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कोरोना वायरस: मुंबई बन रहा है भारत का 'वुहान', तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर मुंबई भारत का वुहान बन रहा है.मुंबई में कोरोना के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं.

मुंबई: जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ रहा है, मुंबई की हालत बद से बदतर होती जा रही है. महाराष्ट्र देश में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है और महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई सबसे ज्यादा प्रभावित शहर. सवाल ये है कि क्या मुंबई चीन के वुहान शहर की राह पर जा रहा है. क्या भारत का वुहान बन रहा है मुंबई?

वुहान और मुंबई में कई समानताएं हैं. जैसे मुंबई भारत के महाराष्ट्र राज्य की राजधानी है, वैसे ही वुहान चीन के हुबई प्रांत की राजधानी है. दोनों ही अपने अपने देशों की सबसे ज्यादा घनी आबादी वाले शहरों में से एक हैं. मुंबई की आबादी पौने दो करोड़ है तो वहीं वुहान की आबादी भी 1 करोड 10 लाख लोगों की है.

मुंबई जहां अरब सागर के तट पर बसा है तो वहीं वुहान चीन की सबसे बड़ी नदियों में से एक यांगजे नदी के तट पर बसा है. मुंबई की तरह ही वुहान भी चीन का एक बड़ा आर्थिक केंद्र है और यातायात के तमाम साधनों से देश-विदेश से जुड़ा हुआ है.

वुहान और मुंबई शहर में हैं समानताएं

इन तमाम समानताओं के साथ एक और भी बड़ी समानता दोनों शहरों में हैं. जिस तरह से मुंबई भारत का सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित शहर बनकर उभरा है, उसी तरह से चीन में भी वुहान से ही सबसे ज्यादा कोरोना पॉजिटिव मरीज आये. चीन से कोरोना वायरस के मरीज वुहान से ही आना शुरू हुए और जल्द ही इस शहर का नाम पूरी दुनिया में चर्चित हो गया. जिस तरह से भारत में सबसे ज्यादा मौतें मुंबई में हुईं उसी तरह से चीन में इस वायरस ने सबसे ज्यादा वुहान में लोगों को मारा.

चीन ने वुहान में कोरोना मरीजों के इलाज के लिये 10 दिनों के भीतर 1000 बेड वाला अस्पताल खड़ा कर दिया. मुंबई में भी ऐसा ही कुछ किया गया है. शहर के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लैक्स में वुहान की तर्ज पर 1000 से ज्याद बेड का अस्पताल 15 दिनों के भीतर तैयार कर लिया गया है. जिस रफ्तार से मुंबई में मरीजों की संख्या बढ़ रही है उसे देखते हुए जल्द ही इसकी जरूरत पड़ सकती है.

 500 बेड उन मरीजों के लिये रहेंगे जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत नहीं

अस्पताल में 500 बेड उन मरीजों के लिये रहेंगे जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत नहीं है और बाकी के बेड उनके लिये होंगे जिन्हें कि ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी. अस्पताल में मरीज का टेस्ट करने के लिये लैब का प्रबंध होगा. डॉक्टर, नर्स और मेडिकल स्टाफ के रहने और ठहरने का इंतजाम भी किया गया है. कई सारे चेंजिंग रूम बनाये गये हैं जहां ये सारे लोग पीपीई किट पहन सकते हैं. अस्पताल में खाने की सप्लाई के लिये पास ही के एक रेस्तरां का किचन लिया गया है.

जिस रफ्तार से ये अस्पताल तैयार हो रहा है वो भी किसी रिकॉर्ड से कम नहीं. मुंबई मेट्रोपॉलिटन कमिश्नर आर.ए. राजीव के मुताबिक सरकार से निर्देश मिलने के बाद 2 मई से युद्धस्तर पर इस अस्पताल के निर्माण का काम शुरू हुआ है और इसे जल्द पूरी तरह से तैयार करके सरकार को सौंप दिया जायेगा. कमिश्नर राजीव के मुताबिक इस अस्पताल को बनाने का निर्णय सरकार ने इसलिये लिया है क्योंकि कोविड मरीजों के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं.

