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दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों की अब नहीं चलेगी मनमर्जी, फीस पर सरकार ने कसा शिकंजा, नया कानून लागू

Delhi Schools Fee News: दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले अपनी पूरी वित्तीय स्थिति का खुलासा करना होगा. शिक्षा विभाग स्कूलों के खर्च, आय और फीस प्रस्तावों की जांच करेगा.

दिल्ली के अभिभावकों के लिए बड़ी राहत की खबर है. वर्षों से प्राइवेट स्कूलों की अनियंत्रित फीस बढ़ोतरी से जूझ रहे माता-पिता को अब कानूनी संरक्षण मिलने जा रहा है. दिल्ली सरकार ने निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया गया नया कानून औपचारिक रूप से लागू कर दिया है, जिससे फीस तय करने की प्रक्रिया अब मनमर्जी नहीं बल्कि नियमों के दायरे में होगी.

LG की मंजूरी के बाद लागू हुआ कानून

दिल्ली विधानसभा से पारित होने के करीब चार महीने बाद दिल्ली स्कूल एजुकेशन (फीस निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 को उपराज्यपाल वीके सक्सेना की स्वीकृति मिल गई है. इसके साथ ही यह कानून पूरे राजधानी क्षेत्र में प्रभावी हो गया है और शिक्षा विभाग को इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंप दी गई है.

फीस तय करने से पहले होगी सरकारी जांच

अब निजी स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले अपनी पूरी वित्तीय स्थिति का खुलासा करना होगा. शिक्षा विभाग स्कूलों के खर्च, आय और फीस प्रस्तावों की जांच करेगा और नियमों के अनुरूप होने पर ही उन्हें मंजूरी मिलेगी. फीस से जुड़ी हर प्रक्रिया, जांच से लेकर निगरानी तक, अब तय ढांचे के तहत चलेगी.

शिक्षा व्यापार नहीं- आशीष सूद

शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने इस कानून को शिक्षा क्षेत्र में बड़ा सुधार बताते हुए कहा कि दशकों से यह मुद्दा लंबित था, लेकिन मौजूदा सरकार ने कम समय में ठोस कदम उठाया है. उन्होंने साफ कहा, ''शिक्षा को मुनाफे का जरिया नहीं बनाया जा सकता और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी बच्चे को आर्थिक कारणों से नुकसान न झेलना पड़े.''

अभिभावकों की शिकायतों पर तुरंत एक्शन

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई स्कूल नियमों को दरकिनार कर फीस वसूलता है, तो अभिभावक सीधे शिकायत कर सकते हैं. ऐसी शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का प्रावधान किया गया है, ताकि माता-पिता को बार-बार स्कूलों के चक्कर न काटने पड़ें.

कैपिटेशन फीस पर पूरी तरह प्रतिबंध

नए कानून के तहत कैपिटेशन फीस या किसी भी तरह की छिपी हुई वसूली पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. स्कूल अब केवल उन्हीं सुविधाओं की फीस ले सकेंगे, जिनका छात्र वास्तव में लाभ उठाता है. सभी यूज़र-आधारित शुल्क नो-प्रॉफिट, नो-लॉस के सिद्धांत पर तय किए जाएंगे.

स्कूलों को रखना होगा अलग-अलग वित्तीय रिकॉर्ड

प्राइवेट स्कूलों को अब हर मद के लिए अलग खाते रखने होंगे और अपनी संपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड भी तैयार करना होगा. अभिभावकों से लिया गया पैसा सीधे किसी ट्रस्ट या सोसायटी को ट्रांसफर नहीं किया जा सकेगा. यदि साल के अंत में अतिरिक्त राशि बचती है, तो उसे या तो लौटाना होगा या अगली फीस में समायोजित करना पड़ेगा.

हर स्कूल में बनेगी फीस तय करने वाली कमेटी

कानून के अनुसार, सभी निजी स्कूलों पर एक जैसे नियम लागू होंगे, चाहे वे अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हों या सरकारी जमीन पर बने हों या नहीं. हर स्कूल में एक फीस रेगुलेशन कमेटी गठित होगी, जिसमें स्कूल मैनेजमेंट, शिक्षा विभाग का प्रतिनिधि और लॉटरी के जरिए चुने गए पांच अभिभावक शामिल होंगे. यह कमेटी फीस घटा सकती है या उसे मंजूरी दे सकती है, लेकिन बढ़ाने का अधिकार नहीं होगा. एक बार तय हुई फीस तीन साल तक बदली नहीं जा सकेगी.

माता-पिता का भरोसा लौटाने की कोशिश!

सरकार का मानना है कि इस कानून से स्कूलों की जवाबदेही बढ़ेगी और अभिभावकों का शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा. लंबे समय से चली आ रही फीस को लेकर असंतोष की समस्या को दूर करने की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जा रहा है.

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