहली आजादी की लड़ाई में 6,000 से ज्यादा मेवों ने अपनी बलिदान दिया. तब वे चौधरी मोहम्मद यासीन खान को अपना नेता मानते थे.  मेव 'अलवर आंदोलन' को भी अपने स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा मानते थे. मेव हमेशा से अपने आप को अलग मानते आए हैं. वे ना तो वो मुगलों के साथ थे और न ही अंग्रेजों के साथ.

1871 में मेवों को हिंदुओं के रूप में सूचीबद्ध किया गया था. लेकिन 1901 की जनगणना में मेवों को मुसलमानों के रूप में सूचीबद्ध किया गया. हिंदू परंपराओं से इनका रिश्ता ऐसे भी समझा जा सकता है कि इस इस समुदाय में बड़ी संख्या में लोग कुएं की पूजा करते हैं. 

जब महात्मा गांधी ने कहा था मेव देश के समाज की रीढ़ हैं

साल 2000 से हरियाणा के मेव मुसलमान हर वर्ष 19 दिसंबर को महात्मा गांधी के मेवात जिले के घासेरा गांव की यात्रा को मेवात दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं.  इस दिन मेव समाज के लोग घासेरा गांव में इकट्ठा होते हैं और याद करते हैं कि कैसे गांधी ने मेवों को "इस देश के रीढ़ की हड्डी" या भारत की रीढ़ कहा था. 

अपनी यात्रा के दौरान गांधीजी ने मेव समुदाय को आश्वासन दिया था कि उन्हें भारत छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा. उन्होंने मेव समुदाय के लोगों से भी कहा , ये धरती उनके पूर्वजों की है. इसके एक महीने बाद, दिल्ली में गांधी की हत्या कर दी गई थी. 

गांधी की हत्या मेवों के लिए एक झटका थी. मेव समुदाय से ताल्लुक रखने वाले और गांधी के साथ मेवात के संबंध के बारे में विस्तार से लिखने वाले स्थानीय इतिहासकार सिद्दीक अहमद ने स्क्रॉल से बाचचीत में बताया कि  मेव समुदाय के लोगों को देश से निकाल दिए जाने का डर था. यही वजह थी कि गांधी जी को जब गोली लगी तो मेवात की महिलाएं एक गीत गाती थीं – 'भरोसा उठ गया मेवन का, गोली लगी है गांधीजी के सीने में. 

मुगल बादशाह और मेवातियों की लड़ाई का किस्सा

1526 में बाबर पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी की सेना को हराकर दिल्ली पर मुगल वंश के शासन की स्थापना कर चुका था. लेकिन बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच एक शख्स दीवार की तरह खड़ा था, जिसका नाम था राजा हसन खान मेवाती. वही मेवाती जिनकी रगों में राजपुताना खून दौड़ता है लेकिन मजहब इस्लाम है. उस समय राजा हसन खान राणा सांगा के लिए जंग लड़ रहा था. इस जंग में राजा हसन खान ने अपनी जान गंवा दी. राजा हसन खान मेव मुस्लिम समुदाय का ताकतवर शासक माना जाता था.

राजा हसन खान मेवाती के बारे में जानिए

खानवा की जंग में मेव समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले राजा हसन खान मेवाती को आज भी याद किया जाता है.  हसन खान मेवाती की वजह से राजस्थान में पाए जाने वाले मेव राजपूत समुदाय में हिंदू-मुस्लिम समन्वय की एक अलग छाप आज भी दिखती है. यहां के कई मेव सुमदाय के लोगों के नाम राम खान, शंकर खान मिल जाएंगे. ये नाम राजा हसन खान से ही लिए गए हैं.

गौरतलब है कि इस इलाके में आजादी के पहले तक मुस्लिम राजपूत समुदाय पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते थे. वे हिंदुओं की तरह एक ही गोत्र में शादी तक नहीं करते हैं. जबकि इस्लाम में तो चचेरी बहन से भी शादी की अनुमति है और बड़ी संख्या में मुस्लिम युवक चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहन से शादी भी करते हैं. लेकिन मेवातियों में अब ये पंरपरा धीरे-धीरे बदल रही है. 

