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Time In Space: क्या अंतरिक्ष में अलग तरह से बीतता है समय, जानें यह धरती से कितना तेज या धीमा होता है?

Time In Space: अंतरिक्ष में समय धरती के जैसे नहीं बीतता. आइए जानते हैं कि ब्रह्मांड में समय किस गति से बीतता है.

Time In Space: अंतरिक्ष में समय धरती के जैसे नहीं बीतता. आइए जानते हैं कि ब्रह्मांड में समय किस गति से बीतता है.

Time In Space: यह सुनने में काफी अजीब लग सकता है लेकिन असल में ब्रह्मांड में हर जगह समय एक जैसा नहीं बीतता. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने वाले एस्ट्रोनॉट धरती पर रहने वाले लोगों की तुलना में समय को थोड़ा अलग तरह से महसूस करते हैं. आइए जानते हैं क्या होती है इसके पीछे की वजह.

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यह विचार की समय धीमा या फिर तेज हो सकता है अल्बर्ट आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी से आया है. इस थ्योरी के मुताबिक समय निरपेक्ष नहीं है. यह ग्रेविटी और गति पर निर्भर करता है. इस घटना को टाइम डायलेशन के नाम से जाना जाता है.
यह विचार की समय धीमा या फिर तेज हो सकता है अल्बर्ट आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी से आया है. इस थ्योरी के मुताबिक समय निरपेक्ष नहीं है. यह ग्रेविटी और गति पर निर्भर करता है. इस घटना को टाइम डायलेशन के नाम से जाना जाता है.
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अंतरिक्ष की तुलना में धरती पर ग्रेविटी ज्यादा है. ज्यादा ग्रेविटी स्पेस टाइम को ज्यादा मोड़ती है जिस वजह से समय का बीतना थोड़ा धीमा हो जाता है. क्योंकि आईएसएस पर एस्ट्रोनॉट धरती के ग्रेविटेशनल खिंचाव से दूर रहते हैं इस वजह से ग्रेविटी आधारित फिजिक्स बताती है कि उनके लिए समय धरती पर लोगों की तुलना में थोड़ी रफ्तार से बीतना चाहिए.
अंतरिक्ष की तुलना में धरती पर ग्रेविटी ज्यादा है. ज्यादा ग्रेविटी स्पेस टाइम को ज्यादा मोड़ती है जिस वजह से समय का बीतना थोड़ा धीमा हो जाता है. क्योंकि आईएसएस पर एस्ट्रोनॉट धरती के ग्रेविटेशनल खिंचाव से दूर रहते हैं इस वजह से ग्रेविटी आधारित फिजिक्स बताती है कि उनके लिए समय धरती पर लोगों की तुलना में थोड़ी रफ्तार से बीतना चाहिए.
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आईएएस ऑर्बिट में रहने के लिए काफी तेज गति से चलता है. यह लगभग 28000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलता है. आइंस्टीन के मुताबिक कोई भी वस्तु जितनी तेजी से चलती है उसके लिए समय उतना ही धीमा बीतता है. यह वेलोसिटी टाइम डायलेशन प्रभाव एस्ट्रोनॉट को मिलने वाले ग्रेविटी के फायदे से ज्यादा मजबूत होता है.
आईएएस ऑर्बिट में रहने के लिए काफी तेज गति से चलता है. यह लगभग 28000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलता है. आइंस्टीन के मुताबिक कोई भी वस्तु जितनी तेजी से चलती है उसके लिए समय उतना ही धीमा बीतता है. यह वेलोसिटी टाइम डायलेशन प्रभाव एस्ट्रोनॉट को मिलने वाले ग्रेविटी के फायदे से ज्यादा मजबूत होता है.
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जब दोनों प्रभावों को मिलाया जाता है तो आईएएस की स्पीड हावी हो जाती है. यही वजह है कि एस्ट्रोनॉट धरती पर लोगों की तुलना में समय को थोड़ा धीमा महसूस करते हैं. यह अंतर काफी छोटा है लेकिन असली है.
जब दोनों प्रभावों को मिलाया जाता है तो आईएएस की स्पीड हावी हो जाती है. यही वजह है कि एस्ट्रोनॉट धरती पर लोगों की तुलना में समय को थोड़ा धीमा महसूस करते हैं. यह अंतर काफी छोटा है लेकिन असली है.
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एक एस्ट्रोनॉट जो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लगभग 6 महीने बीतता है वह धरती पर लौटने पर उस व्यक्ति की तुलना में लगभग 0.007 सेकंड छोटा होता है जो ग्रह पर ही रहा.
एक एस्ट्रोनॉट जो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लगभग 6 महीने बीतता है वह धरती पर लौटने पर उस व्यक्ति की तुलना में लगभग 0.007 सेकंड छोटा होता है जो ग्रह पर ही रहा.
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यह सिर्फ अंतरिक्ष की जिज्ञासा नहीं है. जीपीएस सैटेलाइट जैसी रोजमर्रा की टेक्नोलॉजी में टाइम डायलेशन का ध्यान रखना काफी जरूरी है. अगर वैज्ञानिक इन छोटे समय के अंतरों को नजरअंदाज करते तो जीपीएस की गलतियां हर दिन किलोमीटर में बढ़ जाती है.
यह सिर्फ अंतरिक्ष की जिज्ञासा नहीं है. जीपीएस सैटेलाइट जैसी रोजमर्रा की टेक्नोलॉजी में टाइम डायलेशन का ध्यान रखना काफी जरूरी है. अगर वैज्ञानिक इन छोटे समय के अंतरों को नजरअंदाज करते तो जीपीएस की गलतियां हर दिन किलोमीटर में बढ़ जाती है.

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