EXPLAINED: मेहली मिस्त्री टाटा ट्रस्ट से बाहर, रतन के सौतेले भाई नोएल से क्यों उलझे थे, क्या है पूरी राजनीति?
ABP Explainer: मेहली टाटा संस लिस्टिंग के खिलाफ हैं. वहीं, नोएल टाटा कंपनी में नई सोच लाना चाहते हैं. लेकिन मेहली रतन टाटा की लेगेसी फॉलो करते हैं.

1868 में जमशेदजी टाटा ने भारत के सबसे बड़े और पुराने बिजनेस ग्रुप 'टाटा' की शुरुआत की थी. आज यह 180 बिलियन डॉलर यानी 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का साम्राज्य है, जिसमें 30 से ज्यादा कंपनियां हैं. टाटा के बारे में कहा जाता है कि इसका कोई भी शेयर उठा लो, फायदा ही देकर जाएगा. लेकिन इस कंपनी से सबसे बड़ा नुकसान हुआ है रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्त्री का. रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा ने मिस्त्री को टाटा ट्रस्ट से बाहर कर दिया. अब फिर एक बार टाटा बनाम मिस्त्री की चर्चा तेज हो गई है.
तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि टाटा और मिस्त्री की तकरार का किस्सा क्या, क्यों मिस्त्री से ट्रस्टी का ओहदा छीन लिया और कितना जरूरी है टाटा ट्रस्ट में बने रहना...
सवाल 1- टाटा ग्रुप क्या है और टाटा ट्रस्ट का इसमें क्या रोल है?
जवाब- 1868 में जमशेदजी टाटा ने टाटा ग्रुप की स्थापना की थी. यह भारत की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी है. इसकी 30 कंपनियां दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में कारोबार करती हैं. 2024-25 में टाटा ग्रुप की सभी कंपनियों का टोटल रेवेन्यू 15.34 लाख करोड़ रुपए था. यह 11.5 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देती है. इसके प्रोडक्ट्स सुबह से शाम तक हमारी जिंदगी में शामिल है. कंपनी चाय पत्ती से लेकर घड़ी, कार और हवाई जहाज तक बनाती है.
टाटा ग्रुप में टाटा ट्रस्ट की 66% हिस्सेदारी, मिस्त्री परिवार की 18.4%, टाटा ग्रुप कंपनी की 13% और अन्य की 2.6% हिस्सेदारी है. टाटा ट्रस्ट्स में कुल 15 संस्थाएं हैं, लेकिन दो सबसे बड़े और ताकतवर हैं– सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT). SDTT 1932 में बना था (दोराबजी टाटा की याद में) और इसमें टाटा संस का 23.56% हिस्सा है. SRTT 1919 में बना था (रतन टाटा के पिता की याद में) और इसमें टाटा संस का 27.98% हिस्सा है. कुल मिलाकर ये दोनों ट्रस्ट्स 51% से ज्यादा हिस्सा रखते हैं.
- सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT)
- चेयरमैन: नोएल एन. टाटा (रतन टाटा के सौतेले भाई, ट्रेंट और टाटा इनवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन के चेयरमैन)
- वाइस-चेयरमैन: वेणु श्रीनिवासन (TVS मोटर कंपनी के चेयरमैन एमेरिटस, टाटा संस बोर्ड मेंबर)
- ट्रस्टी: विजय सिंह (पूर्व डिफेंस सेक्रेटरी, टाटा ट्रस्ट्स के वाइस-चेयरमैन)
- ट्रस्टी: दारीउस खंबाता (पूर्व महाराष्ट्र अटॉर्नी जनरल, वकील)
- ट्रस्टी: प्रमित झावेरी (पूर्व सीआईएसआई इंडिया सीईओ, इनवेस्टमेंट बैंकर)
- सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT)
- चेयरमैन: नोएल एन. टाटा
- वाइस-चेयरमैन: विजय सिंह
- ट्रस्टी: वेणु श्रीनिवासन
- ट्रस्टी: जिमी टाटा (रतन टाटा के छोटे भाई)
- ट्रस्टी: जहांगीर एच.सी. जहांगीर (वकील, टाटा ग्रुप से जुड़े)
- ट्रस्टी: बिजमैन जहांगीर (टाटा ग्रुप से जुड़े, जहांगीर एच.सी. के रिश्तेदार)
इनके बोर्ड मेंबर (ट्रस्टी) सबसे ताकतवर हैं क्योंकि वे तय करते हैं कि टाटा संस का चेयरमैन कौन बनेगा, कौन सी कंपनी बेची या खरीदी जाएगी, कितना पैसा दान में जाएगा और ग्रुप की पूरी दिशा क्या होगी. टाटा संस टाटा कंपनियों की प्रिंसिपल इन्वेस्टमेंट होल्डिंग और प्रमोटर है. टाटा संस की 66% इक्विटी शेयर कैपिटल टाटा के चैरिटेबल ट्रस्ट के पास है, जो एजुकेशन, हेल्थ, आर्ट एंड कल्चर और लाइवलीहुड जनरेशन के लिए काम करता है. वहीं, टाटा की सारी कंपनियां टाटा संस के तहत काम करती हैं.
- अक्सर लोग टाटा संस और टाटा ग्रुप को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. दोनों अलग-अलग हैं. टाटा संस, टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है. टाटा ग्रुप के बारे में कहा जाता है कि वो सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाता है. टाटा ग्रुप में 100 से ज्यादा कंपनियां हैं, जिनका सारा कंट्रोल टाटा संस के पास ही है. ग्रुप की सभी प्रमुख कंपनियों में टाटा संस की हिस्सेदारी 25 से लेकर 73% तक है. सबसे ज्यादा 73% हिस्सेदारी टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन में है.
- 1887 में जमशेतजी टाटा ने टाटा एंड संस की स्थापना की थी. 1904 में उनके निधन के बाद उनके बेटे सर दोराब, सर रतन और चचेरे भाई जेआरडी टाटा कंपनी को मर्ज कर टाटा संस बनाई. 1919 में सर रतन टाटा का निधन हो गया. टाटा संस में उनकी 40% हिस्सेदारी सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के पास चली गई.
- 1932 में सर दोराब टाटा का निधन हो गया और उनकी भी 40% हिस्सेदारी सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के पास आ गई. इस तरह टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की हिस्सेदारी 80% हो गई.
- 1991 में रतन टाटा को टाटा संस का चेयरमैन अपॉइंट किया गया. 1996 में टाटा संस में ट्रस्ट की हिस्सेदारी घटकर 66% रह गई.
आप यह भी मान सकते हैं कि टाटा ट्रस्ट ही टाटा संस को कंट्रोल करती है और टाटा संस ही टाटा की सभी कंपनियों की होल्डिंग है. यानी इसका चेयरमैन होना कोई आम बात नहीं.
सवाल 2- मेहली मिस्त्री कौन हैं और उनका टाटा ग्रुप से क्या कनेक्शन था?
जवाब- मेहली मिस्त्री 65 साल के लो-प्रोफाइल इंडस्ट्रियलिस्ट हैं. वे एम पलोनजी ग्रुप के हेड हैं, जिसका रेवेन्यू करीब 900 करोड़ रुपए है. वे साइरस मिस्त्री के फर्स्ट कजिन है. लेकिन 2016 के रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के विवाद में मेहली ने रतन टाटा का साथ दिया था. उन्होंने सॉलिडैरिटी दिखाने के लिए 200 करोड़ रुपए के टाटा पावर शेयर्स खरीदे थे.
मेहली 10 साल की उम्र से रतन के दोस्त थे. वे रतन की पर्सनल इन्वेस्टमेंट फर्म RNT एसोसिएट्स के डायरेक्टर थे. 2024 में रतन की विल में मेहली को एग्जीक्यूटर बनाया गया और उन्हें अलीबाग की प्रॉपर्टी और 3 एंशेंट फायरआर्म्स (टाटा फैमिली के हेयरलूम) दिए. 2022 में रतन टाटा ने उन्हें SDTT और SRTT का ट्रस्टी बनाया था.