ऐसे में अस्पतालों की क्षमता अगर कम होती है तो इस जैसे अस्पताल काम आयेंगे. पूरा अस्पताल सवा लाख वर्ग फुट के क्षेत्रफल में बनाया गया है. कमिश्नर राजीव के मुताबिक उन्होंने तैयारी कर रखी है कि जरूरत पड़ने पर इसी तरह का एक और अस्पताल बगल के मैदान में भी बनाया जाएं.

सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है धारावी

इस अस्पताल की जरूरत जल्द ही पड़ सकती है क्योंकि मुंबई के कई ऐसे हॉट स्पोट्स हैं जहां लगातार कोरोना मरीजों की संख्या बढ रही है. सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है धारावी. धारावी के हालात नियंत्रण में नहीं आ रहे हैं. यहां कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या हाल ही में एक हजार को पार कर गई है. करीब 50 लोगों की मौत हो चुकी है और धारावी मुंबई का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बना हुआ है. धारावी का ये हाल इसलिये हो रहा है क्योंकि इस झुग्गी बस्ती में आबादी बेहद घनी है. 2 वर्ग किलोमीटर के दायरे में साढ़े 7 लाख लोग रहते हैं.

यहां पर चमड़ा उत्पाद के कारखाने और दूसरे छोटे छोटे उद्योगों से जुड़े मजदूर अपने परिवार के साथ रहते हैं. एक-एक कमरे में 5 से 15 लोग रहते हैं. सार्वजनिक शौचालय और पानी भरने के लिये सार्वजनिक नलों का इस्तेमाल किया जाता है. धारावी में पतली-संकरी गलियां हैं जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो पा रहा. मुंबई महानगरपालिका ने इंडियन मेडिकल एसोशिएसन की मदद से धारावी के लोगों की जांच का एक बड़ा अभियान शुरू किया है.

धारावी जैसी बस्तियों को छोड़कर अपने अपने गृहराज्य की ओर निकले हैं. ये प्रवासी मजदूर हैं जो कि धारावी जैसी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं. भुखमरी के डर से ऐसे तमाम मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर का फासला तय करने के लिये निकल पड़े हैं, लेकिन सड़क पर भी मौत इनका पीछा नहीं छोड़ रही. जो मजदूर मुंबई से उत्तर भारत और पश्चिम बंगाल की तरफ अपने गांवों की ओर जाने निकले हैं उनमें से कई हादसे का शिकार हो रहे हैं. कुछ को गाड़ियों ने कुचल दिया तो कुछ वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गये जिनमें वे भेड़ बकरियों की तरह लद कर आगे बढ़ रहे थे.

मजदूरों को हो रही है परेशानी

14 मई को मुंबई से ओडिशा की ओर मजदूरों को ले जाने वाला ट्रक नासिक हाईवे पर पलट गया. इस घटना में 8 लोग जख्मी हो गये. ड्राइवर का ट्रक पर से नियंत्रण छूट जाने की वजह से हादसा हुआ. ट्रक में सवार मजदूर 2 से 4 हजार रूपये देकर अपने गांव लौट रहे थे. एक दिन पहले 13 मई को ठाणे के कैडबरी जंक्शन पर मजदूरों से भरा एक टैंपो हादसे का शिकार हो गया. इस हादसे में भी 8 मजदूर घायल हो गये. जो लोग पैदल चलकर जा रहे हैं उनकी भी दर्द भरी कहानियां है.

