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दस्त से हुई थी इस मुगल बादशाह की मौत, क्यों नहीं मिला था इस बीमारी का इलाज?

इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में से एक, जिसने आधे से ज्यादा हिंदुस्तान पर अपनी हुकूमत चलाई, उसकी मौत किसी जंग के मैदान में नहीं बल्कि महल के एक बंद कमरे में हुई थी. आइए जानें कि वह कौन था.

इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में से एक, जिसने आधे से ज्यादा हिंदुस्तान पर अपनी हुकूमत चलाई, उसकी मौत किसी जंग के मैदान में नहीं बल्कि महल के एक बंद कमरे में हुई थी. आइए जानें कि वह कौन था.

इतिहास के पन्नों में जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को एक ऐसे अजेय योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिसने उत्तर भारत से लेकर दक्कन की सीमाओं तक मुगल सल्तनत का परचम लहराया. लेकिन विडंबना देखिए, जिस सम्राट को रणभूमि में कोई मात न दे सका, उसे एक आम सी लगने वाली बीमारी ने बिस्तर पर ला दिया. अकबर की मृत्यु किसी दुश्मन की तलवार या महल के षड्यंत्र से नहीं, बल्कि शरीर को भीतर से तोड़ देने वाली बीमारी दस्त (Dysentery) से हुई थी. आइए जानें.

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मुगल बादशाह अकबर का शासनकाल विस्तार और सुधारों के लिए जाना जाता है, लेकिन उनके जीवन के अंतिम दिन भारी व्यक्तिगत दुख और शारीरिक पीड़ा से भरे थे. 15 अक्टूबर 1542 को जन्मे अकबर ने अपने अंतिम समय में अपने सबसे करीबियों को खोते देखा है.
मुगल बादशाह अकबर का शासनकाल विस्तार और सुधारों के लिए जाना जाता है, लेकिन उनके जीवन के अंतिम दिन भारी व्यक्तिगत दुख और शारीरिक पीड़ा से भरे थे. 15 अक्टूबर 1542 को जन्मे अकबर ने अपने अंतिम समय में अपने सबसे करीबियों को खोते देखा है.
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उनके प्रिय नवरत्न बीरबल की हत्या कबायली विद्रोह में हो गई, जबकि उनके बेटे मुराद और दानियाल की अत्यधिक शराब पीने के कारण कम उम्र में ही मृत्यु हो गई. रही-सही कसर उनकी माता हमीदा बानो बेगम के निधन ने पूरी कर दी, जिन्होंने 29 अगस्त 1604 को दुनिया को अलविदा कहा. इन मौतों के सदमे ने अकबर के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला.
उनके प्रिय नवरत्न बीरबल की हत्या कबायली विद्रोह में हो गई, जबकि उनके बेटे मुराद और दानियाल की अत्यधिक शराब पीने के कारण कम उम्र में ही मृत्यु हो गई. रही-सही कसर उनकी माता हमीदा बानो बेगम के निधन ने पूरी कर दी, जिन्होंने 29 अगस्त 1604 को दुनिया को अलविदा कहा. इन मौतों के सदमे ने अकबर के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला.
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अकबर की तबीयत बिगड़ने का सिलसिला 22 सितंबर 1605 को शुरू हुआ, जब उन्हें अचानक पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई. शुरुआत में इसे सामान्य अजीर्ण माना गया, लेकिन जल्द ही इसके लक्षण गंभीर पेचिश में बदल गए. 3 अक्टूबर 1605 तक अकबर की हालत काफी चिंताजनक हो गई.
अकबर की तबीयत बिगड़ने का सिलसिला 22 सितंबर 1605 को शुरू हुआ, जब उन्हें अचानक पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई. शुरुआत में इसे सामान्य अजीर्ण माना गया, लेकिन जल्द ही इसके लक्षण गंभीर पेचिश में बदल गए. 3 अक्टूबर 1605 तक अकबर की हालत काफी चिंताजनक हो गई.
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17वीं सदी की शुरुआत में चिकित्सा विज्ञान आज जैसा उन्नत नहीं था. पेचिश या दस्त होने पर शरीर में पानी की भारी कमी (Dehydration) हो जाती है. उस वक्त 'इलेक्ट्रोलाइट्स' के महत्व और पानी की कमी को तुरंत पूरा करने की आधुनिक तकनीकों के बारे में जानकारी सीमित थी.
17वीं सदी की शुरुआत में चिकित्सा विज्ञान आज जैसा उन्नत नहीं था. पेचिश या दस्त होने पर शरीर में पानी की भारी कमी (Dehydration) हो जाती है. उस वक्त 'इलेक्ट्रोलाइट्स' के महत्व और पानी की कमी को तुरंत पूरा करने की आधुनिक तकनीकों के बारे में जानकारी सीमित थी.
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हकीम अक्सर जड़ी-बूटियों और अर्क का इस्तेमाल करते थे, जो कई बार संक्रमण को रोकने के बजाय पेट को और अधिक संवेदनशील बना देते थे. अकबर के मामले में उनके मानसिक तनाव ने भी आग में घी का काम किया; अपने प्रिय नवरत्न बीरबल की मौत और अपने ही बेटों, मुराद और दानियाल की शराब के कारण हुई अकाल मृत्यु ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था.
हकीम अक्सर जड़ी-बूटियों और अर्क का इस्तेमाल करते थे, जो कई बार संक्रमण को रोकने के बजाय पेट को और अधिक संवेदनशील बना देते थे. अकबर के मामले में उनके मानसिक तनाव ने भी आग में घी का काम किया; अपने प्रिय नवरत्न बीरबल की मौत और अपने ही बेटों, मुराद और दानियाल की शराब के कारण हुई अकाल मृत्यु ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था.
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उस दौर के बेहतरीन हकीमों और वैद्यों ने उनका उपचार किया, लेकिन लगातार होते दस्त (Dysentery) ने उनके शरीर को भीतर से सुखा दिया था. 10 दिनों के भीतर उन्हें तेज बुखार ने जकड़ लिया और वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गए. 22 दिनों तक इस जानलेवा बीमारी से लड़ने के बाद, उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया.
उस दौर के बेहतरीन हकीमों और वैद्यों ने उनका उपचार किया, लेकिन लगातार होते दस्त (Dysentery) ने उनके शरीर को भीतर से सुखा दिया था. 10 दिनों के भीतर उन्हें तेज बुखार ने जकड़ लिया और वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गए. 22 दिनों तक इस जानलेवा बीमारी से लड़ने के बाद, उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया.
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अकबर की बीमारी के दौरान महल के भीतर सत्ता संघर्ष भी तेज हो गया था. दरबारी राजनीति के कारण यह अफवाह उड़ी कि अकबर अपने बेटे सलीम (जहांगीर) के बजाय अपने पोते खुसरो को वारिस बनाना चाहते हैं. इस डर से सलीम काफी समय तक अकबर के पास नहीं आया.
अकबर की बीमारी के दौरान महल के भीतर सत्ता संघर्ष भी तेज हो गया था. दरबारी राजनीति के कारण यह अफवाह उड़ी कि अकबर अपने बेटे सलीम (जहांगीर) के बजाय अपने पोते खुसरो को वारिस बनाना चाहते हैं. इस डर से सलीम काफी समय तक अकबर के पास नहीं आया.

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