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ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीकों से छुटकारा पाएगी भारतीय सेना, बीटिंग रिट्रीट से लेकर रेजीमेंट सिस्टम तक सब बदलेगा

भारतीय वायु सेना के बाद अब थल सेना भी ब्रिटिश-युग की प्रथाओं की समीक्षा करने जा रही है. इस समीक्षा के बाद सेना के उन परंपराओं को बदलने पर विचार किया जाएगा जिनकी जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी है.

सितंबर के शुरुआत में भारतीय नौसेना ने ब्रिटिश युग की पहचान छोड़कर अपने झंडे से सेंट जॉर्ज क्रॉस के निशान को बदल दिया था. अब इसके कुछ दिन बाद थल सेना ने भी गुलामी की अंतिम मानसिकता के प्रतीक से छुटकारा पाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. 

दरअसल भारतीय सेना के बाद अब थल सेना भी ब्रिटिश-युग की प्रथाओं की समीक्षा करने जा रही है. इस समीक्षा के बाद सेना के उन रीति-रिवाजों और परंपराओं को बदलने पर विचार किया जाएगा जिनकी जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी है. इनमें वर्दी और पहनावे के नियम कानून, इकाई स्थापना, औपनिवेशिक अतीत के संस्थान, इकाइयों के अंग्रेजी नाम, इमारत, प्रतिष्ठान, सड़कों, पार्कों, संस्था का नाम बदलना आदि शामिल है. 


ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीकों से छुटकारा पाएगी भारतीय सेना, बीटिंग रिट्रीट से लेकर रेजीमेंट सिस्टम तक सब बदलेगा

आसान भाषा में ऐसे समझे कि आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत ने देश के कई कानून और प्रथाओं को अपने मुताबिक बदल दिया था. सड़कें, पुरानी धरोहरें, रेलवे स्टेशन तक के नाम अंग्रेजों ने अपने हिसाब से ही रखा था.  आजादी मिलने के साथ ही इन प्रथाओं, रीति रिवाजों को खत्म किया जाने लगा. सेना में बहुत सारे ऐसे कानून और नियम हैं जो ब्रिटिश काल से चले आ रहे हैं. कई इमारतें ऐसी हैं जिनको उन्हीं के नाम से जाना जाता है. ऐसे में अब सेना रिव्यू करेगी और जरूरत पड़ने पर इन नामों को बदला भी जाएगा.

फिलहाल नौसेना का नया ध्वज बदला जा चुका है. नया ध्वज औपनिवेशिक अतीत से दूर है. नौसेना के नए झंडे में अब रेड क्रॉस को हटाकर ऊपर बाईं ओर तिरंगा बना दिया गया है और दाहिनी ओर नीले रंग के बैकग्राउंड वाले एक अष्टकोण में सुनहरे रंग का अशोक चिह्न बना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल गुजरात के केवड़िया में संयुक्त कमांडरों के सम्मेलन में सशस्त्र बलों के सिद्धांतों, प्रक्रियाओं, रीति-रिवाजों और सैन्य उपकरणों में स्वदेशीकरण को बढ़ाने की बात कही थी. जिसके बाद से ही इस योजना को रफ्तार मिली. रक्षा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ब्रिटिश युग के निशान को खत्म करने की योजना नई नहीं है. इस बारे में दो साल से ज्यादा समय से चर्चा चल रही है. 


ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीकों से छुटकारा पाएगी भारतीय सेना, बीटिंग रिट्रीट से लेकर रेजीमेंट सिस्टम तक सब बदलेगा

सेना जिन नामों और जगहों को बदलने पर विचार कर रही है उसमें वो जगह शामिल है जिसका नाम ब्रिटिश हुकूमत ने दिए हैं. इस सूची में कई रेजीमेंटस, थियेटर, कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन शामिल है.  इसके साथ ही मानद कमीशनिंग, बीटिंग रिट्रीट और रेजीमेंट सिस्टम भी शामिल हैं.

सैन्य अधिकारियों ने क्या है

AbP न्यूज से बात करते हुए कुछ अधिकारियों ने केंद्र के इस कदम का समर्थन किया तो कुछ अधिकारियों का मानना था कि नाम को ज्यों का त्यों ही रहने देना चाहिए.

