Dementia Early Signs: नाम भूलना सामान्य पर चेहरा भूलना बड़ी बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट ने दी बड़ी चेतावनी
Neurocognitive Disorders: पहली नजर में यह दोनों सामान्य भूलने की आदत लग सकती हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि हमारे दिमाग में इन दोनों के लिए अलग-अलग सिस्टम काम करते हैं.

Difference Between Forgetting Names And Forgetting Faces: क्या किसी का नाम भूल जाना और उसका चेहरा भूल जाना एक ही बात है? पहली नजर में यह दोनों सामान्य भूलने की आदत लग सकती हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि हमारे दिमाग में इन दोनों के लिए अलग-अलग सिस्टम काम करते हैं. यही वजह है कि किसी परिचित व्यक्ति का चेहरा पहचान लेने के बावजूद उसका नाम याद न आना आम बात है, जबकि किसी करीबी का चेहरा ही न पहचान पाना कहीं अधिक गंभीर संकेत माना जाता है.
क्यों भूल जाता है इंसान?
कल्पना कीजिए कि आप किसी समारोह में पहुंचे और सामने खड़े व्यक्ति को देखते ही पहचान गए, लेकिन उसका नाम याद नहीं आया. ऐसा अक्सर कई लोगों के साथ होता है. दरअसल, नाम याद रखना और उसे सही समय पर दिमाग से निकाल पाना भाषा और याद से जुड़े नेटवर्क पर निर्भर करता है. वहीं चेहरों की पहचान करने का काम दिमाग के स्पेशल विजुअल रिकग्निशन नेटवर्क की तरफ किया जाता है. एपोक एल्डर केयर की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और को- फाउंडर, डिमेंशिया विशेषज्ञ एवं क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नेहा सिन्हा के अनुसार "किसी का नाम भूलना और किसी का चेहरा भूलना देखने में समान लग सकता है, लेकिन इनके पीछे काम करने वाले ब्रेन मार्ग पूरी तरह अलग होते हैं. यह पहचान और स्मरण के बीच का अंतर है."
क्या नाम भूल जाना सामान्य होता है?
एक्सपर्ट का कहना है कि नाम केवल एक शब्द या पहचान का लेबल होता है, जिसका अक्सर किसी सीन छवि से सीधा संबंध नहीं होता. इसलिए तनाव, थकान, व्यस्तता या एक साथ कई लोगों से मिलने जैसी परिस्थितियों में नाम भूल जाना सामान्य माना जाता है. नेहा सिन्हा बताती हैं कि तेज रफ्तार सामाजिक माहौल में किसी का नाम भूल जाना पूरी तरह सामान्य बात है और अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के साथ ऐसा कभी न कभी होता है.
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क्या इससे कोई दिक्कत होती है?
हालांकि, चेहरों को पहचानने की क्षमता ह्यूमन इवोल्यूशन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इंसान हजारों वर्षों से अपने परिवार, दोस्तों और संभावित खतरों की पहचान चेहरे के आधार पर करता आया है. यही कारण है कि ब्रेन में चेहरे पहचानने के लिए विशेष नेटवर्क मौजूद होते हैं. रिसर्च बताते हैं कि इन नेटवर्क्स में किसी प्रकार की गड़बड़ी या गिरावट होने पर प्रोसोपैग्नोसिया यानी फेस ब्लाइंडनेस जैसी स्थिति विकसित हो सकती है. कुछ मामलों में इसका संबंध अल्जाइमर रोग, फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी देखा गया है. बार-बार होने वाली स्मृति संबंधी समस्याएं न्यूरोकॉग्निटिव गिरावट का शुरुआती संकेत हो सकती हैं. खासकर अल्जाइमर और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया जैसी स्थितियों में कई बार चेहरे पहचानने की क्षमता प्रभावित होना अन्य लक्षणों से पहले भी दिखाई दे सकता है. इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य, जीवनसाथी या बेहद करीबी लोगों को पहचानने में कठिनाई महसूस करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
कब एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी?
असल अंतर यही है कि कभी-कभार किसी का नाम भूल जाना उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिचित चेहरों को पहचानने में लगातार कठिनाई होना गंभीर चेतावनी संकेत साबित हो सकता है. इसलिए हर छोटी भूल पर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन यदि स्मृति संबंधी बदलाव बार-बार होने लगें, बढ़ते जाएं या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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