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राजस्थान: जोधपुर में 200 साल पुरानी परंपरा फिर हुई जीवंत, 5 घड़ों ने बताया मानसून का हाल

Jodhpur News In Hindi: मिट्टी के घड़ों के जरिए मानसून का आकलन किया गया. हाली अमावस्या के अवसर पर करीब 200 साल पुरानी अनूठी परंपरा एक बार फिर जीवंत नजर आई.

मारवाड़ में मानसून का इंतजार सिर्फ मौसम विभाग के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की परंपराएं भी मौसम का संकेत देती हैं. इसी कड़ी में शुक्रवार (17 अप्रैल) को तिंवरी में हाली अमावस्या के अवसर पर करीब 200 साल पुरानी अनूठी परंपरा एक बार फिर जीवंत नजर आई, जहां मिट्टी के घड़ों के जरिए मानसून का आकलन किया गया.

सुबह से ही गांव के कुम्हार के घर ग्रामीणों और किसानों की भीड़ जुटने लगी. चाक पर घूमती मिट्टी से जैसे-जैसे पांच छोटे घड़े तैयार होते गए, वैसे-वैसे वहां मौजूद लोगों की उत्सुकता बढ़ती गई. हर किसी की निगाह इन घड़ों पर टिकी थी, क्योंकि इन्हीं के जरिए आने वाले चार महीनों की बारिश का अनुमान लगाया जाना था.

परंपरा के अनुसार की गई स्थापना

निर्धारित विधि के तहत जमीन पर एक आयताकार स्थान तैयार किया गया. चार घड़े चार कोनों में रखे गए, जो क्रमशः ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद महीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं. बीच में रखा गया पांचवां घड़ा ‘आकाश’ का प्रतीक माना गया.

पूजा-अर्चना के बाद इंद्र देव का स्मरण किया गया और सभी घड़ों में धान व पानी भरा गया. इस पारंपरिक विधि में एक मिनट को तीन दिनों के बराबर माना जाता है. घड़ा जितनी देर में फूटता है, उसी आधार पर बारिश का आकलन किया जाता है.

आज के प्रयोग में सामने आए संकेत:

  • ज्येष्ठ का घड़ा लगभग 9 मिनट में फूटा. इसे 27 दिनों के हिसाब से कमजोर बारिश का संकेत माना गया.
  • आषाढ़ का घड़ा करीब साढ़े चार मिनट में फूटा. जिससे 27 जून से 5 जुलाई के बीच मानसून की शुरुआत के संकेत मिले.
  • श्रावण और भाद्रपद के घड़ों से भी अच्छे संकेत मिले. जो अच्छी बारिश और ‘सुकाल’ की उम्मीद जगाते हैं. इन संकेतों ने किसानों के चेहरों पर संतोष और खुशी साफ झलकने लगी.

किसानों की आस्था और अनुभव

किसान ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. हर घड़ा एक महीने का प्रतिनिधित्व करता है और उसके फूटने के समय से बारिश का अनुमान लगाया जाता है. वहीं किसान का कहना है कि इस विधि में कई बार किए गए आकलन वास्तविक मानसून के काफी करीब साबित हुए हैं, इसलिए ग्रामीण आज भी इस परंपरा पर भरोसा करते हैं.

पूजा, प्रसाद और परंपरा का संगम

पूरी प्रक्रिया धार्मिक आस्था के साथ संपन्न हुई. शुरुआत पंचामृत अर्पण से हुई, जिसे सबसे पहले धरती को समर्पित किया गया. इसके बाद कुम्हार के चाक, भगवान शंकर, गणेश और आकाश की पूजा की गई. कुम्हार को किसान का प्रतीक मानते हुए उसे घड़ों का पानी पांच बार पिलाया गया.

अच्छी बारिश की कामना के लिए इंद्र देव को विशेष भोग लगाया गया. एक दिन पहले भिगोए गए बाजरे से खींच (खिचड़ी) बनाई गई और गुड़-आटे से बनी गलवानी को प्रसाद के रूप में वितरित किया गया.

विज्ञान बनाम परंपरा

हालांकि इस परंपरा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन स्थानीय बुजुर्गों और किसानों का मानना है कि कई बार यह अनुमान वास्तविक मानसून के काफी करीब रहा है. यही वजह है कि आज भी तिंवरी में यह परंपरा पूरी आस्था, विश्वास और उत्साह के साथ निभाई जाती है.

तिंवरी में घड़ों की यह परंपरा सिर्फ बारिश का अनुमान नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, आस्था और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक है. इस बार मिले सकारात्मक संकेतों ने किसानों के मन में ‘सुकाल’ की उम्मीद जगा दी है. अब नजरें आसमान पर टिकी हैं.

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करनपुरी गोस्वामी ABP NEWS की डिजिटल टीम के साथ बतौर रिपोर्टर जुड़े हुई हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें 12 साल का अनुभव है और पिछले 10 सालों से वे एबीपी के साथ जुड़े हुए हैं. राजस्थान के जोधपुर संभाग से जुड़ी हर खबर पर इनकी नजर रहती है. इससे पहले करनपुरी इंडिया टीवी के साथ भी काम कर चुके हैं.
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