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Bihar Politics: कोई 5 या 10 कारण नहीं, सिर्फ इन 3 वजहों से नीतीश सीएम की कुर्सी से आउट किए जा रहे

नीतीश कुमार 1 महीने बाद बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे. सवाल है कि आखिर इसकी वजह क्या है? हम आपको उन वजहों के बारे में विस्तार से बताते हैं जिनकी वजह से अब नीतीश, बिहार से बाहर जा रहे हैं.

बिहार की राजनीति में जैसे-जैसे होली की खुमारी उतर रही है, वैसे-वैसे सियासी पंडित यह बताने में जुटे हैं कि आखिर नीतीश कुमार को इतनी जल्दी, यानी नई सरकार के गठन के सिर्फ 4 महीने बाद ही, सीएम की कुर्सी से क्यों हटाया जा रहा है. विश्लेषक अपनी-अपनी थ्योरी दे रहे हैं, कोई एक से शुरू करके दस तक वजहें गिना रहा है और तरह-तरह के तर्क दे रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि सिर्फ तीन वजहें हैं, जिनकी कीमत नीतीश चुका रहे हैं.

1. आंकड़े जेडीयू के फेवर में नहीं हैं

बिहार की राजनीति में बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन की शुरुआत 1996 में हुई थी. 2005 वह साल था जब दोनों पार्टियों ने मिलकर सूबे में सरकार बनाई. तब जेडीयू बड़े भाई की भूमिका में थी और बीजेपी का कद छोटा था.

2005 के फरवरी चुनाव में जेडीयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ी और 55 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी 102 सीटों पर लड़ी और 37 सीटें जीतीं.
अक्टूबर 2005 के चुनाव में जेडीयू 139 सीटों पर लड़ी और 88 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी 102 सीटों पर लड़ी और 55 सीटें जीतीं. दोनों की सीटें बढ़ीं, लेकिन यह जीत काफी हद तक नीतीश के चेहरे पर मानी गई.

2010 तक जेडीयू-बीजेपी ने बंपर जीत दर्ज की. जेडीयू 141 सीटों पर लड़कर 115 सीटें जीती, वहीं बीजेपी 102 सीटों पर लड़कर 91 सीटें जीती. दोनों की सीटें बढ़ीं, लेकिन जेडीयू बड़ा भाई बना रहा.

2013 में गठबंधन टूट गया और 2015 का चुनाव दोनों ने अलग-अलग लड़ा. पलटवार और सियासी फेरबदल के बाद 2019 का चुनाव आया, लोकसभा में जेडीयू और बीजेपी दोनों ही 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. साल 2020 आते आते तस्वीर और बदल गई. नीतीश बड़े भाई के तौर पर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े, लेकिन नतीजों ने उन्हें छोटा भाई बना दिया. बीजेपी 110 सीटों पर लड़कर 74 सीटें जीत गई, जबकि जेडीयू 115 सीटों पर लड़कर सिर्फ 43 सीटें जीत पाई. इसके बावजूद नीतीश मुख्यमंत्री बने रहे. जीत का आंकड़ा चाहे जो भी रहे, नीतीश बड़ा भाई ही रहे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में छोटा भाई बनने की शुरुआत हो गई. जेडीयू 16 सीटों पर लड़ी थी, जबकि बीजेपी 17 सीटों पर. इसके बाद सियासी उलट-पलट के बीच 2025 के चुनाव से पहले दोनों बराबरी के साझेदार की तरह मैदान में उतरे. चुनावी नतीजे ठीक आए, लेकिन बड़ा भाई बनने का ताज दूसरी बार भी जेडीयू के हाथ से निकल गया. ऐसे में जो आज हो रहा है, वह कहीं न कहीं पहले से तय माना जा रहा था.

2. नीतीश की सेहत पर सवाल

नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी से हटाने की दूसरी वजह उनकी सेहत को माना जा रहा है. मुख्यमंत्री के तौर पर कई ऐसे मौके आए, जब उनकी कार्यशैली सवालों के घेरे में आई और कभी-कभी असहज स्थिति भी बनी. कभी किसी अधिकारी के पैर छूने की कोशिश, तो कभी सार्वजनिक मंचों पर असामान्य बयान-ऐसे कई उदाहरण सामने आए, जिन्हें उनके विरोधियों ने उनकी सेहत से जोड़कर पेश किया. राजनीति में यह उनकी कमजोरी के तौर पर भी देखा जाने लगा. लोग ये मानकर चल रहे थे, देर सबेर उन्हें सक्रिय सियासत से दूर का रास्ता दिखाया ही जाएगा.

3. बीजेपी की सियासी शैली

राजनीति में एक कहावत अक्सर कही जाती है कि यहां कोई किसी का सगा नहीं होता, कुछ भी स्थाई नहीं है. बीजेपी के बारे में भी यह धारणा बनाई जाती रही है कि जब वह किसी क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन करती है, तो शुरू में छोटा साझेदार बनकर रहती है. लेकिन जैसे-जैसे राज्य में उसकी ताकत बढ़ती है, वह धीरे-धीरे नेतृत्व की भूमिका अपने हाथ में लेने की कोशिश करती है.

महाराष्ट्र की राजनीति को कई लोग इसका उदाहरण मानते हैं, जहां पिछले कुछ वर्षों में सियासी समीकरण तेजी से बदले.

बिहार में भी अभी असली सियासी खेल बाकी माना जा रहा है. फिलहाल सिर्फ सत्ता परिवर्तन हो रहा है- यानी बीजेपी का मुख्यमंत्री बन सकता है. लेकिन 2029 के लोकसभा चुनाव तक सियासी समीकरण किस दिशा में जाएंगे, इस पर अभी से अटकलें लगाई जा रही हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जेडीयू की राजनीतिक ताकत और घट सकती है. 

गुमान ये है कि तब तक जेडीयू अपनी आखिरी सांसें ले रहा होगा. न नीतीश होंगे, न पार्टी होगी, न दबदबा होगा. बल्कि जेडीयू के नाम से महज नाम की एक पार्टी होगी, जिसकी हैसियत विधानसभा में दो अंकों से नीचे वाली पार्टी की होगी. ये आखिर हस्र होगा.

अब्दुल वाहिद आज़ाद

अब्दुल वाहिद आज़ाद इस वक़्त abp न्यूज़ में बतौर एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. आज़ाद abp न्यूज़ के डिजिटल विंग में बीते 15 साल से हिंदी वेबसाइट की जिम्मेदारी संभाले रहे हैं. इससे पहले वे बीबीसी उर्दू और हिंदी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं और साढ़े तीन साल तक उनका जुड़ाव बीबीसी से रहा. इस दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग से लेकर खबरों के संपादन के काम को बखू़बी अंजाम दिया. अब्दुल वाहिद आज़ाद ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत हिंदुस्तान एक्सप्रेस अखबार में बतौर कॉरेस्पोंडेंट की. पांच महीने की इस छोटी सी पारी में उन्हें बीजेपी और कांग्रेस पार्टी की बीट दी गई थी. बाजापता तौर पर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया (केंद्रीय विश्वविद्यालय) के हिंदी विभाग से मास मीडिया में स्नातक और देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान MCRC से कनवर्जेंट जर्नलिज्म का कोर्स किया. आज़ाद राजनीति, चुनाव, समाज, मुस्लिम, भेदभाव, उत्पीड़न जैसे संजीदा मसलों के हल में रुचि रखते हैं और इन मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति पर भी उनकी पैनी नज़र है.

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