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उत्तराखंड: 2027 में BJP के लिए मुसीबत बन सकती हैं ये सीटें, खटीमा से मंगलौर तक चुनौती

Uttrakhand Election 2027: उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए खटीमा, हरिद्वार ग्रामीण, द्वाराहाट, मंगलौर, श्रीनगर जैसी सीटें बड़ी मुसीबत बन सकती हैं. 2022 में कई सीटों पर चुनौती मिली थी.

उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव अभी डेढ़ साल दूर है, लेकिन सियासी हलचल तेज हो गई है. भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य रख रही है, लेकिन 2022 के चुनावी आंकड़े और मौजूदा जन-भावना उसे चिंता में डाल रही है. कई सीटों पर पार्टी की जीत का अंतर बेहद कम रहा, जबकि कुछ सीटें तो कांग्रेस या अन्य दलों के मजबूत गढ़ बनी हुई हैं. 

2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर सरकार बनाई. यह पार्टी के लिए ऐतिहासिक था, लेकिन 2017 की तुलना में 10 सीटों का नुकसान हुआ. कांग्रेस का वोट शेयर 33.5% से बढ़कर 37.9% हो गया. सबसे बड़ा झटका खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लगा, जो खटीमा से 6,579 वोटों से हार गए थे. बाद में वे चंपावत उपचुनाव से जीते, लेकिन खटीमा का घाव अब भी ताजा है.

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खटीमा सीट बनी बड़ी चुनौती

खटीमा सीट भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन सकती है. 2022 में कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी ने 52% वोट पाकर धामी को हराया. तराई क्षेत्र होने के कारण यहां सिख और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इस बार भी कांग्रेस इस सीट पर मजबूत दावा कर रही है.

हरिद्वार ग्रामीण: हरीश रावत परिवार का गढ़

हरिद्वार ग्रामीण सीट पर कांग्रेस की अनुपमा रावत (हरीश रावत की बेटी) ने भाजपा के स्वामी यतीश्वरानंद को 4,472 वोटों से हराया था. 2017 में हरीश रावत खुद यहां हारे थे, लेकिन 2022 में उनकी बेटी ने पार्टी को मजबूत वापसी दिलाई. धार्मिक नगरी के निकट होने के बावजूद भाजपा यहां कमजोर नजर आती है.

द्वाराहाट: महज 182 वोटों का अंतर

अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट सीट पर कांग्रेस के मदन बिष्ट ने भाजपा के अनिल शाही को मात्र 182 वोटों से हराया. इतने कम अंतर वाली सीट पर 2027 में दोनों पार्टियां पूरी ताकत झोंकेंगी. पहाड़ी मुद्दों- पलायन, रोजगार और स्थानीय विकास पर यहां मुकाबला तय होगा.

मंगलौर: मुस्लिम बहुल सीट, बसपा-कांग्रेस का किला

हरिद्वार जिले की मंगलौर सीट मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. 2022 में बसपा प्रत्याशी ने कांग्रेस को हराया, जबकि उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को 449 वोटों से हराया. त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा की संभावनाएं यहां हमेशा सीमित रहती हैं. 

अन्य संवेदनशील सीटें

श्रीनगर, टिहरी, गदरपुर, नरेंद्रनगर जैसी सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर मात्र 587 से 1,798 वोटों तक रहा. इन सीटों पर थोड़ी सी भी एंटी-इंकंबेंसी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके अलावा हल्द्वानी, चकराता, बद्रीनाथ, धारचूला, किच्छा, बाजपुर और रुद्रप्रयाग जैसी सीटें भी भाजपा के लिए चिंता का विषय हैं. रुद्रप्रयाग केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्थित है, जहां पलायन, रोजगार और यात्रा सुरक्षा जैसे मुद्दे हमेशा गर्म रहते हैं.

2022 के बाद बदले माहौल

2022 के बाद कई मुद्दे भाजपा के खिलाफ गए. अंकिता भंडारी हत्याकांड ने महिला सुरक्षा पर सवाल खड़े किए. भर्ती घोटाले और पेपर लीक ने युवाओं में गहरा रोष पैदा किया. पहाड़ों में तेजी से बढ़ता पलायन और गांवों का सूना होना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. विपक्ष इन मुद्दों को लेकर लगातार हमला बोल रहा है.

भाजपा का दांव: UCC, कुंभ और विकास

भाजपा इन चुनौतियों का सामना यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC), धार्मिक पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर फोकस करके करने की कोशिश कर रही है. 2027 में हरिद्वार कुंभ का आयोजन भाजपा के लिए बड़ा मौका होगा. पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग तस्वीर पेश कर रही है.

राजनीति विशेषज्ञों की मानें तो 2027 का चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होगा. खटीमा, हरिद्वार ग्रामीण, मंगलौर, द्वाराहाट जैसी सीटें उसके लिए ‘रोड़ा’ साबित हो सकती हैं. अगर पार्टी पलायन, रोजगार, युवा असंतोष और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित नहीं करती, तो 2022 वाली जीत दोहराना मुश्किल हो सकता है. विपक्षी दल कांग्रेस इन कमजोर सीटों पर फोकस कर अपनी ताकत बढ़ाने की रणनीति बना रही है.

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आलोक सेमवाल उत्तराखंड के देहरादून की खबरों पर नजर रखते हैं. एबीपी लाइव के लिए रिपोर्टिंग करते हैं. उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन BA hons मास कम्यूनिकेशन HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय से पूरी की हैं.

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