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Muslim Women Reservation: मुस्लिम महिलाओं को क्यों नहीं दिया जा सकता आरक्षण, क्या है संविधान में नियम?

Muslim Women Reservation: 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास नहीं हो सका. इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर मुस्लिम महिलाओं को अलग से कोटा क्यों नहीं दिया जा सकता.

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  • संवैधानिक रूप से धर्म के आधार पर कोई आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
  • आरक्षण सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रदान किया जाता है।
  • सच्चर समिति जैसी सिफारिशें धर्म-आधारित कोटा लागू करने में बाधा बनीं।
  • न्यायालयों ने धर्म-आधारित आरक्षण के किसी भी प्रस्ताव को खारिज किया है।

Muslim Women Reservation: शुक्रवार को संसद में एक अहम पल देखने को मिला. दरअसल 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास नहीं हो पाया. यह मोदी सरकार के लिए एक दशक से ज्यादा समय में पहली ऐसी हार थी. महिलाओं के आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही तीखी बहस के बीच एक बड़ा सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है. आखिर मुस्लिम महिलाओं को अलग से कोटा क्यों नहीं दिया जा सकता? आइए जानते हैं क्या है इसका जवाब.

धर्म के आधार पर कोई भी आरक्षण नहीं 

सबसे बुनियादी वजह संवैधानिक है. अनुच्छेद 15 (1) साफ तौर पर कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ सिर्फ धर्म, जाति, लिंग, नस्ल या फिर जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता. इसका मतलब है कि आरक्षण नीतियां पूरी तरह से धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं बनाई जा सकतीं. सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा बनाने की कोई भी कोशिश इस बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन होगी.

आरक्षण पिछड़ेपन पर आधारित है

संविधान अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) के तहत आरक्षण की इजाजत देता है. लेकिन सिर्फ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए. यही वजह है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों को आरक्षण का फायदा मिलता है. लेकिन इसलिए नहीं कि वें मुस्लिम हैं. सिर्फ इस वजह से कि वे सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी श्रेणियों के तहत आते हैं.

विशेष समितियों ने सिफारिश की 

सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग जैसी समितियों ने मुसलमानों के सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन को उजागर किया और सकारात्मक  कार्रवाई का सुझाव दिया. हालांकि संवैधानिक सीमाओं की वजह से उनकी सिफारिश को धर्म आधारित आरक्षण के रूप में लागू नहीं किया जा सका.

हालांकि राजनीतिक दल अक्सर मुस्लिम महिलाओं के लिए उप कोटे की मांग उठाते हैं लेकिन ऐसे प्रस्तावों के सामने एक कानूनी बाधा आ जाती है. भले ही राजनीतिक इच्छा शक्ति मौजूद हो लेकिन ऐसे किसी भी कदम के लिए संवैधानिक बदलाव या उनकी पुनर्व्याख्या की जरूरत होगी. अतीत में भी धर्म-आधारित कोटे शुरू करने की कोशिशें कानूनी जांच में खरी नहीं उतर पाई. 2012 में अल्पसंख्यकों के लिए प्रस्तावित 4.5% उप-कोटे को अदालतों ने रद्द कर दिया था. न्यायपालिका ने यह साफ कर दिया कि सिर्फ धर्म आरक्षण का आधार नहीं हो सकता, जिससे संवैधानिक स्थिति और भी मजबूत हुई.

यह भी पढ़ें:  संसद में 54 वोट से कैसे गिर गया महिला आरक्षण से जुड़ा बिल, अब तक पेश हुए और बिल मोदी सरकार ने कैसे कराए पास?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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