असम राइफल के एक अधिकारी ने नाम का जिक्र न करने की शर्त पर बात की और कहा, 'सदियों से चली आ रही अंग्रेजी मानसिकता को बदलने का ये फैसला बहुत अच्छा है. हमारे रेजीमेंट के कई नामों से लेकर नियम तक अंग्रेजो की देन है. लेकिन अब इसका स्वदेशीकरण होने के बाद हम गर्व महसूस करेंगे'. 

एक और सैन्य अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि ये फैसला अच्छा है, लेकिन इसे लागू करने से पहले समय लेना चाहिए. हमारे देश में जितनी भी चीजे हैं, जितने भी ध्वज हैं या वैसे नाम जिसे ब्रिटिश हुकुमत के दौरान रखा गया, ये हमारा इतिहास बताते हैं. ये बताता है कि आज हम जहां पहुंचे हैं वहां का रास्ता आसान नहीं था. हमने ब्रिटिश हुकुमत को हराया है. 

वायुसेना के एक रिटायर्ड अधिकारी ने कहा कि भारतीय नौसेना के झंडे से सेंट जॉर्ज क्रॉस के निशान को बदलकर अशोक चक्र लगाना बड़ा कदम है. ये सम्मान की बात है कि सरकार औपनिवेशिक अतीत को पीछे छोड़ एक नया वर्तमान बनाने की कोशिश कर रही है. जिसमें ध्वज से लेकर रेजिमेंट तक, हर जगह हमारे देश का प्रतीक होगा. 

वायुसेना के एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि सेना आजादी के 75 साल बाद पूरी तरह बदल गई है. हमने औपनिवेशिक युग के अधिकांश रीति-रिवाजों और परंपराओं को छोड़ दिया है. भारतीय सशस्त्र बलों की ‘भारतीयकरण प्रक्रिया’के हिस्से के रूप में कम समय सीमा में एक साथ बहुत सारे बदलाव किए जा रहे हैं, यह एक अच्छा विचार नहीं हो सकता है.’ उनका कहने का मतलब ये है कि ये फैसले जल्दबाजी में लिए जा रहे हैं. इनको लागू करने से पहले थोड़ा सोचना भी चाहिए.

वहीं नेवी के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र का ये कदम सराहनीय है. देश को आजाद हुए 75 साल हो गए हैं. लेकिन आज भी हम अंग्रेजों के नियमों के हिसाब से कपड़े पहनते हैं. केंद्र सरकार को एक पहल ये करना चाहिए कि नाम के साथ हर चीज स्वदेशी हो. फिर चाहे वो बुने हुए कपड़े की वर्दी हो या स्वदेशी हथियार. हम प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के पहल की भी सराहना करते हैं. हमारे देश को विकसित होने के लिए आत्मनिर्भर होने की सबसे ज्यादा जरूरत है. 

पहले भी हो चुके हैं बदलाव 

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब नौसेना में बदलाव किया गया हो. इससे पहले साल 2001 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के समय भी नौसेना के ध्वज को बदला गया था. उस वक्त सफेद झंडे के बीच में जॉर्ज क्रॉस को हटाकर नौसेना का एंकर और ऊपरी बाएं कोने पर तिरंगे को रखा गया था. इसके बाद साल 2004 में एक बार फिर इसी ध्वज में बदलाव किए गए और जॉर्ज क्रॉस को वापस शामिल कर लिया गया. 

2004 में बदलाव के पीछ ये कारण बताया जा रहा था कि नीले रंग के के कारण निशान स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा था.  नए बदलाव में लाल जॉर्ज क्रॉस के बीच में अब राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ को शामिल किया गया. इसके बाद 2014 में एक इसी ध्वज पर देवनागरी भाषा में राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते लिखा गया. 

इसके अलावा इसी साल यानी 2022 के जनवरी महीने में बीटिंग रिट्रीट समारोह में 1950 के बाद पहली बार पारंपरिक गीत ‘एबाइड विद मी’ को हटाकर इसे हिंदी देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ से बदल दिया गया था.

 

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