तबाही में कैसे बह जाते हैं नदी या समुद्र पर बने पुल, क्या हैं वजह?
नदियों और समुद्र पर बने पुल मुख्य रूप से पानी के तेज बहाव, नींव के नीचे मिट्टी कटने, बहकर आने वाले मलबे की टक्कर और घटिया निर्माण सामग्री व रखरखाव की कमी के कारण तबाही में बह जाते हैं.

- तेज पानी नींव की मिट्टी को काटता है, पिलर कमजोर।
- अत्यधिक जल दबाव, बहता मलबा पुलों को तोड़ता है।
- सुपरस्ट्रक्चर का दबाव, कमजोर जमीन पुल ढहाने का कारण।
- घटिया सामग्री, खराब रखरखाव पुलों की कमजोरी बढ़ाता है।
जब भी कोई प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, सुनामी या चक्रवाती तूफान आता है, तो नदियों और समुद्रों के उफान के सामने बड़े-बड़े कंक्रीट और स्टील से बने पुल तिनके की तरह बह जाते हैं. कल नेपाल में आई त्रासदी में भी कई पुल बह गए. देखने में ये पुल और इनके पिलर बेहद मजबूत नजर आते हैं, लेकिन पानी के भीतर काम करने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग कारण इन्हें पल भर में नष्ट कर देते हैं. उफनती नदियों का प्रचंड वेग और पानी की विनाशकारी ताकत इन विशालकाय ढांचों को अपनी जगह से उखाड़ फेंकती है.
नींव के नीचे की मिट्टी का कटना या स्कॉरिंग
पुलों के ढहने की सबसे प्राथमिक और वैज्ञानिक वजह नींव के आसपास का कटाव होती है, जिसे तकनीकी भाषा में ब्रिज स्कॉर कहा जाता है. जब नदी या समुद्र का पानी अत्यधिक गति से पिलर से टकराता है, तो वहां पानी के भीतर तेज चक्रवाती भंवर बनने लगते हैं. ये भंवर धीरे-धीरे पिलर के नीचे और चारों तरफ मौजूद ठोस मिट्टी और रेत को खोदकर बहा ले जाते हैं. नतीजा यह होता है कि पिलर की नींव हवा या पानी में लटक जाती है और उसकी भार सहने की क्षमता समाप्त होते ही पूरा ढांचा धंस जाता है.
पानी का अत्यधिक दबाव और हाइड्रोलिक लोड
बाढ़ के समय जलस्तर के साथ-साथ पानी का आयतन और गति कई गुना बढ़ जाती है. बहता हुआ पानी जब पिलर के फैले हुए निचले हिस्से से टकराता है, तो वह उस पर एक भीषण क्षैतिज यानी साइड प्रेशर डालता है. यदि निर्माण के दौरान पिलर को गहराई में मौजूद कठोर चट्टानों तक मजबूती से नहीं धंसाया गया हो, तो पानी का यह निरंतर धक्का पूरे पिलर को नीचे से उखाड़ देता है या बीच में से ही तोड़कर बहा ले जाता है.
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मलबे की टक्कर और बहाव में रुकावट का संकट
पहाड़ों में बादल फटने या फ्लैश फ्लड आने पर पानी अपने साथ भारी तबाही लेकर आता है. इस पानी में उखड़े हुए विशालकाय पेड़, टूटी चट्टानें और बहे हुए मकानों का मलबा तेज रफ्तार से तैरता हुआ आता है. जब यह भारी-भरकम सामग्री सीधे पुल के पिलरों से टकराती है, तो वह किसी विशाल हथौड़े की तरह प्रहार करती है. इसके अलावा जब यह मलबा पिलरों के बीच अटक जाता है, तो पानी का प्राकृतिक रास्ता रुक जाता है, जिससे पुल पर जल का दबाव और ज्यादा बढ़ जाता है और संरचना गिर जाती है.
सुपरस्ट्रक्चर का लीवर प्रभाव और कमजोर जमीन
पुल के ऊपरी हिस्से यानी भारी गर्डर और स्लैब का वजन पिलरों पर टिका होता है, जिसे सुपरस्ट्रक्चर कहते हैं. आपदा के वक्त जब पानी की तेज लहरें ऊपर उठकर इन स्लैब से टकराती हैं, तो ऊपर पड़ा दबाव पिलर के निचले हिस्से पर एक लीवर की तरह काम करता है. इसके साथ ही, लगातार पानी के रिसाव और जल के तेज कंपन के कारण पिलर के नीचे की जमीन अपनी पकड़ खो देती है. इस भू-तकनीकी विफलता (जियोटेक्निकल फेलियर) के चलते पुल अचानक भरभरा कर गिर जाता है.

निर्माण की गुणवत्ता और रखरखाव की लापरवाही
इंजीनियरिंग कमियों के अलावा मानवीय गलतियां भी पुलों के बहने के लिए उतनी ही जिम्मेदार होती हैं. निर्माण के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली घटिया सामग्री, जैसे कंक्रीट में रेत की ज्यादा मात्रा या घटिया लोहे के सरियों का प्रयोग पुल को आंतरिक रूप से कमजोर कर देता है. इसके साथ ही, समय-समय पर सही रखरखाव न होने से पुल में आई दरारों के अंदर पानी पहुंचता है, जिससे अंदर का सरिया जंग खाकर सड़ जाता है. इस कारण मामूली बाढ़ में भी ऐसे पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं.
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