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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बाहरी देशों का कंट्रोल क्यों मुश्किल, क्यों कदम पीछे खींच रहे यूरोपियन देश?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का भौगोलिक नियंत्रण और उसकी मिसाइल क्षमता बाहरी देशों के लिए बड़ी चुनौती है. 21 मील चौड़े इस संकरे रास्ते में जहाजों की जब्ती और जैमिंग के डर से यूरोपीय देश अब पीछे हट रहे हैं.

दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस ईंधन पर टिकी है, उसका एक-चौथाई हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के बेहद संकरे और खतरनाक रास्ते से होकर गुजरता है. ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने इस समुद्री मार्ग को एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है. यह जलडमरूमध्य इतना संकरा है कि यहां दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेनाएं भी खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं. पिछले कुछ समय में यूरोपीय देशों द्वारा इस क्षेत्र से अपने कदम पीछे खींचने और सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचने की कोशिशों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. यह केवल एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि एक ऐसा चक्रव्यूह है जहां भूगोल और सैन्य रणनीति मिलकर किसी भी बाहरी देश के नियंत्रण को लगभग नामुमकिन बना देती हैं. 

बाहरी नौसेनाओं के लिए यहां पैर जमाना है एक बुरा सपना?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है. इसकी कुल चौड़ाई महज 21 मील है, लेकिन जहाजों के आने-जाने के लिए सुरक्षित 'शिपिंग लेन' इससे भी बहुत छोटी है. इस संकरेपन का सबसे बड़ा फायदा ईरान को मिलता है, जिसकी लंबी तटरेखा इस पूरे मार्ग के समानांतर चलती है. 

ईरान ने अपने तटों और होर्मुज, केशम व लारक जैसे महत्वपूर्ण द्वीपों पर आधुनिक मिसाइल प्रणालियां तैनात कर रखी हैं. किसी भी बाहरी देश के लिए यहां नियंत्रण करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि यहां 'परंपरागत युद्ध' के नियम काम नहीं करते हैं. यहां बड़े विमानवाहक पोत या युद्धपोत अपनी ताकत दिखाने के बजाय ईरान की छोटी और तेज रफ्तार मिसाइल नौकाओं के लिए एक आसान लक्ष्य बन जाते हैं. 

ईरान की सैन्य रणनीति और युद्ध का खतरा

ईरान इस क्षेत्र में अपनी 'असममित युद्ध' (Asymmetric Warfare) क्षमता का भरपूर लाभ उठाता है. उसके पास बड़ी नौसेना के मुकाबले सैकड़ों ऐसी छोटी नावें हैं जो मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस हैं. ये नावें झुंड में हमला करती हैं, जिनसे निपटना भारी-भरकम जहाजों के लिए बहुत कठिन होता है. इसके अलावा, ईरान ने इस संकरे रास्ते में समुद्री बारूदी सुरंगें (Mines) बिछाने की अपनी क्षमता को कई बार प्रदर्शित किया है. 

यदि इस रास्ते में एक भी सुरंग फटती है, तो पूरे मार्ग का बीमा खर्च इतना बढ़ जाता है कि व्यापारिक जहाज यहां आने से कतराने लगते हैं. इसके साथ ही, हाल के दिनों में जीपीएस और नेविगेशन सिस्टम में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की घटनाओं ने जहाजों के सुरक्षित पारगमन को एक बड़ी चुनौती बना दिया है. 

यूरोपीय देशों के कदम पीछे खींचने की असली वजह

यूरोपीय देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर बहुत अधिक निर्भर हैं, अब यहां सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बच रहे हैं. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण 'आर्थिक लागत और जोखिम' का संतुलन है. यूरोपीय देशों को डर है कि यदि वे अमेरिका या इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनते हैं, तो उनके वाणिज्यिक जहाजों को सीधे तौर पर निशाना बनाया जाएगा. 

इतिहास गवाह है कि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय टैंकरों को जब्त किया है. यूरोपीय देशों के लिए अपने जहाजों को हर वक्त सैन्य एस्कॉर्ट देना न केवल महंगा है, बल्कि यह युद्ध को सीधे न्योता देने जैसा है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव और ऊर्जा संकट

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का लगभग 20-25 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी गुजरता है. यूरोपीय देशों के पीछे हटने की एक मुख्य वजह यह भी है कि वे नहीं चाहते कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की नाकाबंदी या संघर्ष हो. यदि यहां तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें रातों-रात इतनी बढ़ सकती हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाएगी. 

यूरोप पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, ऐसे में वे ईरान को उकसाकर एक नया मोर्चा खोलने का जोखिम नहीं उठा सकते. यही कारण है कि वे सैन्य भागीदारी के बजाय कूटनीतिक रास्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं और अपनी नौसेनाओं को इस हॉट जोन से दूर रख रहे हैं.

यह भी पढ़ें: कुर्द मुसलमान शिया होते हैं या सुन्नी, ईरान में जंग के बीच जान लीजिए जवाब?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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