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जल्लाद का काम कौन करेगा और कौन नहीं, कैसे होता है तय?

Meerut Blue Drum Case: मेरठ ब्लू ड्रम केस में दोनों दोषियों को मौत की सजा सुना दी गई है. इसी बीच आइए जानते हैं कि जल्लाद को कैसे चुना जाता है और कौन जल्लाद बनने योग्य होता है.

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  • मेरठ मामले में मौत की सजा के बाद जल्लाद चर्चा में.
  • भारत में जल्लाद का कोई स्थायी पद नहीं होता है.
  • जेल प्रशासन प्रशिक्षित, मानसिक रूप से मजबूत व्यक्ति को चुनता है.
  • भावनात्मक कमजोर, आपराधिक रिकॉर्ड वाले जल्लाद नहीं बन सकते.

Meerut Blue Drum Case: मेरठ के ब्लू ड्रम हत्याकांड में अदालत ने सौरभ राजपूत की हत्या करने और सबूत मिटाने का दोषी पाते हुए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है. यह फैसला लगभग 13 महीने तक चले मुकदमे के बाद आया है. 

इस मामले के बाद इस बात पर चर्चा छिड़ चुकी है कि जल्लादों का चयन कैसे किया जाता है और किन्हें इसके लिए अयोग्य माना जाता है. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

जल्लादों की नियुक्ति कैसे होती है? 

भारत में जल्लाद का कोई स्थायी पद नहीं होता है. जब किसी को दी गई मौत की सजा पर अमल करने का समय आता है तो जेल प्रशासन ऐसे व्यक्ति की तलाश करता है जो यह काम कर सके. यह काम जेल के किसी ऐसे भरोसेमंद कर्मचारियों को सौंपा जा सकता है जो प्रशिक्षित हो और मानसिक रूप से भी मजबूत हो.

कुछ मामलों में प्रशासन ने कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर भी जल्लादों को काम पर रखा है. उदाहरण के लिए निर्भया मामले में दोषियों को फांसी देने के लिए सरकार ने उत्तर प्रदेश के मेरठ के पवन जल्लाद जैसे व्यक्तियों की मदद ली थी. 


जल्लाद का काम कौन करेगा और कौन नहीं, कैसे होता है तय?

पारिवारिक परंपरा और सामाजिक कलंक 

यह पेशा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक भी आगे बढ़ा है. पवन जल्लाद ने यह काम अपने दादा कालू जल्लाद से सीखा था. सामाजिक कलंक और इस काम की संवेदनशील प्रकृति की वजह से काफी कम लोग इसमें रुचि लेते हैं. इस वजह से यह काम मुख्य रूप से कुछ अनुभवी परिवारों तक ही सीमित रह गया है. 

कौन सी योग्यताएं जरूरी हैं?

एक जल्लाद के पास इस काम से जुड़े भावनात्मक दबाव को झेलने की क्षमता होनी चाहिए. किसी व्यक्ति के गले में फंदा डालना और लीवर खींचना मानसिक रूप से काफी मुश्किल हो सकता है. इस वजह से भावनात्मक मजबूती को काफी जरूरी माना जाता है. जेल के नियम और फांसी देने के प्रोटोकॉल की तकनीकी जानकारी होना भी जरूरी है. 

इन प्रक्रियाओं में रस्सी की लंबाई, दोषी का वजन, फंदा कैसे बांधा जाए और लीवर खींचने का सही समय क्या हो जैसी तमाम बातें शामिल होती हैं. इसके अलावा यह भी जरूरी है कि उस व्यक्ति का कोई आपराधिक रिकॉर्ड ना हो और वह जेल प्रशासन के नियमों का पालन करता हो.


जल्लाद का काम कौन करेगा और कौन नहीं, कैसे होता है तय?

कौन फांसी नहीं दे सकता? 

जो लोग इस काम के भावनात्मक दबाव को नहीं झेल सकते उन्हें इसके लिए अयोग्य माना जाता है. इसमें वे लोग शामिल हो सकते हैं जो काफी कमजोर दिल के हैं या फिर भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील हैं या फिर जिन्हें कानूनी रूप से अधिकृत होने के बावजूद किसी की जान लेना सही नहीं लगता. 

कोई भी आम नागरिक बिना आधिकारिक मंजूरी के किसी व्यक्ति को फांसी देने के लिए आगे नहीं आ सकता. रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके लिए अदालत या फिर जेल महानिदेशक से लिखित वारंट और अनुमति की जरूरत होती है. बिना कानूनी मंजूरी के किसी को फांसी देना एक आधिकारिक कार्य नहीं बल्कि हत्या माना जाएगा. 

इसी के साथ यह कोई खुली सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया नहीं है. इसके बजाय जब किसी को फांसी दी जानी होती है तो अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करते हैं जो यह काम कर सके. यही वजह है कि यह जिम्मेदारी जेल के कर्मचारियों को दी जा सकती है या फिर किसी ऐसे व्यक्ति को काम पर रखा जा सकता है जिसे पहले से इसका अनुभव हो. 

यह भी पढ़ें: एक ही अपराध में उम्रकैद और मृत्यु दंड क्यों, अदालत कैसे तय करती है सजा?

ऐतिहासिक रूप से यह भूमिका कैसे पैदा हुई? 

इतिहास के मुताबिक मध्यकालीन यूरोप में जल्लादों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था. क्योंकि इस पेशे को काफी अपमानजनक माना जाता था इस वजह से लोग अपनी मर्जी से इसे नहीं अपनाते थे. जो लोग बेघर हो गए थे या फिर दिवालिया हो गए थे उन्हें कभी-कभी मजबूरी में यह काम स्वीकार करना पड़ता था. 

कुछ मामलों में किसी गंभीर अपराध के दोषी व्यक्ति की सजा इस शर्त पर कम कर दी जाती थी कि उसे जीवन भर राज्य के जल्लादों के रूप में काम करना होगा. जल्लादों के बच्चों को दूसरे व्यवसायों से बाहर रखा जा सकता था और उनके लिए जीवनसाथी खोजना भी मुश्किल हो जाता था. इस वजह से उनके बेटों पर अपने पिता का काम जारी रखने का दबाव बना रहता था.

यह भी पढ़ें: भारत में कैसे काम कर सकती है कोई विदेशी कंपनी, क्या हैं नियम?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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