एक्सप्लोरर

Explained: 118 पुलिसकर्मी और 60 प्रदर्शनकारी घायल! भारत को नेपाल-बांग्लादेश बनाने के नारे.. दोनों पक्षों से क्या गलतियां हुईं?

Delhi Protest Mistakes: 118 पुलिसकर्मी और 60 प्रदर्शनकारी घायल, 70 प्रदर्शनकारी हिरासत में, 5 FIR और 15-20 सरकारी वाहन बर्बाद. यह दोनों पक्षों की ऐसी गलतियां हैं, जो हिंसक झड़प की वजह बनी गईं.

20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद भवन की तरफ बढ़ती हजारों लोगों की भीड़, लाठियों की चटख, आंसू गैस के धुएं और सोशल मीडिया पर वायरल होती तस्वीरें. देश की राजधानी एक बार फिर हिंसक प्रदर्शनों का अखाड़ा बन गई. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने NEET पेपर लीक, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर यह मार्च निकाला था. लेकिन जो प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुआ, वो देखते ही देखते हिंसा में बदल गया. इस पूरी कहानी में न तो सरकार और पुलिस पूरी तरह निर्दोष हैं, और न ही प्रदर्शनकारी. आखिर दोनों पक्षों ने कहां-कहां गलतियां कीं...

सरकार और पुलिस की तरफ से ये रहीं बड़ी चूकें

1. बिना वर्दी वालों से पिटाई करवाना

प्रदर्शन के दौरान सबसे चौंकाने वाली तस्वीरें वो थीं जिनमें बिना वर्दी के लोग प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसा रहे थे. द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, कई चश्मदीदों ने बताया कि पुलिस ने जानबूझकर कुछ लोगों को भीड़ में छोड़ दिया, जिन्होंने बाद में प्रदर्शनकारियों पर हमला किया.

रिटायर्ड IPS अधिकारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जूलियो रिबेरो ने इस पर कहा, 'अगर पुलिस बिना वर्दी वालों से पिटाई करवाती है, तो यह कानून के शासन की हत्या है. ऐसा करके पुलिस अपने ऊपर ही भरोसे को खत्म करती है.'

CJP ने आरोप लगाया कि बिना वर्दी वाले पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की. अभिजीत दीपके ने कहा, 'पुलिस की वर्दी में गुंडे भरे हुए थे.'

2. बेजा लाठीचार्ज और आंसू गैस का अंधाधुंध इस्तेमाल

दिल्ली पुलिस ने भीड़ को काबू करने के लिए जिस पैमाने पर बल प्रयोग किया, वो बिल्कुल जरूरत से ज्यादा था. पुलिस ने 500 से ज्यादा आंसू गैस के गोले छोड़े और कई जगहों पर लाठीचार्ज किया. पुलिस शायद यह भूल गई कि आप लोकतंत्र में सबका भरोसा नहीं जीत सकते, अगर आपके पास सिर्फ आंसू गैस और लाठी का जवाब है.

CJP प्रवक्ता सौरव दास ने दावा किया कि एक 12 साल की बच्ची के सिर में चोट आई और 40-50 अन्य लोगों के सिर में चोटें आईं. कंटेंट क्रिएटर रमित वर्मा ने खून से लथपथ होकर कहा, 'उन्होंने मेरा सिर फोड़ दिया.'

3. प्रदर्शन के पैमाने को गलत आंकना

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के आकार का बिल्कुल गलत अनुमान लगाया था. पुलिस को उम्मीद थी कि 3,000-4,000 लोग जुटेंगे, लेकिन जंतर-मंतर पर 15,000 से 20,000 लोग पहुंच गए.

इस अचानक बढ़ी भीड़ को संभालने की कोई ठोस योजना नहीं थी. जब भीड़ संसद की तरफ बढ़ने लगी, तो पुलिस घबरा गई और सीधे बल प्रयोग पर उतर आई. पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए जो रणनीति अपनाई, वो पहले से सोची-समझी नहीं लगती, बल्कि घबराहट में लिया गया फैसला पता चलता है.

