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Opinion: भरत तिवारी कांड ने बिहार के सामाजिक समीकरण को बदल दिया

भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा बिहार की सियासत का टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है.  इस हत्याकांड ने बिहार में जाति की राजनीति को फिर से जिंदा कर दिया है. विधानसभा चुनाव में जातीयता भुलाकर NDA को अप्रत्याशित जीत मिली थी. लेकिन इस कांड ने उस जाति के दौर को फिर से जिंदा कर दिया जिसे लोग पीछे छोड़कर आगे निकल रहे थे. भरत तिवारी के एनकाउंटर से पहले न तो पुलिस वालों ने सोचा रहा होगा और ना ही आदेश देने वालों ने. लेकिन जो हुआ और हो रहा है उसने मौजूदा मुख्यमंत्री की छवि को कोर वोटरों में बिगाड़ दिया.

सम्राट चौधरी अपनी छवि एक मजबूत ताकतवर नेता की स्थापित करना चाहते थे. लेकिन इस मामले ने उन्हें अपनों का दुशमन बना दिया है. सम्राट को मालूम था कि उन्हें काँटों का ताज मिला है. बावजूद इसके उन्होंने इसे संभालने में भूल की. अब उनके खिलाफ पूरा सिस्टम एक्टिव होगा. अभी तत्कालिक तौर पर भले ही कोई नुकसान न हो लेकिन बीजेपी ने नुकसान तो कर लिया है . इसकी भरपाई पार्टी और मुख्यमंत्री कैसे करते हैं ये देखना रहेगा.

पीके की अब जातिवादी राजनीति

सम्राट चौधरी के पास गृहमंत्रालय है. बिना उनके मंत्रालय की मर्जी के गोली चलाने का फैसला नहीं हो सकता. प्रशांत किशोर ने इस दबे हुए सवाल को हवा दी है.पीके अब तक जाति की राजनीति से दूर थे. लेकिन इस एपिसोड ने उन्हें सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का नेता बनने की राह पर बढ़ा दिया है. पीके अब स्थापित तौर पर ब्राह्मण समाज के नेता होंगे इसमें कोई दो राय नहीं है.

भरत तिवारी कोई पेशेवर अपराधी नहीं था. उसने कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं किया था. उसने हथियार दिखाकर पुलिस वालों को धमकाया ये गलत किया. लेकिन हथियार डालने के बाद उसको गोली मार देना वो भी एक दो नहीं तीन चार गोली. इस आरोप को पुख्ता करता है कि पुलिस ने गोली जानकर मारी . इस गुरूर में कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा.

पुलिस के आला अधिकारी मान लिए कि गलती हुई लेकिन मुख्यमंत्री और उनके समाज के शुभचिंतक नहीं मान पाए. गलती हुई. पहले दूसरे दिन ही कोई प्रशासनिक कार्रवाई हो जाती तो सम्राट चौधरी हीरो बन जाते. अब ऐसा लग रहा जैसे सम्राट विलेन हो चुके हैं. इसका दाग़ उन्हें राजनीतिक करियर में क्या नुकसान करेगा ये तो नहीं पता लेकिन इतना तय हो गया कि इस हत्याकांड ने सत्ता के समर्थन और विरोध में नया समीकरण खड़ा कर दिया है. जिस तरह से यादव जाति के लोग खुलकर भरत तिवारी के समर्थन में उतरे. और जिस तरह से कुशवाहा नेताओं ने इस एनकाउंटर को सही साबित करने के लिए भड़काऊ बयान दिए उसने सामाजिक सियासत की नई लकीर खींच दी है.

सवर्णों की नाराजगी का खामियाजा

उपेंद्र कुशवाहा, नागमणि, रामेश्वर महतो, संतोष कुशवाहा जैसे मुख्यमंत्री के स्वजातीय नेताओं ने एनकाउंटर को सही बताया उससे ये स्पष्ट है कि अब जातीय ध्रुवीकरण में कुशवाहा जाति को आगे की लड़ाई बहुत जगह अकेले लड़नी पड़ सकती है. सम्राट सरकार में बेटा मंत्री नहीं बना तो आनंद मोहन ने पहले ही मोर्चा खोल रखा था. बृजबिहारी प्रसाद की पुण्य तिथि में बीजेपी के पहले सीएम का जाना भूमिहारों को खल गया. और इस एनकाउंटर में ब्राह्मण. ये तीनों जातियां बीजेपी की समर्थक हैं. लेकिन इस वक्त जमीन पर तीनों नाराज.  याद कीजिए 2022 में बोचहाँ विधानसभा का उपचुनाव. 2020 में nda की सरकार बनने के बाद पहले उपचुनाव था . Vip के विधायक मुसाफ़िर पासवान के निधन से सीट खाली हुई.

तब बीजेपी ने तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को डिप्टी सीएम बनाया था. भूमिहारों में नाराजगी थी. NDA के 100 विधायक , 20 से ज्यादा सांसद और केंद्रीय मंत्री को बीजेपी ने उपचुनाव के प्रचार में उतारा, गिरिराज सिंह, ललन सिंह पैदल घूम रहे थे. बावजूद इसके NDA को ओपन चैलेंज देकर भूमिहारों ने हरवा दिया. राजद की जीत हुई . सुशील मोदी ने खुलकर कहा कि भूमिहार, ब्राह्मण सरकार से खुश नहीं हैं. इस चुनाव के 3 महीने बाद नीतीश ने रास्ता बदल लिया. बीजेपी विपक्ष में चली गई.  भूमिहारों की नाराजगी दूर करने के लिए तब बीजेपी ने विजय सिन्हा को नेता विपक्ष बनाया.

ललन सिंह जेडीयू के अध्यक्ष बने. ये प्रकरण बीजेपी और जेडीयू के नेता भूले नहीं होंगे.  भरत तिवारी का मुद्दा सेंटीमेंटल इसलिए हो गया है क्योंकि पुलिस मान चुकी है कि गलती हुई. सारे सबूत फर्जी भरत एनकाउंटर को पुख्ता कर रहे. लाइव वीडियो की वजह से भरत को समाज का शुभचिंतक माना गया. अब जो मीडिया में खुलासे हो रहे हैं वो पुख्ता कर रहा है कि भोजपुर में भ्रष्टाचार का भारी खेल चल रहा था. पूरे देश में ब्राह्मण समाज, सवर्ण समाज साथ खड़ा हो गया, जुलूस निकल रहे, प्रदर्शन हो रहे.

मधुबनी में ताज़िया के जुलूस में भरत के समर्थन में नारे लगे, पोस्टर लहराए गए . साफ है कि एक वर्ग में भारी नाराजगी है.  सरकार ने जो काम हफ्ते भर बाद किया वो पहले दूसरे दिन कर लिया होता तो चीजें हाथ से नहीं निकलती. अब इसकी कीमत बीजेपी के सवर्ण नेता और कार्यकर्ता चुकाएंगे. इस भरोसे के भरने में टाइम लगेगा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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