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'अभियोजक नहीं, उत्पीड़क हैं आप', उत्तर प्रदेश सरकार पर क्यों फूटा सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्य ने बार-बार उन्हें अलग-अलग मामलों में फंसाया. जब एक मामले में जमानत मिल जाती है तो उनके खिलाफ दूसरी एफआईआर दर्ज कर दी जाती है ताकि राहत ने मिल सके.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 फरवरी, 2025) को एक मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि आप अभियोजक नहीं उत्पीड़क लग रहे हैं. कोर्ट को इस बात पर नाराजगी थी कि यूपी सरकार ने गैंगस्टर विरोधी एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में चार याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अपने जवाब में उन मामलों को भी शामिल किया, जो या तो खारिज हो गए थे या उन्हें बरी कर दिया गया था.

जस्टिस भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने यूपी सरकार से सवाल किया कि हलफनामे में याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसे मामले क्यों हैं जिन्हें या तो रद्द कर दिया गया या जिनमें उसे बरी कर दिया गया है. पीठ ने कहा, 'आप अपने जवाब में उन मामलों को भी शामिल कर रहे हैं जिन्हें खारिज कर दिया गया है और जिनमें याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया है. यदि यह आपकी कार्यप्रणाली है, तो आप अभियोजक नहीं हैं, बल्कि उत्पीड़क हैं.'

पीठ ने एक आरोपी की याचिका पर राज्य के हलफनामे का हवाला दिया और सवाल किया कि उसके खिलाफ ऐसे मामले क्यों हैं जिन्हें या तो रद्द कर दिया गया या जिनमें उसे बरी कर दिया गया है. उत्तर प्रदेश गुंडागर्दी और असामाजिक क्रियाकलाप (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के चार आरोपियों को जमानत देते हुए राज्य सरकार से पीठ ने पूछा, 'यदि वह (याचिकाकर्ता) पहले से ही कुछ मामलों में जमानत पर रिहा है, यदि कुछ कार्यवाही रद्द कर दी गई है, यदि कुछ कार्यवाही में उसे बरी कर दिया गया है... तो क्या आपके लिए इस अदालत के समक्ष तथ्यात्मक स्थिति रखना आवश्यक नहीं था?'

आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि याचिकाकर्ता भाई हैं और 2017 के बाद दर्ज मामलों में उन्हें फंसाया गया है, क्योंकि उनके पिता एक राजनीतिक दल से संबंधित एमएलसी थे. उन्होंने कहा कि उन्हें बार-बार अलग-अलग मामलों में फंसाया गया. जब याचिकाकर्ताओं को एक मामले में जमानत मिल जाती है तो उनके खिलाफ दूसरी एफआईआर दर्ज कर दी जाती है ताकि उन्हें राहत ने मिल सके.

एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने राज्य के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि एक याचिकाकर्ता के खिलाफ 28 प्राथमिकी जबकि बाकी के खिलाफ 15 प्राथमिकी दर्ज हैं. उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में राज्य ने आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर जमानत का विरोध किया. हालांकि, याचिकाकर्ताओं को या तो बरी कर दिया गया या जमानत पर रिहा कर दिया गया और कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उनमें से कुछ के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी.

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने जमानत याचिकाओं का विरोध किया और कहा कि दर्ज मामलों में से एक सामूहिक बलात्कार का मामला है. अदालत ने कहा कि बलात्कार के मामले में तो सहारनपुर की एक निचली अदालत ने जुलाई 2022 में जमानत दे दी थी, लेकिन राज्य ने ढाई साल बाद भी इसे रद्द करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. राज्य सरकार के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पिता देश छोड़कर भाग गए हैं और वे भी भाग सकते हैं.

वकील की इस दलील पर एडवोकेट सिद्धार्त लूथरा ने कहा कि उनके पासपोर्ट पहले ही जब्त कर लिए गए हैं. पीठ ने कहा, 'हम मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश के पास पासपोर्ट जमा करने का निर्देश देते हैं ताकि राज्य की आशंका को ध्यान में रखा जा सके.' कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को मुकदमे की सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहने और इसके शीघ्र निपटारे में सहयोग करने का भी निर्देश दिया. याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अप्रैल, 2022 में सहारनपुर जिले में दर्ज किया गया मामला अवैध खनन और सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे से जुड़ा है.

 

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