4. प्रदर्शनकारियों से बातचीत ही नहीं की गई  

सोनम वांगचुक और उनके साथियों ने कई बार सरकार से बातचीत का आग्रह किया, लेकिन सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. जब संवाद का दरवाजा ही बंद रखा जाएगा, तो गुस्सा सड़कों पर उतरेगा ही. सरकार को चाहिए था कि वो प्रदर्शनकारियों के नेताओं से मिलकर उनकी मांगों पर चर्चा करती.

CJP प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो के बाल खींचे गए और उनके साथ मारपीट की गई. अभिजीत दीपके ने कहा, 'एक पुरुष पुलिस अधिकारी ने गीतांजलि मैडम के बाल खींचे और उन्हें टेम्पो से बाहर घसीटने की कोशिश की.'

दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया.

5. इंटरनेट बंद करने से सूचना के अधिकार पर चोट  

प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के कई इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को धीमा कर दिया गया या पूरी तरह बंद कर दिया गया. सरकार का तर्क था कि अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए यह जरूरी था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह जनता के सूचना के अधिकार का हनन है और सरकार की घबराहट को दिखाता है.

इसके अलावा जनपथ, राजीव चौक, पटेल चौक, सेंट्रल सचिवालय और सेवा तीर्थ मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए. इससे आम जनता को भारी परेशानी हुई.

अब बात करते हैं प्रदर्शनकारियों की गलतियों की

1. पत्थरबाजी और हिंसा

दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ में से कुछ लोगों ने पुलिस पर पत्थर फेंके, बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और सरकारी बसों में तोड़फोड़ की. ज्वाइंट सीपी मधुर वर्मा ने कहा, 'अवैध सभा थी, पत्थरबाजी की घटनाएं हुईं.' इस हिंसा में 118 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें से 12 को गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. कई महिला पुलिसकर्मी भी घायल हुईं.

पुलिस ने 70 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और उन पर दंगा भड़काने, सरकारी काम में बाधा डालने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया.

2. बांग्लादेश और नेपाल का जिक्र

प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश और नेपाल के राजनीतिक हालात का जिक्र करते हुए कहा कि 'वहां जनता ने सड़कों पर उतरकर सरकार बदल दी, हमें भी ऐसा ही करना चाहिए.' इस तरह के नारे सिर्फ भड़काऊ नहीं हैं, बल्कि ये देश की संप्रभुता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने जैसे हैं.

एक जिम्मेदार आंदोलन का मकसद समाधान निकालना होता है, न कि अराजकता को बढ़ावा देना. इस तरह की बयानबाजी ने प्रदर्शन के मूल मुद्दों को कमजोर कर दिया और पुलिस को कार्रवाई का मौका दे दिया.

3. भीड़ पर काबू करने में फेल

सोनम वांगचुख खुद एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लद्दाख के लिए उनका आंदोलन लंबे समय तक पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा. लेकिन इस बार उनके आंदोलन में कुछ ऐसे तत्व शामिल हो गए जिनका मकसद सिर्फ हंगामा करना था. जब भीड़ बेकाबू होने लगी और नारे भड़काऊ होने लगे, तब नेतृत्व की तरफ से उसे शांत कराने की कोशिशें नाकाफी रहीं. एक अच्छे आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन होता है. यहां वही टूटता दिखा.

प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स की कई परतें तोड़ीं. उन्होंने संसद सुरक्षा क्षेत्र में घुसने की कोशिश की. संसद मार्ग, पटेल चौक और रेल भवन समेत कई जगहों पर झड़पें हुईं.

दोनों पक्षों की जिम्मेदारी और आगे का रास्ता

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का हक तो है, लेकिन उसका तरीका संवैधानिक और शांतिपूर्ण होना चाहिए. सरकार और पुलिस को यह समझना होगा कि लाठी और आंसू गैस से जनता का गुस्सा दबता नहीं, बल्कि और भड़कता है. अगर प्रदर्शनकारियों से समय रहते बातचीत की जाती, तो शायद यह हिंसा टाली जा सकती थी.

