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दादा-परदादा के जमाने वाले दो पल्लों के दरवाजे क्यों थे बेहद खास? जानिए इनका पूरा इतिहास

पुराने दौर की बहुत सारी चीजें ऐसी हैं, जो कि अब बिल्कुल विलुप्त होने की कगार पर हैं. उनमें से एक है दो पल्लों वाले दरवाजे. चलिए जानें कि पुराने वक्त में ऐसे दरवाजे क्यों बनाए जाते थे.

पुराने दौर की बहुत सारी चीजें ऐसी हैं, जो कि अब बिल्कुल विलुप्त होने की कगार पर हैं. उनमें से एक है दो पल्लों वाले दरवाजे. चलिए जानें कि पुराने वक्त में ऐसे दरवाजे क्यों बनाए जाते थे.

आज के जमाने में जितने भी नए घर बनते हैं, सभी में सिंगल दरवाजे बनाए जाते हैं, या फिर स्लाइड डोर की सुविधा दी जाती है. शहर से लेकर ये फैशन अब गांवों में भी आ चुका है. मगर आप यादों के झरोखे में झांकिए तो याद आएगा कि दादा-नाना के जमाने में पुराने घरों में दो पल्लों वाले दरवाजे हुआ करते थे. इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि गजब की वास्तुकला और इंजीनियरिंग शामिल थी.

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पुराने जमाने में आज की तरह से खोखले बोर्ड, प्लास्टिक या फिर प्लाईवुड के हल्के दरवाजे नहीं बनते थे. उस दौर में किवाड़ बनाने के लिए सागौन, शीशम, महुआ या फिर नीम की लकड़ी का इस्तेमाल होता था.
पुराने जमाने में आज की तरह से खोखले बोर्ड, प्लास्टिक या फिर प्लाईवुड के हल्के दरवाजे नहीं बनते थे. उस दौर में किवाड़ बनाने के लिए सागौन, शीशम, महुआ या फिर नीम की लकड़ी का इस्तेमाल होता था.
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अगर इतनी भारी लकड़ी का एक बड़ा और सिंगल दरवाजा बनाया जाता तो उसका पूरा वजन एक तरफ के कब्जों और दीवार पर आ जाता, जिससे दरवाजा जल्दी झुक जाता या फिर टूट जाता. इसलिए इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया.
अगर इतनी भारी लकड़ी का एक बड़ा और सिंगल दरवाजा बनाया जाता तो उसका पूरा वजन एक तरफ के कब्जों और दीवार पर आ जाता, जिससे दरवाजा जल्दी झुक जाता या फिर टूट जाता. इसलिए इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया.
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इस वजह से वजन बराबर दो हिस्सों में बंट गया और दरवाजों की उम्र लंबी हो गई. पुराने समय में घरों के अंदर गोपनीयता या पर्दा प्रथा पर जोर दिया जाता था. दो पल्लों वाले दरवाजे इस सामाजिक व्यवस्था में बहुत मदद करते थे.
इस वजह से वजन बराबर दो हिस्सों में बंट गया और दरवाजों की उम्र लंबी हो गई. पुराने समय में घरों के अंदर गोपनीयता या पर्दा प्रथा पर जोर दिया जाता था. दो पल्लों वाले दरवाजे इस सामाजिक व्यवस्था में बहुत मदद करते थे.
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अगर घर के बाहर कोई फेरीवाला, डाकिया या फिर कोई अनजान शख्स आता था, तो सिर्फ एक पल्ला खोलकर ही काम चल जाता था. इससे बाहर खड़े शख्स को अंदर की चीजें ज्यादा दिखाई नहीं देती थीं और घर की महिलाएं अपना काम बिना किसी हिचक के करती थीं.
अगर घर के बाहर कोई फेरीवाला, डाकिया या फिर कोई अनजान शख्स आता था, तो सिर्फ एक पल्ला खोलकर ही काम चल जाता था. इससे बाहर खड़े शख्स को अंदर की चीजें ज्यादा दिखाई नहीं देती थीं और घर की महिलाएं अपना काम बिना किसी हिचक के करती थीं.
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पुराने दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो घरों में शादी या किसी उत्सव के दौरान काफी भीड़ हो जाती थी. तब दो पल्लों वाले इन दरवाजों की खासियत यह थी कि इनके दोनों किवाड़ खोल दिए जाते थे, जिससे घर को बहुत चौड़ा और खुला रास्ता मिल जाता था.
पुराने दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो घरों में शादी या किसी उत्सव के दौरान काफी भीड़ हो जाती थी. तब दो पल्लों वाले इन दरवाजों की खासियत यह थी कि इनके दोनों किवाड़ खोल दिए जाते थे, जिससे घर को बहुत चौड़ा और खुला रास्ता मिल जाता था.
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इस वजह से मेहमानों के आने-जाने को रास्ता मिल जाता था, साथ ही खेती-किसानी के बड़े-बड़े अनाज के बोरे, भारी संदूक, बक्से या फिर शादी का बड़ा सामान बिना किसी रुकावट के आसानी से घरों के अंदर आ जाता था.
इस वजह से मेहमानों के आने-जाने को रास्ता मिल जाता था, साथ ही खेती-किसानी के बड़े-बड़े अनाज के बोरे, भारी संदूक, बक्से या फिर शादी का बड़ा सामान बिना किसी रुकावट के आसानी से घरों के अंदर आ जाता था.
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80-90 के दशक के इन घरों को बाहर से इस तरीके से डिजाइन किया जाता था कि बिजली न होने पर भी घर के अंदर उजाला रहे और हवा आती-जाती रहे. दो पल्लों वाले दरवाजे वेंटिलेशन कंट्रोल का काम बेहतर करते थे. अगर बहुत तेज हवा हो तो एक पल्ला बंद करके तेज झोकों को रोका जा सकता था.
80-90 के दशक के इन घरों को बाहर से इस तरीके से डिजाइन किया जाता था कि बिजली न होने पर भी घर के अंदर उजाला रहे और हवा आती-जाती रहे. दो पल्लों वाले दरवाजे वेंटिलेशन कंट्रोल का काम बेहतर करते थे. अगर बहुत तेज हवा हो तो एक पल्ला बंद करके तेज झोकों को रोका जा सकता था.
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कुल मिलाकर देखें तो पुराने घरों के ये दरवाजे महज लकड़ी का ढांचा नहीं थे, बल्कि सुरक्षा का भरोसा, मौसम से लड़ने की क्षमता और सामाजिक ताने-बाने का सम्मान थे. ये आज की आधुनिक इंजीनियरिंग को मात देते थे.
कुल मिलाकर देखें तो पुराने घरों के ये दरवाजे महज लकड़ी का ढांचा नहीं थे, बल्कि सुरक्षा का भरोसा, मौसम से लड़ने की क्षमता और सामाजिक ताने-बाने का सम्मान थे. ये आज की आधुनिक इंजीनियरिंग को मात देते थे.

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