महिलाएं, छोटे छोटे बच्चे पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता नापने निकल पड़ी हैं. इस वक्त मुंबई में औसत तापमान 35 डिग्री सेल्सियस है. ऐसी धूप में भी इन मजदूरों के कदम रूक नहीं रहे. मन में बस यही ख्याल है कि मुंबई में भूखे मरने से अच्छा है कि अपने गांव लौट जायें. लोगों के पैसे खत्म हो चुके हैं. घर का किराया चुकाने की बात तो दूर परिवार के लिये खाना खरीद पाने तक के पैसे कई लोगों के पास नहीं हैं. गुरूवार की शाम को 45 साल के हरिचंद्र भाईंदर से राज्स्थान अपने गांव जाने के लिये निकले. करीब 36 किलोमीटर तक पैदल चलते हुए वे वसई तक पहुंच गये लेकिन अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने दम तोड़ दिया.

सोचिये ये लोग कितने मजबूर रहे होंगे जब इन्होंने इतनी लंबी दूरी के फासलों को पैदल ही नापने का फैसला किया. जाहिर है जब इन्हें मुंबई में अपने जीवित बने रहने का विकल्प नहीं नजर आया तब ही इन्होंने ऐसा फैसला लेनी की हिम्मत की. इस महीने कोरोना ने बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों को अपना निशाना बनाया है और कई पुलिसकर्मी इस बीमारी की भेट चढ़ गये हैं. इस मामले में भी मुंबई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है. शुक्रवार तक महाराष्ट्र में कोरोना प्रभावित पुलिसकर्मियों की संख्या 1061 तक पहुंच गई. राज्य में 12 पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है जिनमें से 8 मुंबई के हैं.

पुलिसकर्मियों पर हो रहा है हमला

पुलिसकर्मी कोरोना से संक्रमित इसलिये हो रहे हैं क्योंकि लॉकडाउन पर अमल करते वक्त कई बार अनजाने में वे संक्रमित शख्स के संपर्क में आ जाते हैं. उन्हें भीड़ भरे इलाके में ड्यूटी करनी होती है. ज्यादातर पुलिसकर्मी अनियमित दिनचर्या की वजह से डाईबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिन्हें कि कोरोना जल्द अपना शिकार बनाता है. पुलिसकर्मियों को कई बार हिंसा का शिकार होना पड़ता है. गुरूवार को मुंबई के एंटोप हिल इलाके में रात के वक्त घूम रहे युवकों को जब पुलिस ने रोका तो धारदार हथियारों से पुलिस टीम पर हमाल कर दिया गया. इस हमले में 3 पुलिसकर्मी घायल हो गये. मुंबई के अलग अलग इलाकों से इस तरह से पुलिस पर हमले की खबरें आ रहीं हैं.

वैसे इस बीच कोरोना की वजह से उपजे हालातों से निपटने के लिये सरकार कई तरह के कदम उठा रही है. पहले प्रवासी मजदूरों को दूसरे राज्यों में ले जाने के लिये ट्रेन मुंबई के बाहर से छोड़ी जा रहीं थीं लेकिन अब सीएसएमटी, एलटीटी और मुंबई सेंट्रल जैसे स्टेशनों से भी छोड़ी जा रही है.

ये सभी मजदूर पहले पुलिस के पास अपना रजिस्ट्रेशन करवाते हैं. उसके बाद पुलिस सिलसिलेवार तरीके से इन्हें स्टेशन ले जाकर ट्रेनों में बिठाती है. गांव वापस लौटने की खुशी में कई प्रवासी मजदूरों ने मुंबई पुलिस की जयजयकार करते हुए नारे भी लगाये.

इन मजदूरों की वापसी को लेकर दो तरह के नजरिये हैं. एक नजरिया है कि इस पलायन से उद्योग धंधों को फिर से शुरू करने में, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में दिक्कत आयेगी. वहीं दूसरी ओर ये माना जा रहा है कि इससे झुग्गी बस्तियों में भीड़ कम होगी. ज्यादातर मजदूर झुग्गी बस्ती में ही रहते हैं. ऐसे में जब बस्तियों से भीड़ कम होगी तो कोरोना का संक्रमण कम होगा और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन हो सकेगा.

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