अमेरिका की जांच में भारत-चीन दोषी निकले तो क्या होगा, क्या एक्शन ले सकते हैं ट्रंप?
ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत और चीन के खिलाफ शुरू की गई 'सेक्शन 301' की जांच वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है. लेकिन तब क्या होगा जब ट्रंप की इस जांच में भारत और चीन दोषी निकल आएं.

- अमेरिकी व्यापार कानून 'सेक्शन 301' का हो सकता है इस्तेमाल.
- अनुचित व्यापार प्रथाओं के आरोपों पर कार्रवाई की तलवार.
- 10-60% तक टैरिफ, भारतीय उद्योगों पर पड़ेगा असर.
डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर वापसी ने वैश्विक व्यापार के समीकरणों को हिला कर रख दिया है. इस बार ट्रंप प्रशासन का सबसे बड़ा हथियार 'सेक्शन 301' की जांच है, जिसके निशाने पर सीधे तौर पर भारत और चीन जैसे बड़े कारोबारी साझेदार हैं. यदि अमेरिका की इस जांच में भारत और चीन अनुचित व्यापार प्रथाओं के दोषी पाए जाते हैं, तो ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत ऐसी कार्रवाई हो सकती है जो वैश्विक बाजार की पूरी तस्वीर बदल सकती है.
सेक्शन 301 की जांच और ट्रंप का सख्त रुख
डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि भारत और चीन जैसे देश अपनी नीतियों के जरिए अमेरिकी बाजार का गलत फायदा उठा रहे हैं. 'सेक्शन 301' अमेरिका के व्यापार कानून का एक ऐसा प्रावधान है जो राष्ट्रपति को किसी भी देश के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई करने की शक्ति देता है, यदि वह देश अमेरिकी वाणिज्य के लिए अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है. इस बार ट्रंप का मुख्य जोर अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बचाने और उन देशों को दंडित करने पर है जो अपनी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता का इस्तेमाल कर अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.
भारी टैरिफ और सीमा शुल्क का मंडराता खतरा
अगर जांच में भारत और चीन दोषी पाए जाते हैं, तो ट्रंप का सबसे पहला और पसंदीदा कदम होगा टैरिफ की दीवार खड़ी करना. ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वे विदेशी सामानों पर 10% से 60% तक का आयात शुल्क लगा सकते हैं. चीन के लिए यह दर और भी अधिक हो सकती है. भारत के लिए चिंता की बात यह है कि हमारे आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर सीधे तौर पर अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं. ऊंचे टैरिफ का मतलब होगा कि भारतीय सामान अमेरिका में महंगा हो जाएगा, जिससे हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाएगी.
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विशिष्ट सेक्टरों पर व्यापारिक प्रतिबंधों की तलवार
जांच में दोषी पाए जाने पर अमेरिका केवल टैरिफ तक सीमित नहीं रहेगा. ट्रंप प्रशासन विशिष्ट क्षेत्रों से होने वाले आयात को पूरी तरह सीमित या प्रतिबंधित भी कर सकता है. विशेष रूप से उन सेक्टरों पर प्रहार किया जा सकता है, जहां अमेरिका को लगता है कि भारत या चीन 'ओवरकैपेसिटी' यानी जरूरत से ज्यादा उत्पादन कर बाजार को सस्ते माल से पाट रहे हैं. इसमें स्टील, एल्युमीनियम और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं. ऐसी पाबंदियां इन देशों की औद्योगिक इकाइयों के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकती हैं.
सप्लाई चेन को मित्र देशों में ले जाने का दबाव
ट्रंप का एक बड़ा लक्ष्य अमेरिकी सप्लाई चेन को चीन और भारत जैसे देशों से हटाकर वापस अमेरिका (री-शोरिंग) या अपने मित्र देशों (फ्रेंड-शोरिंग) में ले जाना है. दोषी पाए जाने पर अमेरिका अपनी कंपनियों पर दबाव बना सकता है कि वे इन देशों से अपना निवेश निकालें. इसके लिए दंडात्मक कर नीतियां अपनाई जा सकती हैं. यदि अमेरिकी कंपनियां भारत या चीन से अपना परिचालन समेटती हैं, तो इसका सीधा असर रोजगार और विदेशी निवेश (FDI) पर पड़ेगा, जो भारत की विकास दर के लिए एक गंभीर चुनौती होगा.
दंडात्मक कार्रवाई और वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका
'सेक्शन 301' के तहत ट्रंप सरकार केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि दंडात्मक कार्रवाई भी कर सकती है. इसमें बौद्धिक संपदा (IP) के उल्लंघन और मजबूरन श्रम (Forced Labor) जैसे गंभीर आरोपों को शामिल कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन देशों की घेराबंदी की जा सकती है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि ट्रंप का यह रुख एक नए 'ग्लोबल ट्रेड वॉर' की शुरुआत हो सकता है. भारत को अपनी व्यापारिक नीतियों को संतुलित करने और अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत के जरिए इन कड़े एक्शन से बचने का रास्ता ढूंढना होगा.
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Source: IOCL




