सवाल 3- रतन टाटा की मौत के बाद टाटा ट्रस्ट्स में क्या बदलाव हुए और नोएल टाटा का रोल क्या?
जवाब- 9 अक्टूबर 2024 को रतन टाटा का निधन हुआ और 11 अक्टूबर को मुंबई में जॉइंट मीटिंग में नोएल नेवल टाटा को टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाया गया. नोएल 40 साल से टाटा ग्रुप में हैं.
17 अक्टूबर को बोर्ड मीटिंग में एकमत रिजॉल्यूशन पास हुआ. इसमें तय किया गया कि ट्रस्टी का टेन्योर खत्म होने पर रीअपॉइंटमेंट सबकी सहमति से बिना लिमिट के होगी, मतलब लाइफटाइम ट्रस्टीशिप. यह एग्जीक्यूटिव कमेटी (नोएल टाटा, मेहली मिस्त्री, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह) ने पास किया. रिजॉल्यूशन में कहा, 'कोई ट्रस्टी इन प्रिंसिपल्स के खिलाफ वोट करेगा तो ब्रेक ऑफ कमिटमेंट होगा.' यह रतन टाटा की मौत के बाद स्टेबिलिटी के लिए था.
सवाल 4- टाटा ट्रस्ट्स में वोटिंग की परंपरा क्या थी और यह कैसे टूटी?
जवाब- टाटा ट्रस्ट्स की 100 साल से ज्यादा पुरानी परंपरा एकमत से फैसला लेने की थी. रतन टाटा कहते थे कि कंसेंसस और यूनैनिमिटी जरूरी है. वोटिंग कभी नहीं होती थी. SDTT डीड में मेजॉरिटी वोटिंग अलाउड है, लेकिन SRTT में यूनैनिमिटी. 11 सितंबर 2025 को इसके टूटने की शुरुआत हो गई, जब विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड पर रीअपॉइंटमेंट के लिए वोटिंग 4-2 से रिजेक्ट कर दिया. इससे कंपनी का इंटरनल रिफ्ट सामने आया.
सवाल 5- मेहली मिस्त्री को बाहर करने की घटना क्या थी? वोटिंग कैसे हुई? किसने विरोध किया और किसने समर्थन?
जवाब- 28 अक्टूबर को मुंबई में सर्कुलर रिजॉल्यूशन (ई-मेल वोटिंग) से मेहली का 3-ईयर टेन्योर खत्म हो गया. उन्हें 3-2 वोट से रिजेक्ट कर दिया. तीन ट्रस्ट्रीज नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने री-अपॉइंटमेंट के खिलाफ वोट डाला.
तीन और लोग- प्रमीत झावेरी, डेरियस खंबाटा और जहांगीर एचसी जहांगीर- मेहली की दोबारा नियुक्ति के पक्ष में थे, जबकि रतन टाटा के भाई जिमी टाटा ने वोटिंग से किनारा कर लिया. चूंकि ये रेजोल्यूशन खुद मेहली से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.
टाटा ट्रस्ट्स के दो मुख्य चैरिटी आर्म्स- SDTT और SRTT में वोटिंग के अलग-अलग सिस्टम है. ट्रस्ट डीड के मुताबिक, SDTT में साधारण बहुमत काफी है, लेकिन SRTT में सबकी एक राय होनी चाहिए. हालांकि, ट्रस्टीज की नियुक्ति या हटाने के लिए तो हर हाल में सबकी सहमति जरूरी है. इन नियमों के आधार पर मेहली का तीन साल का टेन्योर मंगलवार को खत्म हो गया.
मिस्त्री 2022 से SDTT और SRTT के ट्रस्टी थे. इन दोनों ट्रस्ट्स पास टाटा संस के बोर्ड में एक-तिहाई सदस्यों को नॉमिनेट करने का हक है.