दूसरी तरफ, प्रदर्शनकारियों को भी चाहिए था कि उनका आंदोलन अहिंसक रहे. भीड़ में ऐसे लोगों को शामिल न होने दिया जाए जो सिर्फ उपद्रव मचाना चाहते हैं. पत्थरबाजी और भड़काऊ नारे किसी भी आंदोलन की नैतिक ताकत को खत्म कर देते हैं. यह हंगामा सिर्फ एक दिन की खबर नहीं है. यह एक सबक है, सरकार और जनता दोनों के लिए.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

Read More
और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola
Advertisement

टॉप हेडलाइंस

सुप्रीम कोर्ट पहुंची महुआ मोइत्रा को फटकार, 'क्या आपको अंडों से...'
SC पहुंची महुआ मोइत्रा को फटकार, 'क्या आपको अंडों से डर लगता है?
परिसीमन बिल पर मोदी सरकार के साथ या खिलाफ DMK? खोले पत्ते, एक्शन में थलापति
परिसीमन बिल पर मोदी सरकार के साथ या खिलाफ DMK? खोले पत्ते, एक्शन में थलापति
भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से झटका, नहीं मानी याचिका रद्द करने की मांग
भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से झटका, नहीं मानी याचिका रद्द करने की मांग
'गृह मंत्री सदन में आएं', विपक्ष ने लगाए संसद में नारे तो रिजिजू बोले- 'वो सुबह से शाम तक...'
'गृह मंत्री सदन में आएं', विपक्ष का हंगामा, गुस्से में बोले रिजिजू- 'वो सुबह से शाम तक यहीं'
Advertisement

वीडियोज

Sansani: अतीक अहमद के बेटे की दर्दनाक मौत
Jannat Zubair ने Elvish Yadav संग Dating Rumours पर तोड़ी चुप्पी, बताया रिश्ते का सच
Prince Narula ने Shivangi-Harshad की Bonding को बताया 'Nibba Nibbi Wala Pyaar'
Shreya Kalra की Controversies ने मचाया बवाल, फिर भी बनीं Lock Upp 2 की Winner
Dipika Kakar हुईं Emotional, Cancer Treatment के दौरान बोलीं- अभी हिम्मत नहीं हार सकती
Advertisement

फोटो गैलरी

Advertisement

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
परिसीमन बिल पर मोदी सरकार के साथ या खिलाफ DMK? खोले पत्ते, एक्शन में थलापति
परिसीमन बिल पर मोदी सरकार के साथ या खिलाफ DMK? खोले पत्ते, एक्शन में थलापति
अबान की कार से मिलीं लिटरेचर की ये किताबें! भाई के लिए ले जा रहा था जेल
अबान की कार से मिलीं लिटरेचर की ये किताबें! भाई के लिए ले जा रहा था जेल
सुखबीर बादल ने पीएम मोदी से की मुलाकात, बदल जाएगी पंजाब की सियासत?
सुखबीर बादल ने पीएम मोदी से की मुलाकात, बदल जाएगी पंजाब की सियासत?
रोहित शर्मा से पड़ी फटकार अब तक नहीं भूले जायसवाल, खास पोस्ट शेयर कर लिए मजे
रोहित शर्मा से पड़ी फटकार अब तक नहीं भूले जायसवाल, खास पोस्ट शेयर कर लिए मजे
50 की उम्र में भी क्यों कुंवारी हैं सैफ अली खान की बहन सबा पटौदी ? बोलीं- ‘मैं 19 साल की उम्र में शादी...’
50 की उम्र में भी क्यों कुंवारी हैं सैफ अली खान की बहन सबा? खुद बताई वजह
'NTA के एक्सपर्ट्स ने लीक कराया NEET-UG का पेपर', CBI का बड़ा खुलासा
'NTA के एक्सपर्ट्स ने लीक कराया NEET-UG का पेपर', CBI का बड़ा खुलासा
आनंदीबेन ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी में किया गुजरात का जिक्र, अखिलेश यादव बोले- खुल गई पोल
आनंदीबेन ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी में किया गुजरात का जिक्र, अखिलेश यादव बोले- खुल गई पोल
भारत में कौन विदेशी चंदा ले सकता है, कौन नहीं? जानें नियम
भारत में कौन विदेशी चंदा ले सकता है, कौन नहीं? जानें नियम
Embed widget