तो आखिर ये हिंदू मुस्लिम कैसे बने 

ऐसा कहा जाता है कि 12वीं से लेकर 17वीं शताब्दी के बीच मुगलों के दबाव की वजह से कई हिंदूओं ने मुस्लिम धर्म अपनाया. लेकिन इनमें ऐसे भी लोग थे जो दिल से इस्लाम कबूल नहीं कर पाए. ये लोग अपने रीति-रिवाज और संस्कृति को छोड़ नहीं पाए. यही वजह है कि आज भी इनकी कुछ रस्में हिंदूओं में मिलती है. मेवों की अलग पहचान उन्हें मुख्यधारा के हिंदू और मुस्लिम दोनों से अलग रखती है.

मेवातियों की शादी में निकाह तो होते हैं लेकिन रीति-रिवाज हिंदूओं की तरह किए जाते हैं. मेव समाज के लोग आज भी जग्गा परंपरा को मानते हैं. आज भी मेवों के नाम के आगे सिंह लगता है, राम सिंह, तिल सिंह, फतेह सिंह मेवों के ही नाम है. कुछ रिपोर्ट में ये कहा गया है कि मेव और खंजादा राजपूत लोग एक ही गोत्र गोरवाल के वंशज हैं. मेव शब्द का इस्तेमाल इस इलाके और धर्म दोनों को रेखांकित करने के लिए किया जाता है.

कुछ रिपोर्टस ये भी दावा करती हैं कि मेव अर्जुन के वंश क्षत्रिय हैं जो धीरे-धीरे सूफी-पीरों से बहुत प्रभावित हुए और इस्लाम कबूल कर लिया. मेवात के कुछ मेव धीरे-धीरे हिंदू त्योहारों का उत्सव छोड़ रहे हैं. वहीं मेवात के कई अंदरुनी गांवों में मेव हिंदुओं की तरह ही हैं. वो इतने मिलते जुलते हैं कि मेव और हिंदू ग्रामीणों के बीच अंतर कर पाना मुश्किल होता है. 

मेव अपनी उत्पत्ति अर्जुन से होने की बात पर जोर देते आए हैं. लेकिन अब मेव एक तरफ हिंदू कट्टरवाद और दूसरी तरफ इस्लामीकरण के बीच फंसते नजर आ रहे हैं. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि मेवों ने अभी भी अपने पुराने तौर-तरीकों को नहीं छोड़ा है. वो आज भी दशहरा के टाइम पर पांडुन का कड़ा पहनते हैं. 

पैगंबर नूंह से है मेव का नाता ?

मेव मुस्लिमों का जिक्र होने पर इतिहासकार सद्दीक अहमद का जिक्र भी जरूरी है. सद्दीक अहमद मेवात के इतिहास पर करीब दस किताब लिख चुके हैं. इसमें The Gandhi that mewat remember, muslim youth  जैसी किताबें शामिल हैं.

सद्दीक अहमद अपने इंटरव्यू में ये कह चुके हैं कि मेव जाति कृष्ण से भी पहले पैदा हुई है. उनका कहना है कि मेवात का मेव समाज सूर्य और चंद्र बंशी नहीं है , इनका संबध प्राचीन मेदों के वंशज से है. यानी मेवों के वंशज मेदइ या याफस या हजरत नूंह हैं.  बता दें कि ईसाईयत, यहूदी और इस्लाम को मानने वाले लोग हजरत नूंह को मानते हैं. 

सद्दीक का कहना है कि इतिहासकार पिलानी ने लिखा है कि हेरोडोट्स एक मिलेनियम पहले यूनान में मेवाती लोग रहते थे.  वो ये भी दावा करते हैं कि भैरोसिंह के मुताबिक ईसा से लगभग 2000 पहले मेव कौम यूनान में आबाद थी.  

 

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