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पीएम की इतनी कड़ी सुरक्षा, फिर भी कैसे कर दी गई राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या? 78 सालों कैसे बदला सिक्योरिटी सिस्टम

PM Security: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब प्रधानमंत्री की सुरक्षा इतनी टाइट होती है तो राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या कैसे हुई. आइए जानते हैं.

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  • इंदिरा गांधी की हत्या अंगरक्षकों द्वारा, सुरक्षा खामियां उजागर हुईं।
  • राजीव गांधी की हत्या, एसपीजी सुरक्षा के अभाव में हुई।
  • दोनों घटनाओं से एसपीजी अधिनियम, सुरक्षा नियमों में संशोधन हुए।
  • प्रधानमंत्री सुरक्षा अब आधुनिक चार-स्तरीय प्रणाली अपनाती है।

PM Security: कई दशकों से भारत के प्रधानमंत्री की सुरक्षा दुनिया के सबसे आधुनिक सुरक्षा सिस्टम में से एक के जरिए की जाती रही है. लेकिन इसके बावजूद भी इतिहास में दो ऐसी चौंकाने वाली हत्याओं का जिक्र है जिन्होंने VVIP सुरक्षा के प्रति देश के नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों की ही सुरक्षा घेरे में होने के बावजूद हत्या कर दी गई थी. आइए जानते हैं कि इतनी सुरक्षा के बावजूद उनकी हत्या कैसे हुई और पिछले 78 सालों में देश का सिक्योरिटी सिस्टम कैसे बदला है.

इंदिरा गांधी की हत्या कैसे हुई? 

31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या नई दिल्ली स्थित उनके आवास पर उनके ही दो अंगरक्षकों द्वारा कर दी गई थी. इस हमले ने उस दौर की सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमियों को दर्शाया है. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद खुफिया एजेंसियों ने बढ़ते खतरों को देखते हुए उनकी करीबी सुरक्षा टीम से सिख कर्मियों को हटाने की सिफारिश की थी. हालांकि खबरों के मुताबिक इंदिरा गांधी ने इस कदम का विरोध किया. उनका यह मानना था कि इससे धर्मनिरपेक्ष देश में गलत संदेश जाएगा. यही वजह है कि उन दो सुरक्षाकर्मियों को करीबी सुरक्षा की ड्यूटी पर वापस तैनात कर दिया गया था.

बाद में सुरक्षा विशेषज्ञों ने एक और बड़ी चूक की तरफ इशारा किया. दोनों सुरक्षा कर्मियों की तैनाती को लेकर चिंताएं होने के बावजूद उन्हें एक अहम सुरक्षा पॉइंट के साथ तैनात कर दिया गया. रिपोर्ट के मुताबिक उनकी शिफ्ट में किए गए बदलावों की ठीक से जांच नहीं की गई. इसके बाद ऐसे हालात बने जिन्होंने हत्या को मुमकिन बनाया. 

राजीव गांधी की सुरक्षा क्यों विफल रही?

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर दूर में एक चुनावी अभियान के दौरान कर दी गई थी. हमलावर ने आत्मघाती बम विस्फोट किया था. सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह थी कि 1989 में पद छोड़ने के बाद राजीव गांधी को एसपीजी सुरक्षा नहीं मिल रही थी. उस समय एसपीजी सुरक्षा सिर्फ मौजूदा प्रधानमंत्री के लिए ही आरक्षित थी.

राजीव गांधी राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान समर्थकों से करीबी तौर पर घुलने-मिलने के लिए जाने जाते थे. हत्या वाले दिन वे भीड़ की तरफ बढ़े जिस वजह से आत्मघाती हमलावर को उनके पैर छूने के बहाने उनके करीब आने का मौका मिला. जांच में यह भी पता चला कि कार्यक्रम में शामिल होने वालों की ठीक से जांच नहीं की गई थी.

1984 से पहले प्रधानमंत्री की सुरक्षा 

आजादी के बाद के दशकों में प्रधानमंत्री की सुरक्षा मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस की विशेष इकाइयों द्वारा संभाली जाती थी. यह इकाई इंटेलिजेंस ब्यूरो की ब्लू बुक में दिए गए दिशा-निर्देशों के तहत काम करती थी. इस दौरान सुरक्षा काफी हद तक पारंपरिक पुलिसिंग तरीकों पर निर्भर थी. 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद एसपीजी का गठन 

इंदिरा गांधी की हत्या ने सरकार को यह यकीन दिलाया कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एक समर्पित विशिष्ट बल की जरूरत है. बीरबल नाथ समिति की सिफारिश के आधार पर 1985 में एक विशेष सुरक्षा इकाई स्थापित की गई. यह बाद में स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप बनी. इसे 1988 में संसद के एक अधिनियम के माध्यम से वैधानिक दर्जा मिला. 

राजीव गांधी की हत्या के बाद बड़े बदलाव 

राजीव गांधी की हत्या ने VVIP सुरक्षा की एक और बड़ी समीक्षा को प्रेरित किया. 1991 में एसपीजी अधिनियम में संशोधन किया गया था  ताकि इस बात को पक्का किया जा सके की पूर्व प्रधानमंत्री और उनके खास परिवार के सदस्य खतरे के आकलन के आधार पर एसपीजी सुरक्षा प्राप्त करना जारी रख सकें.

कितनी बदली सुरक्षा? 

एसपीजी संशोधन अधिनियम 2019 के साथ एक बड़ा बदलाव आया. मौजूदा नियमों के तहत एसपीजी सुरक्षा मुख्य रूप से पद पर मौजूद प्रधानमंत्री और उनके सरकारी आवास में रहने वाले योग्य परिवार के सदस्यों को दी जाती है. पूर्व प्रधानमंत्री को खतरे के आकलन और तय सुरक्षा श्रेणी के आधार पर सुरक्षा मिलती है.

आज प्रधानमंत्री की सुरक्षा एक आधुनिक चार स्तरीय सिस्टम के जरिए काम करती है. सबसे बाहरी चेरे में स्थानीय पुलिस और राज्य की सुरक्षा एजेंसी होती है. अगले घेरे में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड जैसी खास यूनिट शामिल होती हैं. प्रधानमंत्री के और करीब एसपीजी की काउंटर एसॉल्ट टीम होती है. इसी के साथ सबसे अंदरूनी घेरे में काफी अच्छी तरह से प्रशिक्षित एसपीजी कमांडो होते हैं.

यह भी पढ़ेंः माउंट एवरेस्ट पर क्यों जमा हैं इतनी डेड बॉडी, क्यों परिवार वाले घर नहीं लाते पार्थिव शरीर?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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