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क्या लोक अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में दी जा सकती है चुनौती, जानें यहां कौन से मामले नहीं सुने जाते?

लोक अदालत का फैसला आपसी सहमति से होता है, इसलिए इसके खिलाफ सीधे अपील नहीं की जा सकती है. केवल विशेष परिस्थितियों में रिट याचिका के जरिए हाईकोर्ट जाया जा सकता है.

देश की कानूनी व्यवस्था में लोक अदालत को समझौते के जरिए न्याय का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है. अदालतों में लंबित करोड़ों मामलों के बोझ को कम करने के लिए यह एक वरदान है, लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या लोक अदालत द्वारा सुनाया गया फैसला अंतिम होता है? क्या इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जा सकती है? कानूनी साक्षरता के इस दौर में यह जानना बेहद जरूरी है कि लोक अदालत की शक्ति क्या है और वे कौन से मामले हैं जिनकी सुनवाई इस मंच पर चाहकर भी नहीं की जा सकती है. 

लोक अदालत के फैसले की कानूनी स्थिति 

कानूनी प्रावधानों के अनुसार, लोक अदालत द्वारा दिया गया फैसला एक सिविल कोर्ट की डिक्री के समान होता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आपसी सहमति पर आधारित होता है. चूंकि लोक अदालत का आदेश दोनों पक्षों की रजामंदी से आता है, इसलिए कानूनी रूप से इसके खिलाफ किसी भी उच्च अदालत (हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट) में कोई अपील दायर नहीं की जा सकती है. यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि विवादों का हमेशा के लिए निपटारा हो सके और अदालतों पर बोझ न बढ़े.

क्या हाई कोर्ट में चुनौती देने का कोई रास्ता बचा है?

हालांकि लोक अदालत के फैसले के खिलाफ सीधे तौर पर अपील नहीं की जा सकती है, लेकिन कानून में एक छोटा सा झरोखा खुला है. अगर किसी पक्ष को लगता है कि लोक अदालत का फैसला धोखाधड़ी, दबाव या नियमों के घोर उल्लंघन के माध्यम से लिया गया है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत हाई कोर्ट में 'रिट याचिका' (Writ Petition) दायर कर सकता है. ध्यान रहे, यह कोई नियमित अपील नहीं है, बल्कि केवल प्रक्रियात्मक खामियों या मौलिक अधिकारों के हनन के आधार पर की जाने वाली एक विशेष चुनौती है.

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वे मामले जिनकी सुनवाई लोक अदालत में वर्जित है

लोक अदालत हर तरह के विवाद को नहीं सुलझा सकती है, इसकी अपनी सीमाएं हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 'गैर-शमनीय' (Non-Compoundable) आपराधिक मामले यहां नहीं सुने जा सकते हैं. यानी ऐसे गंभीर अपराध जिनमें कानूनन समझौता करने की अनुमति नहीं है (जैसे हत्या, बलात्कार या डकैती), वे लोक अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. इसके अलावा, जिन मामलों में किसी एक पक्ष की सहमति नहीं होती है, लोक अदालत उनमें जबरन फैसला नहीं सुना सकती है. पारिवारिक विवादों में भी अगर तलाक जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हों, तो लोक अदालत सीधे तौर पर डिक्री नहीं देती है.

लोक अदालत में केस ले जाने के फायदे और प्रक्रिया

लोक अदालत में मामला ले जाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां कोई अदालती शुल्क (Court Fee) नहीं लगता है. यदि आपका मामला पहले से किसी अदालत में लंबित है और लोक अदालत में सुलझ जाता है, तो पहले भरी गई कोर्ट फीस भी वापस कर दी जाती है. यहां कोई सख्त प्रक्रियात्मक नियम (जैसे साक्ष्य अधिनियम) लागू नहीं होते, बल्कि वकील और जज के बजाय एक पैनल (जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता भी हो सकते हैं) बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने में मदद करता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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