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करियर-रिश्तों की उलझन में कृष्ण को क्यों खोज रही Gen Z?

Gen Z Psychology: करियर का दबाव, ब्रेकअप, घोस्टिंग और सोशल मीडिया का FOMO, जानिए क्यों Gen Z को भगवद्गीता और श्रीकृष्ण की सीख में अपने सवालों के जवाब मिल रहे हैं.

Gen Z Psychology: एक तरफ करियर बनाने का दबाव. दूसरी तरफ रिश्तों में अनिश्चितता. ऊपर से सोशल मीडिया पर दूसरों की 'परफेक्ट लाइफ'. लगातार स्क्रोल करने के बाद भी मन को जवाब नहीं मिलता, तो कई युवा अब भगवद्गीता की ओर मुड़ रहे हैं.

Gen Z के लिए श्रीकृष्ण केवल मंदिर में पूजे जाने वाले भगवान नहीं हैं. वे ऐसे मार्गदर्शक हैं, जो मुश्किल समय में डर से भागना नहीं, उसका सामना करना सिखाते हैं. शायद यही कारण है कि गीता के श्लोक अब रील्स, पॉडकास्ट और मोटिवेशनल वीडियो में भी खूब दिखाई देते हैं.

मेहनत पूरी की, नतीजा नहीं मिला, अब क्या करें?

कॉलेज में एडमिशन हो, नौकरी का इंटरव्यू या स्टार्टअप की शुरुआत, आज का युवा बहुत जल्दी सफल होने का दबाव महसूस करता है. सोशल मीडिया इस दबाव को और बढ़ा देता है. वहां हर कोई आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है.

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ऐसे समय में गीता का यह श्लोक सबसे अधिक याद आता है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

इसका अर्थ काम छोड़ देना या लक्ष्य को भूल जाना नहीं है. श्रीकृष्ण समझाते हैं कि मनुष्य का अधिकार अपने कर्म और प्रयास पर है, हर परिणाम पर नहीं.

इंटरव्यू की तैयारी करना आपके हाथ में है, लेकिन चयन केवल आपकी मेहनत से तय नहीं होता. व्यवसाय शुरू करना आपका निर्णय है, मगर बाजार की हर स्थिति आपके नियंत्रण में नहीं होती. यह फर्क समझ में आ जाए तो असफलता व्यक्ति की पहचान नहीं बनती. वह केवल अगली तैयारी का संकेत रह जाती है.

घोस्टिंग और ब्रेकअप के दौर में 'अनासक्ति' क्यों जरूरी?

डेटिंग ऐप्स ने नए लोगों से मिलना आसान किया है, लेकिन रिश्तों को स्थिर नहीं बनाया. अचानक जवाब मिलना बंद हो जाना, बिना कारण रिश्ता टूट जाना और लगातार किसी की स्वीकृति चाहना युवाओं को भीतर से थका सकता है.

ऐसे में श्रीकृष्ण की 'अनासक्ति' की सीख उपयोगी लगती है. हालांकि अनासक्ति का अर्थ भावनाहीन होना या किसी की परवाह न करना नहीं है. इसका मतलब है, किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी खुशी और आत्मसम्मान का एकमात्र आधार न बना देना.

यह सीख तीन बातें समझाती है

  • किसी के स्वीकार या अस्वीकार करने से आपका मूल्य तय नहीं होता.
  • प्रेम में सम्मान और स्वतंत्रता होनी चाहिए, केवल अधिकार नहीं.
  • रिश्ता बचाने के लिए अपनी पहचान और मानसिक शांति खो देना प्रेम नहीं है.

श्रीकृष्ण का संदेश रिश्ते छोड़ने का बहाना नहीं देता. वह रिश्तों में रहते हुए अपने विवेक को बचाए रखने की बात करता है.

सोशल मीडिया पर सब खुश दिखते हैं, फिर बेचैनी क्यों?

किसी की विदेश यात्रा, किसी का नया पैकेज और किसी की खूबसूरत रिलेशनशिप, फोन की स्क्रीन पर हर जीवन अपने जीवन से बेहतर दिखाई दे सकता है. यहीं से तुलना और FOMO शुरू होता है.

भगवद्गीता मन को चंचल मानती है. अर्जुन भी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मन को रोकना हवा को रोकने जितना कठिन लगता है. जवाब में श्रीकृष्ण 'अभ्यास' और 'वैराग्य' का रास्ता बताते हैं.

आज की जिंदगी में इसका सीधा अर्थ हो सकता है, स्क्रीन टाइम तय करना, बार-बार फोन देखने की आदत रोकना और हर विचार को सच न मानना. डिजिटल डिटॉक्स नया शब्द है, लेकिन मन को अभ्यास से साधने की बात गीता हजारों वर्ष पहले कह चुकी है.

अर्जुन में युवाओं को अपना चेहरा क्यों दिखाई देता है?

