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मौत की सजा सुनाने के बाद जज क्यों तोड़ देते थे पेन की नोक, क्या थी वजह?

मेरठ के मुस्कान-साहिल केस में मौत की सजा सुनाए जाने के बाद जज के पेन से जुड़ी चर्चा फिर तेज हो गई है. आखिर इस परंपरा के पीछे क्या मान्यता है और क्या भारतीय कानून में ऐसा कोई नियम है?

अदालत में मौत की सजा सुनाना किसी भी मुकदमे का बेहद गंभीर पड़ाव होता है. फिल्मों और कहानियों में अक्सर दिखाया जाता है कि फांसी की सजा सुनाने के बाद जज अपने पेन की नोक तोड़ देते हैं. यह कानून का जरूरी हिस्सा नहीं है. मेरठ के मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला मामले में 14 अक्टूबर 2026 को दोनों को मौत की सजा सुनाई गई. इसके बाद पेन की नोक तोड़ने की परंपरा एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गई. 

मुस्कान-साहिल केस में क्या हुआ?

मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में जिला अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मुस्कान के पति सौरभ राजपूत की हत्या और सबूत मिटाने के मामले में दोषी ठहराया था. इसके बाद 14 अक्टूबर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्र ने दोनों को मौत की सजा सुनाई. फैसले के बाद जज के पेन को लेकर चर्चा तेज हो गई. 

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 पेन की नोक क्यों तोड़ी जाती है?

इस परंपरा के पीछे कई मान्यताएं हैं. एक मान्यता के अनुसार, जिस पेन से मौत की सजा लिखी गई, उससे दोबारा कोई फैसला नहीं लिखा जाना चाहिए. दूसरी मान्यता यह है कि पेन की नोक तोड़ना जज के उस गंभीर फैसले का प्रतीक है, जिसमें एक व्यक्ति की जिंदगी से जुड़ा निर्णय लिया गया. कुछ लोग इसे जज के भावनात्मक बोझ से भी जोड़ते हैं, लेकिन यह केवल एक  प्रतीकात्मक रस्म या प्रचलित मान्यता है.

क्या कहता है भारतीय संविधान और कानून?

मौत की सजा सुनाने के बाद जज पेन की नोक तोड़ते हैं, लेकिन क्या भारतीय संविधान में ऐसा कोई नियम है? इसका जवाब है नहीं. भारतीय संविधान और भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में पेन की नोक तोड़ने की कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं है. इसे एक प्रतीकात्मक परंपरा के तौर पर देखा जाता है, जिसके पीछे अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं. कानून का जोर इस बात पर है कि फैसला तय प्रक्रिया के अनुसार दिया जाए. ऐसे में पेन की नोक तोड़ना कानूनी जरूरत नहीं, बल्कि इससे जुड़ी एक प्रचलित धारणा है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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