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कितने जहरीले होते हैं उड़ने वाले सांप, ये कहां पाए जाते हैं?

उड़ने वाले सांप दिखने में भले डरावने हों, लेकिन इंसानों के लिए जानलेवा नहीं हैं. सही जानकारी ही इन रहस्यमयी सांपों की असली पहचान है. आइए जानें कि ये किनके लिए खतरनाक होते हैं.

उड़ने वाले सांप दिखने में भले डरावने हों, लेकिन इंसानों के लिए जानलेवा नहीं हैं. सही जानकारी ही इन रहस्यमयी सांपों की असली पहचान है. आइए जानें कि ये किनके लिए खतरनाक होते हैं.

जंगलों में अचानक हवा में लहराता कोई सांप दिख जाए तो डर लगना स्वाभाविक है. अक्सर लोग मान लेते हैं कि जो सांप उड़ सकता है, वह बेहद जहरीला और जानलेवा होगा, लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या ये सांप इंसानों के लिए खतरा हैं या फिर सिर्फ डर की वजह से बदनाम हो गए हैं? उड़ने वाले सांपों को लेकर फैली अफवाहों और हकीकत के बीच का फर्क जानना बेहद जरूरी है, आइए समझें.

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उड़ने वाले सांपों को वैज्ञानिक भाषा में क्राइसोपेलिया (Chrysopelea) कहा जाता है. ये सांप असल में उड़ते नहीं हैं, बल्कि एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फिसलते हुए छलांग लगाते हैं. ये अपने शरीर को चपटा कर लेते हैं और हवा में ग्लाइड करते हैं, जिससे दूर तक पहुंच जाते हैं.
उड़ने वाले सांपों को वैज्ञानिक भाषा में क्राइसोपेलिया (Chrysopelea) कहा जाता है. ये सांप असल में उड़ते नहीं हैं, बल्कि एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फिसलते हुए छलांग लगाते हैं. ये अपने शरीर को चपटा कर लेते हैं और हवा में ग्लाइड करते हैं, जिससे दूर तक पहुंच जाते हैं.
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यही वजह है कि इन्हें आम भाषा में उड़ने वाला सांप कहा जाने लगा. उड़ने वाले सांपों को हल्का जहरीला माना जाता है. इनका जहर इंसानों को मारने के लिए नहीं, बल्कि छोटे जीवों को काबू में करने के लिए होता है. ये सांप छिपकली, मेंढक, छोटे पक्षी और कभी-कभी छोटे स्तनधारियों को पकड़ने के लिए अपने जहर का इस्तेमाल करते हैं.
यही वजह है कि इन्हें आम भाषा में उड़ने वाला सांप कहा जाने लगा. उड़ने वाले सांपों को हल्का जहरीला माना जाता है. इनका जहर इंसानों को मारने के लिए नहीं, बल्कि छोटे जीवों को काबू में करने के लिए होता है. ये सांप छिपकली, मेंढक, छोटे पक्षी और कभी-कभी छोटे स्तनधारियों को पकड़ने के लिए अपने जहर का इस्तेमाल करते हैं.
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इनके जहर का असर छोटे जानवरों के तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है, जिससे वे कुछ समय के लिए सुन्न या निष्क्रिय हो जाते हैं. इंसानों पर इसका गंभीर असर नहीं देखा गया है. अगर कभी दुर्लभ स्थिति में उड़ने वाला सांप किसी इंसान को काट ले, तो आमतौर पर हल्की प्रतिक्रिया ही होती है.
इनके जहर का असर छोटे जानवरों के तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है, जिससे वे कुछ समय के लिए सुन्न या निष्क्रिय हो जाते हैं. इंसानों पर इसका गंभीर असर नहीं देखा गया है. अगर कभी दुर्लभ स्थिति में उड़ने वाला सांप किसी इंसान को काट ले, तो आमतौर पर हल्की प्रतिक्रिया ही होती है.
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काटी गई जगह पर थोड़ा दर्द, हल्की सूजन या लालिमा आ सकती है. यह असर अक्सर कुछ समय में खुद ही ठीक हो जाता है. केवल गंभीर एलर्जी वाले लोगों में मधुमक्खी के डंक जैसी प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन यह भी जानलेवा नहीं होती है.
काटी गई जगह पर थोड़ा दर्द, हल्की सूजन या लालिमा आ सकती है. यह असर अक्सर कुछ समय में खुद ही ठीक हो जाता है. केवल गंभीर एलर्जी वाले लोगों में मधुमक्खी के डंक जैसी प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन यह भी जानलेवा नहीं होती है.
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उड़ने वाले सांपों के दांत मुंह के पिछले हिस्से में होते हैं. इसी वजह से ये इंसानी त्वचा में गहराई तक जहर पहुंचाने में सक्षम नहीं होते. यही कारण है कि इनके काटने से गंभीर विषाक्तता का खतरा नहीं माना जाता है.
उड़ने वाले सांपों के दांत मुंह के पिछले हिस्से में होते हैं. इसी वजह से ये इंसानी त्वचा में गहराई तक जहर पहुंचाने में सक्षम नहीं होते. यही कारण है कि इनके काटने से गंभीर विषाक्तता का खतरा नहीं माना जाता है.
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उड़ने वाले सांप मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों में पाए जाते हैं. भारत, श्रीलंका, वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार, लाओस, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिणी चीन में ये आम हैं.
उड़ने वाले सांप मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों में पाए जाते हैं. भारत, श्रीलंका, वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार, लाओस, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिणी चीन में ये आम हैं.
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भारत में गोल्डन ट्री स्नेक जैसी प्रजातियां पाई जाती हैं. ये सांप आमतौर पर ऊंचे पेड़ों पर रहते हैं, ताकि एक डाल से दूसरी डाल पर आसानी से छलांग लगा सकें.
भारत में गोल्डन ट्री स्नेक जैसी प्रजातियां पाई जाती हैं. ये सांप आमतौर पर ऊंचे पेड़ों पर रहते हैं, ताकि एक डाल से दूसरी डाल पर आसानी से छलांग लगा सकें.

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