सवाल 6- मेहली मिस्त्री को टारगेट क्यों किया? यह पूरा विवाद क्या है?
जवाब- 5 पॉइंट में समझें टाटा ग्रुप का पूरा विवाद...
- ये पूरा झगड़ा टाटा ट्रस्ट्स की 11 सितंबर को हुई मीटिंग से शुरू हुआ. इसमें टाटा संस के बोर्ड पर पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को नॉमिनी डायरेक्टर के तौर पर दोबारा अपॉइंट करने पर बात होनी थी. लेकिन मीटिंग में सिंह नहीं आए.
- टाटा संस के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा के 9 अक्टूबर 2024 को निधन के बाद ट्रस्ट्स ने फैसला लिया था कि टाटा संस बोर्ड पर नॉमिनी डायरेक्टर्स को 75 साल की उम्र के बाद हर साल दोबारा अपॉइंट करना पड़ेगा. 77 साल के सिंह 2012 से ये रोल निभा रहे थे.
- री-अपॉइंटमेंट का ये रेजोल्यूशन नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने रखा था. लेकिन बाकी चार लोग- मेहली मिस्त्री, प्रामित झावेरी, जहांगीर एचसी जहांगीर और डेरियस खंबाटा ने साफ मना कर दिया. चूंकि ये चारों मेजॉरिटी में थे तो रेजोल्यूशन रद्द हो गया.
- इसके बाद इन ट्रस्टीज ने मेहली मिस्त्री को ही टाटा संस बोर्ड पर नॉमिनी के तौर पर प्रपोज करने की कोशिश की. लेकिन नोएल टाटा और श्रीनिवासन ने रोक दिया. मीटिंग खत्म होते ही सिंह ने टाटा संस बोर्ड से खुद ही इस्तीफा दे दिया.
- मेहली मिस्त्री के नेतृत्व वाले चार ट्रस्टी शापूरजी पलोनजी फैमिली से जुड़े हैं. इस फैमिली की टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी है. पीटीआई के मुताबिक, मेहली ने महत्वपूर्ण फैसलों से बाहर रखे जाने पर नाराजगी जताई है. झगड़े का केंद्र टाटा संस में डायरेक्टरशिप के पद हैं.
दरअसल, मेहली ने टाटा संस बोर्ड मीटिंग्स की इन्फॉर्मेशन शेयरिंग पर सवाल उठाए थे. वे टाटा संस लिस्टिंग के खिलाफ हैं. इसके अलावा नोएल कंपनी में नई सोच लाना चाहते हैं, लेकिन मेहली रतन टाटा की लेगेसी फॉलो करते हैं.
सवाल 7- क्या मेहली मिस्त्री कोर्ट में निष्कासन को चुनौती देंगे?
जवाब- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेहली मिस्त्री लीगल एक्शन लेने की तैयारी कर रहे हैं. वहीं, सूत्रों की मानें तो अब अंदर बहस चल रही है कि क्या मिस्त्री श्रीनिवासन की मंजूरी वापस ले लेंगे या उनकी बहाली को मंजूरी न देने के फैसले को कोर्ट में चुनौती देंगे. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि नोएल टाटा, श्रीनिवासन और सिंह ने इस पर लीगल एडवाइस ली है. लेकिन एक ट्रस्टी ने साफ कहा- शर्त वाली मंजूरी कानूनी तौर पर टिक नहीं सकती. कोई भी रेजोल्यूशन पास होने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सकता. कानूनी रूप से ये सही नहीं है.
सवाल 8- मेहली मिस्त्री के बाहर जाने का असर क्या होगा?
जवाब- मेहली का जाना टाटा संस बोर्ड में नई नॉमिनेशन लाएगा. शायद नोएल कैंप का पलड़ा भारी होगा. ये ट्रस्ट्स की एकता पर सवाल उठाता है. शापूरजी पलॉन्जी ग्रुप यानी SP ग्रुप के साथ पुराना विवाद फिर गरम हो सकता है.
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