कुरुक्षेत्र में अर्जुन कमजोर योद्धा नहीं थे. फिर भी निर्णायक समय पर उनका मन डगमगा गया. अपने लोगों को सामने देखकर वे भ्रम, डर और अपराधबोध से घिर गए. उन्होंने धनुष रख दिया और युद्ध से पीछे हटने की बात कही.

यह स्थिति आज के उस युवा से बहुत अलग नहीं है, जिसके सामने कई रास्ते हैं, लेकिन फैसला कोई नहीं हो रहा. नौकरी छोड़ें या नहीं? रिश्ता बचाएं या आगे बढ़ें? परिवार की सुनें या अपनी पसंद चुनें?

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश देकर चुप नहीं कराया. उन्होंने उसके सवाल सुने, अलग-अलग दृष्टिकोण समझाए और अंत में निर्णय उसी पर छोड़ दिया. गीता के अंतिम हिस्से में कृष्ण कहते हैं कि सब बातों पर विचार करने के बाद जो उचित लगे, वह करो.

यही बात सवाल पूछने वाली नई पीढ़ी को सबसे अधिक प्रभावित करती है. यहां अंधी स्वीकृति नहीं, सोचने और समझने की जगह मिलती है.

गीता जवाब देती है या सही सवाल पूछना सिखाती है?

भगवद्गीता नौकरी दिलाने, ब्रेकअप रोकने या रातोंरात चिंता समाप्त करने का दावा नहीं करती. वह इससे अधिक व्यावहारिक काम करती है. वह बताती है कि किन बातों पर हमारा नियंत्रण है और किन पर नहीं.

शायद इसीलिए करियर, रिश्तों और पहचान की उलझनों से घिरी Gen Z को श्रीकृष्ण की सीख अपने समय के करीब दिखाई दे रही है. दुनिया बदल गई है, समस्याओं के नाम बदल गए हैं, लेकिन अर्जुन जैसा भ्रम आज भी मौजूद है.

और जब मन अपना 'कुरुक्षेत्र' बना ले, तब श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी सीख यही है, भागिए मत, पहले स्थिति को समझिए और फिर पूरी जिम्मेदारी से अपना निर्णय लीजिए.

बताया है जिसे केवल अभ्यास (प्रैक्टिस) और वैराग्य से ही साधा जा सकता है. डिजिटल डिटॉक्स और माइंडफुलनेस को आज की पीढ़ी इसी नजरिए से अपना रही है ताकि तुलना करने की आदत बंद हो सके.

महाभारत का अर्जुन: हर युवा का अक्स

कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा अर्जुन असल में आज के कंफ्यूज युवा जैसा ही था, हाथ कांप रहे थे, निर्णय लेने में डर लग रहा था और वह मैदान छोड़कर भागना चाहता था. श्रीकृष्ण ने उसे कोई जादुई समाधान नहीं दिया, बल्कि उसकी सोच को सही दिशा दी और फैसला खुद लेने दिया. यही व्यावहारिक रवैया आज के तार्किक और सवाल पूछने वाले युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है.

प्राचीन ग्रंथ अब किसी बंद अलमारी की चीज नहीं रहे; वे आज के युवाओं के लिए एक मॉडर्न 'सेल्फ-हेल्प गाइड' बन चुके हैं जो हर मोड़ पर काम आती है.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

हर्षिका मिश्रा । धर्म और ज्योतिष पत्रकार

हर्षिका मिश्रा ABP Live में धर्म और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. उन्हें ज्योतिष के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है. पिछले एक वर्ष से वे धर्म और ज्योतिष की डिजिटल कवरेज पर काम कर रही हैं. उनके लेखन के प्रमुख विषय ग्रह गोचर, राशिफल, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं हैं.

उन्होंने नई दिल्ली स्थित AIMC से टेलीविजन और रेडियो प्रोडक्शन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उनकी पढ़ाई में स्क्रिप्ट लेखन और वीडियो प्रोडक्शन शामिल रहे हैं. वे लेख और वीडियो स्क्रिप्ट के जरिए धर्म व ज्योतिष से जुड़े सवालों को सरल भाषा में समझाती हैं.

वैदिक ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु और शकुन शास्त्र उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. वे नई पीढ़ी के पाठकों के लिए करियर, पढ़ाई और रिश्तों से जुड़े प्रश्नों पर भी लिखती हैं. उनका ध्यान ज्योतिषीय शब्दों का अर्थ और किसी व्याख्या का आधार स्पष्ट करने पर रहता है.

उनका मानना है कि ज्योतिष से जुड़ी जानकारी डर पैदा करने के बजाय सोचने और अपनी परिस्थितियों को समझने में मदद करनी चाहिए. वे ज्योतिषीय आकलनों को संभावित संकेतों के रूप में देखती हैं और व्यक्तिगत प्रयास व जिम्मेदारी को महत्व देती हैं.

श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म सिद्धांत उनकी सोच को प्रभावित करता है. पत्रकारिता और ज्योतिष के अलावा उन्हें संगीत, साहित्य और यात्राओं में रुचि है.

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