Cyclospora Infection: तेजी से फैल रही यह खतरनाक बीमारी, दिन में 30 बार जाना पड़ रहा टॉयलेट, दवाएं फेल
Cyclospora Outbreak In US: साइक्लोस्पोरा नाम के एक सूक्ष्म परजीवी का इंफेक्शन तेजी से फैल रहा है. हालात ऐसे हैं कि इंफेक्टेड एक महिला को दिन में करीब 30 बार टॉयलेट जाना पड़ा.

Cyclospora Symptoms And Treatment Guide: अमेरिका में इन दिनों साइक्लोस्पोरा नाम के एक सूक्ष्म परजीवी का इंफेक्शन तेजी से फैल रहा है. हालात ऐसे हैं कि इंफेक्टेड एक महिला को दिन में करीब 30 बार टॉयलेट जाना पड़ा. लगातार पानी जैसे दस्त, डिहाइड्रेशन और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आने के बाद इस इंफेक्शन ने हेल्थ एक्सपर्ट की चिंता बढ़ा दी है. इस साल अमेरिका में साइक्लोस्पोरा के मामले 2019 के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ चुके हैं.
कितनी खतरनाक है यह बीमारी?
हेपेटोलॉजिस्ट, क्लीनिकल साइंटिस्ट और पब्लिक हेल्थ रिसर्चर डॉ. साइरिएक एबी फिलिप्स के अनुसार, साइक्लोस्पोरा इंफेक्शन को अक्सर सामान्य फूड पॉइजनिंग या वायरल गैस्ट्रोएंटेराइटिस समझ लिया जाता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह बीमारी कुछ दिनों में खत्म नहीं होती. जहां सामान्य फूड पॉइजनिंग 1 से 3 दिन और वायरल संक्रमण 2 से 3 दिन में ठीक हो जाता है, वहीं साइक्लोस्पोरा कई हफ्तों तक परेशान कर सकता है और मरीज ठीक होने के बाद दोबारा भी बीमार पड़ सकता है.
क्या होते हैं इसके लक्षण?
डॉ. फिलिप्स बताते हैं कि यह एक प्रोटोजोआ है, यानी एक सेल्स वाला सूक्ष्म जीव, जो शरीर के अंदर बढ़ता रहता है. इसके लक्षणों में तेज पानी जैसे दस्त, भूख कम लगना, तेजी से वजन घटना, पेट में दर्द और सूजन, गैस बनना तथा लंबे समय तक रहने वाली थकान शामिल हैं. हालांकि उल्टी इस बीमारी का प्रमुख लक्षण नहीं होती और मल में न तो खून आता है और न ही पस.
कैसे होता है इसका इलाज?
इलाज के मामले में भी यह इंफेक्शन अलग है. सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं जैसे मेट्रोनिडाजोल, एजिथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लॉक्सासिन और नॉरफ्लॉक्सासिन अक्सर असर नहीं करतीं। वहीं को-ट्रिमोक्साजोल दवा देने पर मरीजों में तेजी से सुधार देखा जाता है. यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से ज्यादा समय तक बिना खून वाले पानी जैसे दस्त बने रहें तो डॉक्टर साइक्लोस्पोरा की जांच कराने की सलाह देते हैं. इसकी पहचान सामान्य स्टूल टेस्ट से नहीं होती, बल्कि इसके लिए विशेष जांच करानी पड़ती है.
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सबसे पहले कब हुई थी इसकी पहचान?
साइक्लोस्पोरा कायेटानेन्सिस की पहचान इंसानों में पहली बार 1979 में हुई थी और 1994 में इसे आधिकारिक नाम मिला. 2023 में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की रिसर्च में सामने आया कि इसके कम से कम तीन अलग-अलग प्रकार इंसानों में इंफेक्शन फैला सकते हैं. यह परजीवी छोटी आंत की परत में छिपकर बढ़ता है, जिससे शरीर पोषक तत्व ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता और दस्त रुकने के बाद भी कमजोरी व वजन कम होने की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है.
भारत में क्या है स्थिति?
भारत में इस इंफेक्शन के मामलों पर ज्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है. हालांकि आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉलरा एंड एंटेरिक डिजीज, कोलकाता की 2025 की स्टडी में पूर्वी भारत के करीब 2 प्रतिशत डायरिया मरीजों में यह इंफेक्शन मिला. जुलाई और अगस्त में यह आंकड़ा 7 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि 5 से 12 साल के बच्चों में इंफेक्शन सबसे ज्यादा पाया गया. यह परजीवी दूषित सिंचाई के पानी, कच्ची सब्जियों, पत्तेदार साग और फलों के जरिए फैलता है. इसकी बाहरी परत इतनी मजबूत होती है कि क्लोरीन भी इसे आसानी से खत्म नहीं कर पाती.
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